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सही मायनों में स्वच्छता ही है जो मनुष्य को पृथ्वी के सभी जीवों से उच्च श्रेणी में ला कर खड़ा करती है। पशुओं को इससे फर्क नहीं पड़ता कि उनके आसपास सफाई है या नहीं ; मगर मनुष्य के लिए स्वच्छता अनिवार्य है। लेकिन आज की भागती दौड़ती ज़िंदगी में स्वच्छता मात्र एक स्वप्न बन कर रह गई है। आज के समय में मनुष्य ने अपने सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य से ही मुंह फेर लिया है। हम सब बच्चपन से ही सुनते आ रहे हैं कि स्वच्छता में ही ईश्वर का वास होता है ; किन्तु आज की व्यस्त दिनचर्या में हमें शायद इस बात से फर्क ही नहीं पड़ता कि ईश्वर हमारे आसपास वास करते हैं या नहीं। आज देश की सरकार सहित कई मानव हितैषी संस्थाएं चिल्ला – चिल्ला कर आप लोगों को स्वच्छता के लिए जागरूक कर रही हैं, करोड़ों का फंड दिया जा रहा किन्तु आप इन सभी बातों को नज़रंदाज़ कर के अपने धुन में मग्न हैं। यदि ऐसा ही रहा तो वह समय दूर नहीं जब हमें सांस लेने के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर का उपयोग करना पड़ेगा। कहने को भले ही हम आधुनिक हो गए हों किन्तु सत्य तो ये है कि हमने अपने दायित्वों से मुख फेर लिया है।

आपको शायद यह जान कर आश्चर्य हो कि जिन समस्याओं का हल निकलने में हमारी आधुनिकता भी विफल होती जा रही है, उन समस्याओं से निपटना प्राचीन और मध्यकाल में एक सामान्य सी बात थी। इसका कारण सिर्फ यही है कि तब लोग इन्हें समस्या ना समझ कर अपना कर्म अथवा धर्म समझते थे। जिन योजनाओं पर सरकार आज करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी सफल नहीं हो पा रही उन सभी समस्याओं को प्राचीन काल में बहुत ही सामान्य रूप से हल कर दिया जाता था। आइए आपको अवगत करवाते हैं आज की ऐसी ही कुछ समस्याओं से जो हमारे आधुनिक होने के बाद भी हमारे लिए जटिल हैं किन्तु प्राचीन भारत में ना के बराबर संसाधन होने के बाद भी यह सब सरल था।

१ . श्रृंगवेरपुर : प्राचीन भारत में गंगा की स्वच्छता का प्रमुख उदाहरण

स्वच्छता की बात करें तो सबसे पहले हम हिन्दुओं की सबसे पवित्र नदी गंगा की बात करेंगे। हिन्दू मान्यताओं में हर शुभ कार्य में प्रयोग होने वाला गंगा जल इस बात का साक्षी है कि यह जल प्राचीन काल से हम भारत वासियों के लिए कितना पवित्र रहा है। किंवदंतियां ही नहीं अपितु इस बात को वैज्ञानिक रूप से भी साबित किया जा चुका है कि गंगा नदी का जल अन्य नदियों के जल से ज़्यादा शुद्ध और पवित्र है। किन्तु आज वही गंगा नदी हमारे कारण इतनी दूषित हो गई है कि करोड़ों रुपयों की लागत से तैयार की गई योजनाएं भी इसे स्वच्छ करने में असमर्थ दिख रही हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि पहले लोग सिर्फ गंगा को पवित्र मानते ही नहीं अपितु उसे शुद्ध व स्वच्छ रखने हेतु प्रयासरत भी थे।

प्राचीन भारत में लोग गंगा की स्वच्छता को ले कर कितने सचेत थे इसका प्रत्यक्ष प्रमाण श्रृंगी ऋषि की तपोभूमि श्रृंगवेरपुर है। दो हजार साल पहले कुषाण काल में यहां कनिष्क अथवा वासुदेव जैसे राजाओं का शासन था। यहां तीन विशाल गड्ढों के द्वारा जल शुद्ध करने की व्यवस्था थी। ये तीनों चेंबर बाढ़ आने पर पानी को पीने योग्य बनाने के लिए निर्मित किए गए थे। ये चेंबर ईंटों से निर्मित थे तथा एक एक कर के तीनों गड्ढों द्वारा बाढ़ के पानी को परिष्कृत किया जाता था। गंगा की धार को मोड़ कर यहां तक लाया जाता था। पहले चेंबर में पानी के साथ बह कर आया कचरा अलग हो जाता था। फिर जल गोलाकार कक्ष में स्वच्छ हो कर जलगुरुत्वाकर्षण ढलान के माध्यम से दूसरे चेंबर में प्रवेश करता था। हाइड्रोलिक सिस्टम को ध्यान में रखते हुए कक्ष के दोनों ओर ईंटों का बांध बनाया गया था जिससे पानी के साथ आई अशुद्धियां आगे ना जा पाएं। यहां से तीसरे चेंबर में पहुंच कर जल एकदम शुद्ध हो जाता था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक डॉ . बी . बी . लाला ने अपनी पुस्तक ‘ इंडिया आर्कियोलॉजिक रिव्यू तथा एंसिएंट इंडिया ’ में इसका वर्णन किया है। श्रृंगवेरपुर में गंगा संरक्षण का यह उदाहरण धरोहर के रूप में स्थापित है।

