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आपकी अब तक की सामाजिक व राजनीतिक गतिविधियां व उपलब्धियां क्या-क्या रहीं?
 
मैं १९८५ में संघ का स्वयंसेवक बना तथा १९९१ में संघ का प्रचारक बनकर उत्तर-पूर्व गया तथा अगले ८ वर्षों तक वहां के ईसाई बहुल, हिंसक, देश विरोधी तथा धर्मांतरण वाले माहौल के बीच रहना पड़ा. उस दौरान मैंने ६००० ईसाइयों की स्वधर्म वापसी करवाई तथा महिलाओं को स्वावलम्बी बनाने के लिए सिलाई-बुनाई केंद्र शुरू किए. उसी दौरान महाराष्ट्र के बिभिन्न शहरों में १५-१५ विद्यार्थियों के छात्रावास शुरू किए. इस समय लगभग साढ़े तीन सौ बच्चे इसका हिस्सा हैं. साल भर में एक बार इन बच्चों का तीन दिवसीय सामूहिक रंगारंग कार्यक्रम होता है.
 
देश भर में उत्तर-पूर्व के लोगों को अपनेपन का अहसास कराने, उनके स्वाभिमान को बनाए रखने के लिए ‘माय होम इंडिया‘ नाम की संस्था शुरू की जो पिछले १२ वर्षों में ६५ शहरों तक फैल चुकी है. इसी संस्था के अंतर्गत चाइल्ड ट्रैफिकिंग रोकने के लिए तथा बाल सुधार गृहों में रहने वाले बच्चों को उनके माता-पिता से मिलवाने के लिए ‘सपनों से अपनों तक‘ कार्यक्रम शुरू किया जिसके तहत अब तक १९२२ बच्चों को उनके घर सकुशल पहुंचा चुके हैं. जब नितिन गडकरी जी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तो उन्होंने पूर्वोत्तर भारत सम्पर्क प्रकोष्ठ बनाकर मुझे उसका राष्ट्रीय संयोजक बनाया. तीन वर्षों तक देशभर में घूमकर पूर्वोत्तर के लोगों के लिए हेल्पलाइन चलाई. वहां के चार राज्यों के लिए विजन डाक्युमेंट बनाया. २०१२ के गुजरात विधान सभा चुनाव के ६ महीने पहले मोदी जी ने मुझे एक ऐसे जिले में कार्य करने के लिए बुलाया जहां ६ विधान सभाओं में भाजपा का एक विधायक था. उस चुनाव में वह आंकड़ा ३-३ का हो गया. फिर २०१३ के दिल्ली के विधान सभा चुनावों में मुझे दक्षिण दिल्ली का दायित्व दिया गया और १० में से ७ सीटें भाजपा की झोली में आ गईं. उसके पश्चात् २०१४ के लोकसभा चुनाव में प्रधान मंत्री जी ने मुझे तथा सुनील ओझा को अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी का प्रभारी बनाया.
 
ज्यादातर ऐसा होता है कि किसी बड़े काम के पीछे कोई घटना कार्य करती है. ‘माय होम इंडिया‘ संस्था की स्थापना का ख्याल कब व कैसे आया?
 
मेरे प्रचारक के तौर पर मेघालय प्रवास के दौरान दो घटनाएं हुईं. पहली घटना, वहां के एक मेडिकल छात्र की मध्य प्रदेश के सागर जिले में रैगिंग हुई जिससे डर कर वह मेघालय भाग आया. वहां के अलगाववादी संगठन ‘खासी स्टूडेंट यूनियन’ ने उस घटना को लेकर पर्चे बांटे कि देखो हिंदुस्तानी हमारे साथ कैसा व्यवहार करते हैं. दूसरी घटना लखनऊ के मेडिकल कॉलेज की है. बुडरोई तालाम नाम के लड़के को कोई मित्र नहीं बना रहा था तो अपने एक स्वयंसेवक अध्यापक के कहने पर हमने कुछ स्वयंसेवकों को भेज कर उसके कुछ दोस्त बनवाए. बुडरोई अपनी मेडिकल की पढ़ाई पूरी करके ही वापस लौटा. इस प्रकार मुझे लगा कि चूंकि पूर्वोत्तर में आतंकवाद, धर्मांतरण, वामपंथियों का आतंक तथा बांग्लादेशियों की घुसपैठ जैसी तमाम समस्याएं हैं तथा संघ का कार्य करना काफी मुश्किल है. हमें वहां के लोगों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने कार्य करना चाहिए. वहां अब तक हमारे ७-८ स्वयंसेवक मारे जा चुके हैं. प्रचारक के दायित्व से हटने के बाद १७ राज्यों के १९ लोगों को लेकर १२ साल पहले इस राष्ट्रव्यापी संगठन की स्थापना की.
 
