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हरियाणा की पवित्र भूमि सदा से ही सनातन सभ्यता का महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु रही है। उसी पवित्र भूमि पर लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ने मोहग्रस्त कौन्तेय को जीवन व कर्म का पाठ पढ़ाया था। जैमिनी, सांख्य दर्शन के सृजनकार कपिल मुनि, च्यवन, भृगु, भारद्वाज, पिप्लाद तथा उदालक मुनि जैसे असंख्य महापुरुषों के श्री चरणों की पगधूलि से निरंतर पवित्र रहने वाली हरियाणा की भूमि का कण – कण अत्यंत पावन है तथा धार्मिक भाव रखता है। उच्च कोटि की तमाम आत्माओं की इसी श्रेणी में हरियाणा की पवित्र भूमि ने देवकीनंदन जिंदल नाम के सपूत को भी जन्म दिया जिसने आगे चल कर विश् ‍ व हिंदू परिषद कोंकण प्रांत में हिंदू संस्कृति की अनन्य उपासना कर अपनी सेवा साधना से समाज में हिंदू चेतना के निर्माण में एक नवीन व अनुपम अध्याय जोड़ा।

विक्रम संवत १९९९ में लीलाधर श्रीकृष्ण की ही भांति जन्माष्टमी को भिवानी में जन्मे श्री जिंदल सन् १९६३ में मुंबई शहर आए तथा भगवान कृष्ण की द्वारिका की ही भांति इस शहर ने उनका ऐसा मन मोहा कि वे यहीं के होकर रह गए हैं।

व्यापारिक अनुभव की शुरुआत अपने मामाजी के लोहे के कारोबार से की पर शीघ्र ही उन्हें समझ में आ गया कि उनकी राह कहीं और है। और फिर शुरू हो गई एक जीवट संकल्प यात्रा जिसने एक खोली ( मुंबई की चॉल के रहिवासी घर ) से आरंभ होकर यहां तक की भगीरथ यात्रा प्राप्त की है। जिंदल भाइयों के व्यवसाय का विस्तार मुंबई महानगर के साथ ही देश की राजधानी दिल्ली में भी काफी बड़े पैमाने पर फैल चुका है। व्यापार के अलावा ५ भाइयों तथा ३ बहनों वाले एक बड़े परिवार को एक सूत्र में बांध कर चलते हुए समस्त सामाजिक दायित्वों का निर्वहन भी किया है।

उनकी सामाजिक यात्रा का प्रारंभ देश की सर्वाधिक लोकप्रिय एवं सर्वश्रेष्ठ रामलीलाओं में से एक मानी जाने वाली ‘ श्री रामलीला प्रचार समिति ’ की रामलीला की शुरुआत से लेकर उसे शीर्ष स्थान पर स्थापित करने से लेकर हुई। सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि आश् ‍ विन नवरात्रि में रामलीला का मंचन लगभग चार दशकों से एक ही मंडली द्वारा एक ही स्थान पर किया जाता रहा है। यह मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति का ही परिणाम है। इस रामलीला को शुरू करवाने में उनके बहनोई गौरीशंकर गुप्ताजी ने भी काफी मदद की। उन्होंने मुरादाबाद के रामलीला कर्मियों से मुलाकात करा कर ज्यादा से ज्यादा जानकारियां उपलब्ध कराईं। इस प्रकार १९८२ में ३१ हजार रुपए से शुरू हुई रामलीला आज देश की तीन सर्वश्रेष्ठ रामलीलाओं में गिनी जाती है।

मालाड की रामलीला के सफल आयोजन की नींव ने उनके भविष्य के गगनचुंबी कंगूरे की शुरुआत कर दी थी। डॉ . श्याम अग्रवाल, सुरेश भगेरिया, किशोर रामुका, वीरेंद्र याज्ञिक जैसे हिंदू चेतना के प्रखर प्रहरियों के प्रति लगाव रामलीला को लेकर भले ही शुरू हुआ हो पर उसी ने केशवसृष्टि के प्रति उनके मन में कुछ कर गुजरने की चाहत पैदा कर दी। सर्वप्रथम आचार्य धर्मेंद्र की कथा का आयोजन करवा कर आयोजन समिति के अध्यक्ष बने तथा समय – समय पर प्रकल्प के लिए मुक्त हस्त दान करते रहे हैं। इस सेवा यज्ञ ने ‘ केसवसृष्टि ’ के सेवा प्रकल्प को इतना समरस कर दिया कि आज ‘ केशवसृष्टि ’ सेवा की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण तीर्थ बन चुका है। वर्तमान में भी आप वहां गोसेवा परिषद के अध्यक्ष के रूप में वहां स्थापित गौशाला में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, जो गौसेवा के क्षेत्र में एक कीर्तिमान है।