२ . प्राचीन भारत में पर्यावरण नीति

पिछले दिनों धुएं की घुटन से स्वच्छ सांसों के लिए तड़पती दिल्ली को देखते हुए पर्यावरण को लेकर चिंता और बढ़ गई है। किन्तु इसका कारण भी तो हम लोग ही हैं। हमने घंटों के सफर को मिनटों में, दिन के सफर भर के सफर को चंद घंटों में और कई दिनों के सफर को आधे दिन में तय करने की आदत डाल ली है। अब इन सुविधाओं के लिए जिन संसाधनों का हम उपयोग कर रहे हैं उनके ही दुष्प्रभावों ने हमारी आयु को औसत से भी कम कर दिया है। हम जैसे – जैसे अपनी परम्पराओं को भूलते गए वैसे – वैसे प्रकृति से हमारा संबंध टूटता गया और यही कारण है कि आज हमें शुद्ध हवा, शुद्ध पानी, शुद्ध वातावरण के लिए तरसना पड़ रहा है।

प्राचीन भारत और मध्य भारत का पर्यावरण से कितना गहरा लगाव था इसका प्रमाण पूरे विश्व के सामने है। उस समय लोगों का प्रमुख ध्येय प्राकृतिक व्यवस्था के साथ तारतम्य रखना था। मनुस्मृति अथवा उपनिषदों के नियम पढ़ कर आप जान सकते हैं कि वैदिक संस्कृति का पर्यावरण के प्रति प्रेम किस हद तक था। यह प्रेम ही था जिसके कारण सभी प्राकृतिक शक्तियों को देवता स्वरूप माना गया। नदियों को माता की उपाधि दी गई तथा उनकी शुद्धता का ध्यान रखा गया, सूर्य को देवता कह कर उनके सामने सिर झुकाया गया, तुलसी, पीपल, केले, बरगद इत्यादि सैकड़ों पेड़ – पौधों को देवता स्वरूप मान कर उनमें जल अर्पण करने की परम्परा चलाई गई। इन नियमों के कारण ही जल, वायु अथवा वातावरण की शुद्धता सदियों तक बनी रही। किन्तु आज जैसे – जैसे हमने अपनी जड़ों से नाता तोड़ा वैसे ही एक के बाद एक प्रकृति का प्रकोप भी हमें झेलना पड़ा।

३ . शौचालय को घर तक ले आए

जैसा कि हम जानते हैं आज हमारे देश में हर घर में शौचालय बनवाने की मुहिम ने तेजी पकड़ ली है। यह सही भी है कि शौच शौचालय में ही हो तो अच्छा है। किन्तु पुराने समय में लोगों का शौच के लिए घर से बाहर जाना भी गलत नहीं था। हां स्त्रियों के लिए यह गलत कहा जा सकता है किन्तु पुरुषों द्वारा यह कर्म एक तरह से उपयोगी था। हम सब जानते हैं कि इंसानी मल जैविक खाद का उम्दा नमूना है। इसी कारण पहले लोग मल त्याग करने अपने खेतों में जाया करते थे। घर में शौचालय को बीमारी का घर माना जाता था, आज भी आप गांव में जा कर देखें तो आप पाएंगे कि अधिकांश लोगों ने शौचालय घर से बाहर बनाए हुए हैं। एक तरह से रसोई के बगल में शौचालय का होना बीमारियों को खुला निमंत्रण है। किन्तु आजकल यह शहरी जीवन के लिए एक तरह की मजबूरी बन गई है। दूसरी तरफ खुले में शौच का विरोध इसलिए भी किया जा रहा है कि पहले की तरह लोग शौच के लिए खेतों का प्रयोग ना कर, रेलवे ट्रैक, खुले रास्तों अथवा नदी किनारों का प्रयोग कर रहे हैं जो पूरी तरह से गलत है।

हम भले ही कितने ही पढ़े लिखे क्यों ना हो जाएं किन्तु हमें तब भी अपने पूर्वजों और अपने अतीत से सीखने की जरूरत पड़ती रहेगी। प्राचीन भारत की कई तरह की तकनीकों से हम आज को बेहतर बना सकते हैं। बात चाहे नदियों के संरक्षण की हो, पर्यावरण की हो अथवा बरसात के पानी से अशुद्धियां निकाल कर जल आपूर्ति की, इन सब में आधुनिक भारत प्राचीन भारत से बहुत कुछ सीख सकता है।

मोबा . ९६५०५४५९९२

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