चाइल्ड ट्रैफिकिंग के खिलाफ आपकी संस्था द्वारा चलाई गई ‘सपनों से अपनों तक’ मुहिम कितनी सफल रही?
 
यह एक बहुत बड़ी समस्या है. कुछ बच्चे घर से भाग जाते हैं, कुछ को लोग भगा ले जाते हैं, कुछ के माता-पिता को सब्जबाग दिखा कर उनके बच्चे उठा ले जाते हैं. रजिस्टर्ड तौर पर एक लाख से ज्यादा बच्चे हर साल अपने घरों से भाग जाते हैं. इनमें से ज्यादातर बच्चे मुसीबत में फंस जाते हैं. पुलिस जब कहीं से बच्चों को छुड़ाती है तो उन्हें बाल सुधार गृह में रखा जाता है तथा उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों के मां-बाप को ढूंढ़ कर उन्हें मिलाएं पर वे ऐसा नहीं करते क्योंकि उन्हें बच्चों के हिसाब से अनुदान मिलता है. वहां पर भी उनकी स्थिति काफी दयनीय होती है. बहुत सारे सुधार गृहों में बच्चों का इलाज भी नहीं कराया जाता ताकि उन्हें दिखा कर दानदाताओं से पैसा वसूला जा सके. कुछ जगहों पर १५-१६ साल के बच्चों को ड्रग्स की लत लगा दी जाती है जबकि कुछ जगहों पर मानव अंगों का व्यापार भी किया जाता है.
 
जैसा कि आपने पिछले प्रश्न में पूछा कुछ ऐसी ही स्थिति यहां भी हुई. मेघालय की दो बच्चियां ट्रैफिकिंग कर मुंबई लाई गई थीं. डोंगरी के सुधार गृह में हमारे एक वकील कार्यकर्ता को उसके बारे में पता चला तो हमने उन बच्चियों को उनके माता-पिता से मिलवाने का कार्य किया. इसी दौरान वहां बहुत सारी बच्चियां मिली, जिन्हें उनके घर पता थे. तब हमारी मैनेजिंग कमेटी ने ‘सपनों से अपनों तक’ शुरू किया तथा इसकी शुरुआत हमने डोंगरी से ही की, जहां कि ४५० बच्चे थे पर अब लगभग डेढ़ सौ बच्चे ही रह गए हैं. देशभर में ७५० बाल सुधार गृह हैं जिनमें लगभग डेढ़ लाख बच्चे हैं जिनमें से सवा लाख बच्चों को उनके घर पहुंचाया जा सकता है. हमारा लक्ष्य है कि १५ अगस्त २०२२ तक सारे बाल गृह खाली कर दिए जाएं. अब तक हम लगभग ५० से ज्यादा बाल गृहों तक पहुंच भी चुके हैं.
 
विगत कुछ वर्षों से आप त्रिपुरा में कार्य कर रहे हैं. वहां की सामाजिक व राजनीतिक स्थिति क्या है?
 
वह देश का सर्वाधिक संकटग्रस्त प्रदेश है तथा वहां देश में सर्वाधिक गरीबी है. वहां के ६७ प्रतिशत लोग बीपीएल कार्ड होल्डर हैं. वहां की ३७ लाख की आबादी में से २५ लाख से ज्यादा लोग २ रुपए किलो का राशन का चावल खाने को मजबूर हैं. इसका प्रमुख कारण है वहां की कम्युनिस्ट सरकार जिसका ध्येय ही है कि लोग गरीब हों ताकि पार्टी पर निर्भर रहें. ऐसा नहीं है कि ये करना नहीं जानते; पर ‘न करना’ ये बखूबी जानते हैं. इसीलिए माणिक सरकार के २५ साल के शासन में जनता की हालत बद से बदतर होती चली गई है. जब माणिक सरकार मुख्यमंत्री बने थे तब वहां ८५ हजार रजिस्टर्ड बेरोजगार थे जबकि वर्तमान में यह संख्या साढ़े सात लाख हो चुकी है.
 
वहां की कम्युनिस्ट सरकार के प्रति लोगों के मन में क्या भाव है?
 
पूरी तरह नकारात्मक भाव है लोगों के मन में. लोग परिवर्तन चाहते हैं. अभी तक वहां की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस थी, लेकिन २०१४ में केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद उनका वोट बैंक भी हमारी तरफ झुका है. यहां तक कि पिछले एक वर्ष में सीपीएम का वोट बैंक भी हमारी तरफ खिसका है क्योंकि उनके आम कार्यकर्ता भी त्रस्त हैं.
 
