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**** प्रतिनिधि****

 यह भी सच है कि केवल मांस पेशियों को सशक्त करने, शक्ति संपन्न होने जैसे एकांगी विचार भी शरीर-विकास की दृष्टि से योग्य नहीं हैं। शरीर के साथ साथ मन को भी समर्थ बनाने वाली पद्धति का अवलंबन करना होगा और ऐसी पद्धति योग ही है।

             मानव शरीर एक यंत्र है। इस यंत्र के अनेक भाग हैं, उसके       अनेक पुर्जे हैं। एक पुर्जा अनेक भागों के संचालन में भाग लेकर शरीर को कार्यरत एवं कार्यश्रम रखता है। उदाहरण के लिए यदि हमें इन भागों को बताना है तो जैसे रक्ताभिसरण संस्था, श्वसन संस्था, पचन संस्था, मूत्र संस्था, नर्वस सिस्टम इ।

 ये सभी भाग वर्णन की दृष्टि से भले ही अलग-अलग बताए गए हो लेकिन इनका काम एकात्मिक है। यदि किसी एक संस्था का संतुलन बिगड़ता है तो दूसरी पर इसका प्रभाव पड़ता है।

 मानवी शरीर का बाहरी जगत से संबंध श्वसन एवं पचन संस्था के माध्यम से होता है। अच्छे प्रकार से श्वसन न करने से, या श्वसन मार्ग में अवरोध निर्माण होने से या इन्फेक्शन से इस संस्था के कार्य में गडबड़ी उत्पन्न हो सकती है। इसी प्रकार अत्यधिक खाने से, पथ्य की चिंता न करने से, दूषित अन्न खाने से या व्यायाम न करने से पचन संस्था में खराबी उत्पन्न हो सकती है।

 सामान्यत: अपचन, भूख न लगना, आम्लपित्त इस प्रकार के विकारों से सर्वप्रथम स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। इन्हें हम पायलट प्रोजेक्ट की तरह पायलट रोग कह सकते हैं। सर्व प्रथम हम इसी विषय पर एवं योग से उसका उपचार इस विषय पर विचार करें।

 पाचन संस्था पर असर डालने वाले आसन

 साधारणत: आहार के नियम पालन न करने से सुपाच्य आहार न ग्रहण करने से, अत्याधिक फास्ट फूड खाने से पचन संस्था पर विपरीत परिणाम होता है। योगशास्त्र संयम सिखाता है। अत: किसी भी आसन का विचार करने के पूर्व खाने में संयम बरतना अति आवश्यक है। जब भी इच्छा हो तब खाना, किसी भी प्रकार का आहार ग्रहण करना एवं बाद में उससे होने वाले घातक परिणामों की रोकथाम के आसन करना यह संभव नहीं है।

 अपच, भूख न लगना, एसिडिटी, गैसेस, पेट दर्द, बवासीर ये प्रमुखत: पचन संस्था के रोगों के नाम हैं। इनसे नीचे लिखे आसन करने से मुक्तता पाई जा सकती है।

 पीठ के आसन

 पवनमुक्तासन- गैसे कम होती हैं। पचन एवं मलनि:सारण में सुधार आता है। लीवर व आंतड़ियों की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। पेट की चर्बी कम होती है।

 सर्वांगासन- अपचन व मलबद्धता में कमी।

 हलासन- पेट पर दबाव आने से पेट की इंद्रिया कार्यक्षम बनती हैं। अपच, गैसेस पर उपयोगी।

 पेट के आसन

 सर्पासन/भुजंगासन- पेट के निचले भाग पर तनाव आता है। पेट की इंद्रियों की मालिश होती है।

 धनुरासन- लीवर कार्यक्षम होकर पचन क्रिया सुधरती है। पेट की चर्बी कम होती है।

 मयुरासन- बद्धकोष्ठता, लीवर की कमजोरी, अपचन इ. विकारों पर प्रभावी आसन।

 बैठ कर करने के आसन

 वज्रासन- यह एकमात्र ऐसा आसन है जो भोजन के बाद किया जा सकता है। पांच से दस मिनट तक इस आसन को करने से पचन संस्था प्रदीप्त होती है। इसके अलावा मन:शांति प्राप्त होती है जिससे अन्न पचन में मदद होती है।

 पश्चिमोत्तानासन- पेट की सभी इंद्रियों जैसे लीवर, आंत, प्लीहा इ. पर दबाव निर्माण होता है जिससे पाचन शक्ति सुधरती है।

 अर्धमत्स्येंद्रासन- उदर में जमा रक्त का नि:सारण होता है। अन्न पचन में सहायता। अपच, गैसेस, इ. रोगों पर प्रभावी।

 उष्ट्रासन- लीवर, स्वादुपिंड व आंतों की कार्यक्षमता में वृद्धि।

 खड़े होकर करने वाले आसन

 जानुशिरासन- इस आसन से पश्चिमोत्तानासन के लाभ प्राप्त होते है।

 उर्ध्वहस्तकरिवक्रासन व समानहस्तकरिचक्रासन- पेट सफाई में उपयोगी।

 श्वसन संस्था पर परिणाम करने वाले आसन

 सर्दी, खांसी, दमा, ब्रांकायटिस इ. श्वसनसंस्था के रोग हैं। नाक, श्वासनलिका, एवं फेफड़ों को निरोगी रखने में कपालभाती, उज्जार्या जैसी क्रियाओं के साथ यदि कुछ आसन की नित्य किए जाएं तो ऊपर वर्णित रोगों से दूर रहा जा सकता है।