विश् ‍ व हिंदू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष रमेश मेहता ने रामलीला के मंच से अचानक घोषणा कर दी कि, ‘ मुंबई के मार्वे और ओशिवरा जिले के लिए विश् ‍ व हिंदू परिषद के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी देवकीनंदन जिंदलजी को दी जाती है।’ जिंदलजी ने विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया पर उनके प्रेमियों ने एक न सुनी। ठीक उसी प्रकार एक दिन उनके घर पर पहुंच कर मेहताजी और व्यंकटेश आबदेव ने घोषणा कर दी कि अब आप कोंकण प्रांत की जिम्मेदारी स्वीकारें।

इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का निर्वहन करने में भी उन्होंने कोई कोताही नहीं रखी। कार्यकर्ताओं के साथ कई महत्वपूर्ण बैठकें कीं तथा सम्पर्क अभियान में और तेजी लाने का प्रस्ताव रखा, सभी के साथ विचार – विमर्श कर कार्य विस्तार का निर्णय किया। उनका हमेशा से ही यह विचार रहा है कि कोई भी संगठन किसी एक व्यक्ति के बल पर नहीं चल सकता। किसी भी संगठन के सफल प्रवास के पीछे उस संगठन विशेष के हर सदस्य की सम्पूर्ण भागीदारी आवश्यक है। विश् ‍ व हिंदू परिषद, बजरंग दल, दुर्गावाहिनी जैसे तमाम संगठनों के इतने व्यापक विस्तार के पीछे समर्पित कार्यकर्ताओं के कष्ट, त्याग और समर्पण का योगदान है। जिंदलजी और उनकी सेवाभावी टीम का ही परिणाम है कि विश् ‍ व हिंदू परिषद के देश के सभी ४४ प्रांतों के अग्रणी प्रांतों में कोंकण प्रांत का भी नाम लिया जाता है। जाहिर सी बात है कि इस सफलता के पीछे उनकी सफल नेतृत्व नीति तथा सभी कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलने की भावना का बहुत बड़ा हाथ रहा है। वे हमेशा ही स्वयंसेवकों का उत्साहवर्धन करते रहे हैं।

जिंदलजी के प्रखर व्यक्तित्व का मात्र इतना ही रूप नहीं है, बल्कि इसमें काफी फैलाव है। हिंदुत्व के प्रखर प्रतिनिधि होने के साथ ही साथ वे मानव सेवा के सुकुमार व सुकोमल संवाहक भी हैं। वात्सल्यमूर्ति परमपूज्या साध्वी ॠतम्भरा ( पूज्य दीदी मां ) की कर्मस्थली वात्सल्य ग्राम, वृंदावन में प्रति वर्ष सुप्रसिद्ध नेत्र विशेषज्ञ डॉ . श्याम अग्रवाल एवं उनके सेवा समर्पित डॉक्टरों की टीम द्वारा आप अनेक नेत्रमणि यज्ञ एवं चिकित्सा शिविरों का आयोजन करते हैं, जिसके फलस्वरूप वृंदावन तथा आसपास के गावों के हजारों लोग लाभान्वित होते हैं। सेवा के इसी प्रकार के अन्य आयोजन आदिवासी क्षेत्र विक्रमगढ़ में सामूहिक विवाह का हर साल आयोजन तथा शिक्षा क्षेत्र में जरूरतमंद विद्यार्थियों को आर्थिक सहायता भी देते रहते हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका बहुत विशिष्ट योगदान रहा है। मालाड में नवचेतना ट्रस्ट की स्थापना से ट्रस्ट के ट्रस्टी तथा इस ट्रस्ट के अंतर्गत डी . जी . खेतान इंटरनेशनल स्कूल, जे . कुमार इंटरनेशनल स्कूल एवं बिलासराय काशीनाथ गाडिया जूनियर कॉलेज के उपाध्यक्ष के रूप में तीनों विद्यालयों का मार्गदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने पहले ही घोषणा कर दी थी कि रामलीला समिति के लिए २५ वर्ष कार्य करने के उपरांत मैं कोई पदभार ग्रहण नहीं करूंगा इसीलिए पिछले ग्यारह वर्षों से मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। सुसंकार एवं मर्यादा जैसे राम दर्शन के मुख्य तत्वों का वे जीवन में भी पालन करने में पूर्ण विश् ‍ वास रखते हैं इसीलिए ७५ वर्ष की उम्र में भी वे नई पीढ़ी को कर्म, सत्य, सेवा व परोपकार जैसे जीवन मूल्यों के प्रति सजग कर भविष्य को उज्ज्वल बनाने की दिशा में निरंतर कार्यरत हैं।

मोबा . ९८२०२१९१८१

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