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भारत का नंदनवन कह लाने वाला कश्मीर। भले ही आज कुछ सिरफिरे लोगों एवं अलगाववादी नेताओं की कोशिश कश्मीर को भारत से अलग करने की हो सकती है फिर भी ऐसा कुछ है कि कश्मीर का वजूद भारत के साथ रहने में ही है। कश्मीर की अधिकांश जनता भी यह सब समझती है क्योंकि वह पाक अधिकृत कश्मीर के लोगों का बुरा हाल देख रही है। कश्मीर की इस विषम परिस्थिति में भारत के अन्य भागों से प्रतिवर्ष हजारों सैलानी गर्मियों में एवं बर्फ गिरना प्रारंभ होते समय वहां के वातावरण का आनंद उठाने हेतु जाते हैं। कुछ एक घटनाओं को छोड़ दें तो सैलानियों को वहां अत्यंत आनंद आता है एवं वे इसे स्वर्ग की उपमा देते हैं।

सन् २०१४ की बरसात में जम्मू – कश्मीर में आयी प्रलयंकारी बाढ ने लाखों परिवारों को तबाह कर दिया। इस एक विपदा के कारण धरती के स्वर्ग के सैकड़ो लोग मौत के मुंह में समा गये। लाखों लोग नारकीय जीवन व्यतीत करने को मजबूर हो गये। कश्मीर का कोना – कोना बर्बादी की कहानी कह रहा था। जो चले गये वे न जाने कितनों को रुला गये और जो रह गये थे उन्हें न जाने कब तक रोना पड़ा था। उस समय कश्मीर अनाथ बच्चों, विधवा माताओं – बहनों और लाचार लोगों का प्रदेश बन कर गया था।

इस हालात में काश्मीर पुकार रहा था परोपकारी सहृदय लोगों, सेवाभावी संस्थाओं को। हालांकि सरकारी तंत्र युद्धस्तर पर राहत कार्य कर रहा था, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने फौरन राज्य का हवाई दौरा कर १००० करोड़ की मदद का ऐलान किया। इसके अलावा राज्य के लोगों को हर तरह से सहायता पहुंचाने का भी आदेश दिया। परंतु बाढ़ की विभीषिका इतनी भथावह भी कि उसने उत्तराखंड की स्थिति की याद ताजी कर दी।

श्मीर के कुछ लोग, अलगाववादी तथा पड़ोसी पाकिस्तान क्या सोचता है ? इन सबसे ऊपर उठकर समस्त भारतवर्ष के करोड़ों हाथ सेवा कार्य हेतु उठ गये। विभिन्न प्रांतों की सरकारों ने भी अपने अपने स्तर पर कश्मीर को नगद एवं वस्तुओं के रूप में सहायता भेजी। विभिन्न सेवाभावी संस्थाओं से सीधे वहां पंहुचकर या वहां की स्थानीय संस्थाओं के मिलकर राहत कार्य शरू कर दी। यह अलग बात है कि कुछ अलगाववादी नेताओं ने सरकारी सहायता या अन्य समाजसेवा संस्था की सहायता से भरी नावों को छीनकर उन्हें अपनी सहायता बताने का ढोंग रचा। भारतीय सेना के जवानों ने, जिनपर कश्मीर युवक पत्थर फेंकने में अपनी बहादुरी समझते हैं, जिस प्रकार कश्मीर के कोने कोने में रह लोगों को सहायता पहुंचाई, वह तो काबिले तारीफ थी।

ऐसी स्थिति में समस्त महाजन संस्था कैसे पीछे रह सकती थी। संस्था के सदस्यों ने कश्मीर पंहुचकर जी जान से सेवा कार्य प्रारंभ कर दिया। उन्होंने उत्तराखंड के सेवा कार्यों की पुनरावृत्ति कर दी।

