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महाराष्ट्र का विकास हिंदीभाषियों के साथ

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मायानगरी मुंबई की खासियत है कि यहां जो आता है, यहीं का होकर रह जाता है। उत्तर भारतीय भी यहां की आबोहवा में इतने विलीन हो चुके हैं कि परायापन कब विदा हो चुका यह उन्हें भी पता नहीं चला। मुंबई ने उन्हें बहुत कुछ दिया और उन्होंने भी मुंबई को अपनी मेहनत से खूब दिया। शेष महाराष्ट्र में भी इससे जुदा स्थिति नहीं है।

प्लास्टिक का दानव

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    प्लास्टिक का कूड़ा भारत ही नहीं विश्व के लिए समस्या बना बैठा है और उससे निजात पाने के लिए विभिन्न कदम उठाए भी जा रहे हैं, लेकिन अभी माकूल विकल्प मौजूद नहीं है। यदि पर्यावरण को बचाना है तो इस दानव से मुक्ति का मार्ग खोजना ही होगा।

‘रुग्ण नारायण’ का बसेरा सेवाधाम आश्रम

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’‘मानव तन खासकर रुग्ण, वंचित, बहिष्कृत, संक्रामक रोगों से ग्रसित जन की सेवा ही सर्वोपरि कही जा सकती है; क्योंकि सेवक और सेवित दोनों के संतुष्ट होने पर ही सेवा सार्थक मानी जा सकती है। ईश्‍वर भी आपसे तभी प्रसन्न होगा जबकि आप प्राणी सेवा के प्रति सजग हैं।

शुचिता चिंतन

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अंतरात्मा की प्रेरणा का सबब कही जा सकने वाली स्वच्छ जीवन पद्धतियों का अनुसरण व मार्गदर्शन प्राप्त करने की दिशा में निरंतर प्रयासरत रहना ही सफल मानव जीवन का भाव है। जीवन के हर क्षेत्र में शुचिता के बिना यह संभव नहीं है।

नौकरशाही में उलझे प्रदूषण के नियम

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केंद्र सरकार ने २०१५ के कड़े प्रदूषण नियमों को बदल कर उनमें ढील दे दी है. यह तो प्रदूषण पर आगे बढ़ने के बजाय पीछे लौटना हुआ. अतः २०१७ में संशोधित नियमावली को कचरे के डिब्बे में डाल कर २०१५ के मानकों को ही आदर्श के रूप में स्थापित कर उनका कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए.

‘माय होम इंडिया’ का पूर्वोत्तर में अलख

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पूर्वोत्तर में, विशेष रूप से त्रिपुरा में, आई राजनीतिक बयार ने वहां भाजपा और राष्ट्रवादी विचारों को बल प्रदान करने वाला माहौल पैदा किया है. केंद्र में श्री नरेंद्र मोदी की नई सरकार आने के बाद वहां लोगों का आत्मविश्वास बढ़ा है. प्रस्तुत है, त्रिपुरा की जमीनी हकीकत और समग्र पूर्वोत्तर के लिए समर्पित रूप से काम कर रही ‘माय होम इंडिया’ के श्री सुनील देवधर से हुई विशेष बातचीत के महत्वपूर्ण अंशः

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर सार्थक विहंगम दृष्टि

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वैसे तो ‘संघ’ शब्द के कई पर्याय हैं; मसलन वृंद, समुदाय, समूह, गण, झुंड इत्यादि। पर इस शब्द का प्रयोग करने पर सबसे पहली जो तस्वीर हम सबकी आंखों में आती है, वह है भगवा ध्वज तले सफेद व खाकी पहिरावे में ‘नमस्ते सदा वत्सले...’ की मधुरिमा से आलोकित स्वयंसेवकों का समूह जो निःस्वार्थ भाव से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपने आपको समर्पित करते हुए राष्ट्र भावना को सार्थकता प्रदान करते हैं। अपने प्रवास के ९ दशकों में तमाम कठिनाइयों, दबावों तथा प्रतिबंधों को परे करते हुए विश्व का सबसे बड़ा स्वयंस

विवेकानंद ही युवाओं के तारणहार

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अन्ना हजारे के आंदोलन की विफलता के बाद देश के युवाओं में आई हताशा को दूर करना और उनकी उम्मीदों को सकारात्मकता से जोड़कर उन्हें राष्ट्रीय और सामाजिक कार्यों से जोड़ना बहुत आवश्यक था। इस विशाल कार्य को करने के लिए प्रेरणा देने की स्वामी विवेकानंद के विचारों में ही अद्भुत क्षमता है। इन्हीं विचारों को लेकर डॉ. राजेश सर्वज्ञ ने विवेकानंद यूथ कनेक्ट की स्थापना की। प्रस्तुत है उनकी संस्था और कार्यों के बारे में उनसे हुई बातचीत के महत्वपूर्ण अंश-   अपनी संस्था व उसके निर्माण की प्रक्रिया के बारे में बताएं।अ

भरोसे की लक्ष्मण रेखा

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यौन शोषण के ज्यादातर मामलों में दोषी इतना नजदीकी होता है कि बच्चे की बात पर ध्यान ही नहीं दिया जाता या उसे संबंधित व्यक्ति से दूर रहने की सलाह देकर मामले की इतिश्री कर दी जाती है। इससे बच्चे कुंठित हो जाते हैं और हर जगह अपने आपको असुरक्षित मानने लगते हैं।   दुनिया भर के तमाम धर्मग्रंथों तथा वैज्ञानिक शोधों में भले ही लाख विरोधाभास दिखें पर एक बात तो सांकेतिक रूप से हर जगह से उभर कर आती है कि मनुष्य इस धरती का सब से नवीनतम प्राणी है। अगर सनातन धर्म की पुस्तकों तथा वर्तमान ज्ञात विज्ञान की ही बात कर

भूखे भजन न होय…

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जिंदगी हर मनुष्य का इम्तहान लेती है और किंवदंतियां बनाने वालों को भी सोचने पर मजबूर कर देती है। नहीं तो कभी भूख से मरने वाला यूनान का एक भिखारी ‘होमर’ आज वहां का राष्ट्रकवि बन जाता और भीख मांगने के दौरान गाई जाने वाली लंबी पद्यावलियों का संकलन आज विश्व की सर्वश्रेष्ठ क्लासिक रचनाओं में सर्वोपरि मानी जाती... शाम के पांच बज चुके हैं। धर्मपत्नी जी द्वारा जबरदस्ती कराए जा रहे उपवास या यूं कहूं कि प्रताड़ना की वजह से आंतें आपस में चिपक गई हैं। शरीर की समस्त इंद्रिया, जितनी भी होती होंगी (इस समय य

चुनौतियों से भरा उत्तर प्रदेश

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वर्तमान सरकार प्रचंड जनादेश तथा ‘पार्टी विथ डिफरेंस’ की सोच के साथ सत्ता में आई है इसलिए लोगों की अपेक्षाएं ज्यादा बड़ी हो गईं हैं। वर्तमान सरकार के सामने कई चुनौतियां हैं। पिछली सरकारों ने हालात इतने खराब कर दिए हैं कि उन्हें सुधारने

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