देश के बाकी हिस्से में माणिक सरकार की छवि कुछ-कुछ राबिनहुड सी बनी हुई है. क्या वास्तव में ऐसा है?
 
दशा बिलकुल इसके विपरीत है. त्रिपुरा का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि राष्ट्रीय स्तर पर वहां की बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है. हम वही देख पाते हैं जो माणिक सरकार दिखाते हैं. लोग दिल्ली और मुंबई में बैठ कर त्रिपुरा पर लेख लिखते हैं और छाप भी देते हैं. वहां की जमीनी हकीकत से किसी को कोई मतलब नहीं है. माणिक सरकार एक निहायत ही अय्याश और निकम्मा व्यक्ति है.
 
आखिर इतनी तमाम कारगुजारियों के बावजूद वहां बार-बार कम्युनिस्टों की ही सरकार क्यों बन जाती है?
 
इसका मूल कारण कम्युनिस्टों की गुंडागर्दी और बूथ कैप्चरिंग है. यह देश का इकलौता राज्य है जहां पर ९७ प्रतिशत तक मतदान होता है. यह आंकड़ा ही काफी है बताने के लिए कि कितनी धांधली की जाती है. दो बजे दोपहर तक ३० से ३५ प्रतिशत का मतदान शाम छः बजे तक ९७ प्रतिशत तक पहुंच जाता है. यहां अब तक एक हजार से अधिक राजनीतिक हत्याएं हो चुकी हैं जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर कहीं चर्चा ही नहीं होती. अन्य प्रदेशों में जहां कि आबादी करोड़ों में है, एक राजनीतिक हत्या भी बड़ी खबर बन जाती है पर यहां की ३६ लाख की आबादी पर यह आंकड़ा बहुत बड़ा है. यहां अपराध दर देश भर में सर्वाधिक है. अभी कुछ दिनों पहले ही पत्रकार सुदीप दत्त भौमिक की एक एसपी रैंक के अफसर ने इसलिए हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने उसकी कारगुजारियों के खिलाफ तीन लेख लिखे थे. गौरी लंकेश के लिए स्यापा करने वाले सुदीप दत्त के लिए कुछ नहीं बोलते हैं.
 
क्या वहां कम्युनिस्टों के इतने हिंसक दमन के लिए केंद्र की पूर्ववर्ती सरकारों का भी प्रश्रय रहा है?
 
बिलकुल रहा है. यूपीए सरकार के समय भी साढ़े चार साल तक सीधे तौर पर तथा साढ़े पांच साल बाहर से कांग्रेस का समर्थन माणिक सरकार को रहा है. इसलिए उन्होंने उत्तर-पूर्व को, खासकर त्रिपुरा को असहाय छोड़ दिया कम्युनिस्टों के दमन के बीच. उनकी नजर में वह एक छोटा सा राज्य है जिसका कोई बड़ा राजनीतिक महत्व नहीं है.
 
केंद्र में नई सरकार आने के बाद लोगों की भावनाओं में क्या परिवर्तन देखने को मिल रहा है एवं भाजपा संगठन उस दिशा में क्या प्रयास कर रहा है?
 
यहां का पूरा माहौल स्थापितों के खिलाफ है. ऐसा नहीं है कि पांच साल पहले यह नहीं था. तब भी था पर उस समय यहां पर विपक्ष में कांग्रेस थी तथा तथा केंद्र में भी वे ही थे. पर न तो राज्य में पार्टी का संगठन मजबूत था, न ही केंद्र से कोई ध्यान दिया जा रहा था. पर नरेंद्र मोदीजी के प्रधान मंत्री बनने के बाद उन्होंने गरीबों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं जिसका काफी व्यापक असर पड़ा. चूंकि त्रिपुरा एक गरीब बहुल राज्य है इसलिए उन्हें लगता है कि नई सरकार अच्छा कार्य करेगी. नोटबंदी व सर्जिकल स्ट्राइक का भी लोगों ने काफी स्वागत किया. त्रिपुरा में मीटर गेज था. उसे ब्रॉड गेज किया. अगरतला से राजधानी एक्सप्रेस शुरू की. त्रिपुरा सुंदरी मंदिर तक रेल लाइन बिछ चुकी है. जल्द ही वह बांग्लादेश के चटगांव तक पहुंचाई जाएगी. त्रिपुरा से बांग्लादेश होते हुए कोलकाता तक की रेल यात्रा मात्र ६ घंटे में पूरी हो जाएगी. इसका मात्र २२ किलोमीटर का काम बचा है. वहां के लोगों को लगने लगा है कि यह एक अच्छे नेतृत्व वाली सही पार्टी है. इन्हें सरकार बनाना चाहिए, ये काम करेंगे. कांग्रेस केवल चुनावों के समय दिखाई देती थी पर भाजपा के कार्यकर्ताओं ने पिछले तीन वर्षों में जी- तोड़ मेहनत की है. हमारे ४ कार्यकर्ताओं की हत्या भी की जा चुकी है जबकि साढ़े पांच सौ से ज्यादा कार्यकर्ताओं पर हमले कर संपत्ति का नुकसान किया गया है. पर हमारे हौसले बुलंद हैं. अमित भाई शाह कम्युनिस्टों को कहते हैं न कि, ‘आप जितना हम पर हिंसा का कीचड़ उछालेंगे, कमल उतना अधिक खिलेगा.’
 