जैसे ही यह सैलाब आया समस्त महाजन के कार्यकर्ता कश्मीर पंहुच गये। उनका इरादा तो वहां पहले सर्वेक्षण करने का था, लेकिन वहां पहुंचने के बाद पता चला कि न तो बिजली की आपूर्ति है और न ही डीजल उपलब्ध है। यहां तक की संपर्क सेवाएं भी पूरी तरह से ठप्प पड़ी थी। चारों ओर पानी ही पानी का सैलाब था, लेकिन लोग प्यास से तड़प रहे थे। पीने का पानी तक नसीब नहीं हो रहा था। सारे तंत्र तबाह हो गये थे। राज्य देश के बाफी हिस्सों से कट चुका था। ऐसी स्थिति में सबसे जरूरी था लोगों को बाढ़ की विभीषिका से बाहर निकालना। उनके लिये भोजन एवं पेयजल की व्यवस्था करना। यहां तक कि खाना पकाने के लिये ईंधन तक उपलब्ध कराना था। यह सब देखने के बाद समस्त महाजन ने शुक्रवार १२ सितंबर २०१४ को राहत सामग्री के साथ सात लोगों की एक टीम श्रीनगर हेतु रवाना की। वहां पंहुचकर उसने श्रीनगर के रामबाग में कैंप लगाकर भूख से तड़प रहे लोगों की क्षुधापुर्ति हेतु भोजन मुहैया कराना प्रारंभ किया। २५ – ५०नहीं, रोजाना सात से आठ हजार लोगों को गरम – ताजा भोजन मुहैया कराया जाने लगा। लेकिन सवाल यह था कि भोजन का यह सिलसिला कब तक चलाया जाये आखिरकार उन्हें कब तक इस हाल में छोड़ा जा सकता है। उन्हें पुर्नस्थापित तो करना ही होगा। इस हेतु संस्था ने जरूरतमंद परिवारों को एक महीने की किट मुहैया कराने की योजना बनाई। इस किट में खाद्यान्न, मसाला आदि से लेकर बिस्तर तक तमाम घरेलू उपयोग के सामान का समावेश था। प्रत्येक किट की कीमत ५००० /- थी। दरअसल सच्चाई यह थी कि राज्य के दूरदराज के पहाड़ी इलाकों में तब तक भी राहत नहीं पहुंचाई जा सकी थी। अत : समस्त महाजन ने समस्त देशवासियों से अपील की थी कि वे इस महान कार्य में सहभागी बनने आगे आयें और मुक्तहस्त से दान दे कर बाढ़ पीडितों को मुसीबत की इस घड़ी से बाहर निकालने में अपना योगदान दें। देश की जन्नत कहे जानेवाले इस राज्य को, जो नदी में तब्दील हो चुका है, पुन : स्वर्ग बनाने में योगदान दें। संस्था को इस अपील का सकारात्मक उत्तर प्राप्त हुआ।

इस संदर्भ में ‘ समस्त महाजन ‘ द्वारा कश्मीर में संपन्न सेवा कार्यो का लेखा जोखा निम्नानुसार है –

* ५२ हजार से अधिक बाढ़ पीड़ितों को ताजे – गर्म दाल – चावल का भोजन

* दो किलो चावल, एक किलो दाल, एक किलो राजमा ८००० परिवारों को दिया गया।

* २५०० कम्बलों का वितरण

* अपोलो हॉस्पीटल के श्रीनगर में कार्यरत ४० डॉक्टरों की टीम को दवाइयों का स्टॉल मुहैया कराया गया।

* सोमवार बाग के बाढ़ग्रस्त इलाकों में ९७० परिवारों की सहयता की गई

* श्रीनगर से सुदूर स्थित अनंतनाग क्षेत्र में बाढ़ के कारण अपना सर्वस्व गंवा चुके १५०० परिवारों को घरेलू उपयोग के सामान, अनाज, गेंहू, कम्बल इत्यादि की ५००० /- की दिट प्रदत्त

* कश्मीर इलाके के हॉस्पीटल – दवाखानों में नष्ट चीजों की जगह नई चीजें लगाई गई।

* कश्मीर के स्कूल – कालेजों में अत्यावश्यक शैक्षणिक चीजें, कम्प्यूटर प्रदत्त

* अनाथाश्रमों, वृद्धाश्रमों को आवश्यक सहायता एवं वस्तुएं उपलब्ध कराई गई।

‘‘ समस्त महाजन ‘‘ द्वारा की गई इस सेवा की कश्मीर सरकार एवं के अन्य गैर सरकारी संगठनों द्वारा सराहना की गई।

मोबा . ९८९३४३६९५१

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