 दमा रोग में सांस लेने में तकलीफ होती है। ऐसे समय छाती का विस्तार करने वाले आसन ज्यादा सांस लेने में मददगार हैं। श्वसन मार्ग खुला रखने, फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ाने, श्वसन क्रिया में मदद करने के लिए नीचे लिखे आसन उपयोगी हैं।

 उत्थितपादासन, शीर्षासन, सर्वांगासन ये श्वसन क्रिया में मदद करने वाले स्नायुओं की कार्यक्षमता बढ़ाते हैं।

 कमर को पीछे झुकाकर छाती का विस्तार करने वाले सभी आसन-उष्ट्रासन, कंधरासन, मत्स्यासन, भुजंगासन, धनुरासन, सूर्य नमस्कार में का उर्ध्वनमस्कारासन।

 रक्त प्रवाह पर प्रभाव डालने वाले आसन

 सिर से पैर की अंगुली तक पूरे शरीर में यदि रक्त प्रवाह अच्छा है तो उस मनुष्य को निरोगी कहा जा सकता है। रक्त प्रवाह संस्था के मुख्य विकार याने रक्त जमा होना, नसों का सिकुड़ना, रक्त में हिमोग्लोबिन, व्हाइट सेल्स का कम ज्यादा होना, शरीर के किसी भी भाग में रक्त की कमी होना, इ. हैं। इसके कारण थ्रांसोसिए, उच्च या निम्न रक्तचाप, हृदय विकार, स्ट्रोक, एनिमिया इ. विकार उत्पन्न होते हैं।

 रक्त प्रवाह ठीक रहे इसके लिए शीर्षासन, सर्वांगासन, सूर्य नमस्कार, रोलिंग के प्रकार साथ ही खडे होकर, पीठ के, पेट के बल करने वाले १-२ आसन रोज करना चाहिए।

 पेट एवं पेट के निचले भाग में यदि रक्त प्रवाह ठीक नहीं है तो पद्मासन, वज्रासन, गोमुखासन, द्रोणासन, पश्चिममोत्तानासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन, भुजंगासन, शलभासन इ. आसन उपयुक्त हैं।

 

मस्तिष्क पर परीणामकारी आसन

 मस्तिष्क के कारण वासना, इच्छा, आकांक्षा, राग, लोभ, द्वेष, प्रेम, वात्सल्य इ. भावनाओं की अनुभूति मनुष्य को होती है। उस पर नियंत्रण रखना योग का परम उद्देश्य बताया गया है। इसी को भगवान पतंजलि चित्तवृत्ति निरोध कहते हैं। यमनियमों का पालन, आसनों का अभ्यास, प्राणायाम के द्वारा मन पर नियंत्रण व मन की स्थिरता प्राप्त होने के लिए योग का अनुष्ठान करना पड़ता है। इसके लिए शीर्षासन, सर्वांगासन, सूर्य नमस्कार, हलासन, पवनमुक्तासन, धनुरासन, मत्स्यासन, गर्दन के व्यायाम इ. करने होंगे।

 व्यायाम से, चलने से, दौड़ने से, सायकल चलाने से, तैरने इ. से शरीर की मांस पेशियों को मजबूत करने के साथ साथ आसनों के द्वारा उन्हें लचीला बनाकर दीर्घकाल ध्यान धारणा हेतु पद्मासन, वीरासन, सिंहासन में बैठने के लिए तैयार करना इन आसनों के अभ्यास का मुख्य उद्देश्य है यह बात हमेशा ध्यान में रहनी चाहिए।

 अंत:स्रावी संस्था

 दायपोथॅलॅयस, पिच्युटरी, पिनल, थायमस, थायराइड़, अड्रेनल, पंक्रिया, ओवरीज, टेस्टिज ये अंत:स्रावी ग्रंथियां हैं। इनसे निकलने वाले हार्मोन्स किसी तानाशाह के समान शरीर व मन पर राज्य करते हैं। ये ग्रंथियां पूरे शरीर को नियंत्रित करती हैं। हार्मोन्स के असंतुलन के कारण मोटापा, तनाव, थकान, अधिक नींद आना, शिथिलता, वजन बढ़ना, त्वचा रुखी होना, मासिक धर्म में अतिस्राव, श्वेत प्रदर, कोलेस्ट्रॉल बढ़ना, मांस पेशियों में क्षीणता, नाड़ी का अनियमित चलना, हड्डियों से संबंधित रोग, धमनियों का सिकुड़ना, मंदाग्नि, मधुमेह, निराशा, उदासीनता, हृदय विकार, स्ट्रोक इ. अनेक प्रकार की बीमारियां उत्पन्न होती हैं।