बीच-बीच में देशभर के समाचार माध्यमों में त्रिपुरा में होने वाली राजनीतिक हत्याओं की बात छपती रहती है तो इन मुद्दों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए क्या कार्य करते रहते हैं?
 
अभी तक दिल्ली में ऐसा कुछ नहीं हुआ कि वहां के मामलों को लेकर, जिस पर व्यापक बात रख सकूं. पर किसी भी घटना के होने पर मैं हर जगह ई-मेल अवश्य भेजता हूं तथा सोशल मीडिया के सशक्त माध्यम फेसबुक पर भी संबंधित जानकारी एवं तस्वीरें अवश्य डालता हूं. त्रिपुरा को लेकर मैंने एक लेखक से किताब भी लिखवाई जिसका विमोचन मुंबई में वहां के मुख्यमंत्री के हाथों करवाया. प्रभात प्रकाशन की इस पुस्तक का हिंदी तथा अंग्रेजी अनुवाद भी शीघ्र आ रहा है.
 
वर्तमान में वहां भाजपा की क्या स्थिति है एवं संगठन को सशक्त बनाने की दिशा में क्या कार्य कर रहे हैं?
 
त्रिपुरा उत्तर-पूर्व का इकलौता राज्य है जहां भाजपा ने ‘पृष्ठ प्रमुख’ तक का संगठन विकसित किया है. अभी हर जगह वार्ड प्रमुख तक का संगठन होता आया है पर वहां पर हमने निर्वाचन सूची के प्रत्येक पृष्ठ पर एक कार्यकर्ता की नियुक्ति का लक्ष्य रखा है. त्रिपुरा के ४८ हजार पृष्ठों में से ३० हजार पृष्ठ प्रमुख तथा ९५ प्रतिशत तक बूथ प्रमुख बनाए जा चुके हैं. हमारे सारे मोर्चे बड़ी-बड़ी रैलियां कर रहे हैं. आपसे बातचीत के दौरान इस समय मैं अगरतला से साढ़े तीन घंटे की दूरी पर कैलास शहर में होने वाली महिला मोर्चा की रैली के लिए जा रहा हूं. महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष विजया रहाटकर जी भी अन्य मार्ग से वहां पहुंच रही हैं. हम लगभग रोज कहीं न कहीं मोर्चा कर रहे हैं. पूरा चुनावी माहौल बना हुआ है. ‘माय होम इंडिया‘ के माध्यम से असम के सिल्चर में रुग्ण सेवा केंद्र बनाया है जहां त्रिपुरा से प्रति दिन ३०० से ४०० मरीज आते हैं. बाहर रह रहे मतदाताओं की फर्जी वोटिंग रोकने के लिए भी कार्य किए जा रहे हैं.
 
सामाजिक समरसता को लेकर आपकी संस्था द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डालिए.
 
सामाजिक समरसता को लेकर मैं स्वयं काफी संवेदनशील हूं इसलिए बाबासाहब आंबेडकर का सही स्वरूप समाज के सामने लाने का प्रयास कर रहा हूं, जो कि समाज के सामने लाया ही नहीं गया. इस मामले में रमेश पतंगेजी तथा तथा दादा इगाते जी ने ऐतिहासिक कार्य किया है, जिससे मैं काफी प्रभावित रहा हूं. उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य जहां पर जाति व्यवस्था बहुत प्रबल है, वहां पर सामाजिक समरसता लाने के लिए हम व्यापक स्तर पर कार्य कर रहे हैं. वहां पर हम अति पिछड़ों की बस्ती में सवर्णों को ले जाकर ‘सह भोज’ कार्य करते हैं. दलित मित्र पुरस्कार तथा होनहार दलित छात्रों को उच्च शिक्षा हेतु छात्रवृत्ति भी देते हैं. आज भी देश के हजारों मंदिरों में दलितों का प्रवेश वर्जित है. ‘सबका देश, सबका प्रवेश‘ के तहत उन्हें उनका हक दिलवाने के लिए भी कार्य कर रहे हैं.

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