 आज की इस दौड़भाग की जिंदगी, निसर्ग से दूर छितरा जीवन, स्पर्धात्मक जीवन एवं तनावभरी जिंदगी में यदि मनुष्य के हार्मोन्स-संतुलन में गड़बड़ी न हो तो ही आश्चर्य! और उपर्युक्त बीमारियों की सूची देखने के बाद हार्मोन्स संतुलन के लिए केवल कुछ आसनों का सुझाव देना मुश्किल ही है। परंतु फिर भी यदि अंत:स्रावी संस्था को निरोग रखना है तो उसके लिए शीर्षासन, सर्वांगासन, सूर्य नमस्कार, हलासन, पश्चिमोतानासन, योगमुद्रा, प्राणायाम, ओंकार साधना और शवासन का विशेष उल्लेख करना पड़ेगा।

 कंकालीय संस्था एवं स्नायु संस्था

 यहां हम शरीर की अस्थियां, जोड़ एवं स्नायु का एकत्रित विचार करेंगे। बच्चों की उम्र के साथ साथ उनकी शरीर वृद्धि में ऊंचाई, वजन, छाती का घेरा, मांस पेशियों की ताकत में वृद्धि अपेक्षित रहती है। तना हुआ शरीर एवं सुडौल मांसपेशियां ये सशक्त व्यक्ति के लक्षण हैं। शरीर वृद्धि आहार पर निर्भर है। परंतु भरपूर खाने को मिल रहा है फिर भी अपेक्षित शरीर वृद्धि नहीं हो रही है ऐसा कई बार देखने में आता है। निरामय आरोग्य हेतु शरीर को शक्ति, सहनशक्ति व लचीलापन इन बातों की आवश्यकता होती है। यह यदि प्राप्त करता है तो शरीर के फालतू लाड़ नहीं करने चाहिए। यह जितना सच है उतना ही यह भी सच है कि केवल मांस पेशियों को सशक्त करने, शक्तिसंपन्न होने जैसे एकांगी विचार भी शरीर-विकास की दृष्टि से योग्य नहीं हैं। शरीर के साथ साथ मन को भी समर्थ बनाने वाली पद्धति का अवलंबन करना होगा और ऐसी पद्धति योग ही है। आज ऐसा अनेक बार देखने में आता है शरीर से बलवान अनेक व्यक्ति मानसिक आघात को सहन नहीं कर पाते हैं।

 

व्यक्ति का ८ से २५ वर्ष अर्थात १७ वर्ष का कालखंड यह आगे के संपूर्ण निरामय जीवन की नीव है। ऐसा कहा जा सकता है। ऐसा कहने का दूसरा एक महत्व का कारण यह भी है कि इसी कालखंड में अंत:स्रावी ग्रंथियों में से निकलने वाले ह्यूमन ग्रोथ हारमोन्स एवं सेक्स हारमोन्स अपना प्रभाव दिखाना प्रारंभ करते हैं। प्रारंभ से ही यदि उनका योग्य प्रकार से नियोजन किया जाए तो भविष्य में पछतावा करने की नौबत नहीं आएगी। हार्मोनिक असंतुलन का परिणाम हड्डियों व मांस पेशियों पर होता है इसलिए यह सावधानी आवश्यक है।

 उम्र के आठवें वर्ष में बच्चे को ओंकार, गायत्री मंत्र एवं सूर्य नमस्कार की दीक्षा देकर उसको योग साधना हेतु प्रवृत्त करना चाहिए। सूर्य नमस्कार एक ऐसा प्रभावी साधन है जो मनुष्य को सिर से पैर तक भरपूर ऊर्जा प्राप्त कराता है। इससे शरीर सशक्त बनता है एवं स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है। इसके साथ ओंकार जाप करने से मन की शक्ति बढ़ती है, हड्डियां मजबूत होती हैं, मांस पेशियां मजबूत होकर लचीली बनती हैं। रक्त के सभी घटक योग्य प्रमाण में रहते हैं। सबीज सूर्य नमस्कार के कारण कफ नाश, आंत, आमाशय, यकृत, नाभि स्थान, पेट एवं नीचे के भाग की नाड़ियों की शुद्धि होती है। मूत्रेंद्रिय की कार्यक्षमता बढ़ती है एवं बद्धकोष्ठता दूर होती है। कंठ व छाती अतिकार्यक्षम होती है।

 उम्र के ग्यारहवें या बारहवें साल से दंड बैठक सरीखा व्यायाम एवं आसनों का अभ्यास शुरू करना चाहिए। क्योंकि तब तक स्पाइनल कॉर्ड का योग्य विकास हो चुका होता है। इन व्यायामों से छाती की हड्डियों की वृद्धि होने व फेफड़े आवश्यक कार्यक्षम होने के बाद उम्र के १४ से १५ वर्ष के बाद अन्य शुद्धिक्रियाएं एवं उसके बाद प्राणायाम का अभ्यास करने से शरीर, मन एवं बुद्धि का एकात्मिक विकास होकर स्वस्थ शरीर, शांत व एकाग्र मन, एवं कुशाग्र बुद्धि वाले निरामय आरोग्यवान व्यक्तित्व का विकास हो सकता है।

 

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