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***जयश्री खांडेकर***

            सूर्य नमस्कार एक गतिशील व्यायाम प्रकार है। अगर एक एक    स्थिति में कुछ देर तक याने ३ श्वास प्रश्वास या एक ओंकार बोलते तक रुके तो वे १२ योगासन होते हैं। व्यक्ति का स्वास्थ्य देख कर उन्हें कैसे सूर्य नमस्कार करना चाहिए यह शिक्षक ही बता सकता है।

 इन १२ स्थितियों के साथ १२ मंत्र जुड़े हैं। मौखिक उच्चारण से इन मंत्रों का मन पर बड़ा शक्तिशाली, तेजस्वी प्रभाव पड़ता है। शारीरिक और मानसिक दशा सुधारने के लिए मंत्र के साथ सूर्य नमस्कार का उपयोग किया जाता है।

 किसी भी व्यायाम में शारीरिक हलचल होती ही है; लेकिन उसका पूर्णत: लाभ मिलने के लिए मन का सहभाग उतना ही आवश्यक है। हर नमस्कार में दीर्घीकरण का (स्ट्रेच) अनुभव लेना है। इसलिए शिक्षक को चाहिए कि हर स्थिति में कहां दीर्घीकरण है यह बताएं। नमस्कार किस तरह करना है इसकी परिभाषा इस प्रकार है-

 उरसा शिरसा दृष्ट्या वचसा मनसा तथा।

 पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोऽष्टांग उच्यते।

 सीना, माथा, २ पैर, २ हाथ, २ घुटने ऐसे आठ अंगों के जमीन को स्पर्श करते हुए नमस्कार करने से शरीर के स्नायु तथा पीठ की रीढ़ का व्यायाम होता है। मंत्रों के उच्चारण से वाचा और मन एकाग्र करने में लाभ होता है।

 दृष्ट्या- संपेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चाऽनवलोकयन्।

 दृष्टि नासिकाग्र पर रखी तो मन जल्दी एकाग्र होता है। लेकिन सूर्य नमस्कार गतिशील व्यायाम है। हाथ ऊपर गए तो ऊपर देखें, नीचे आए तो नीचे देखें। इससे आखों का व्यायाम होता है।

 मनसा- सूर्य का ध्यान करते हुए और उनके जैसे समय का आदर करते हुए निर्लिप्त भाव से कर्म करते रहने के लिए ‘हे सूरज, आप हमें स्फूर्ति दें’ ये विचार मन में रखकर ही नमस्कार करना है।

 वाचा- र्हाम्, र्हीम्, र्हूम्, र्हेम्, र्हैम्, र्है:म्। ऐसे छह बीज मंत्र हैं। ह ये महाप्रणवोच्चार है। इसका जाप करने से हृदय को गति मिलती है और रक्त शुद्धिकरण में मदद मिलती है।

 र्हाम् से- सीना, हृदय, श्वास नलिका, दिमाग; र्हीम् से- नाक, कंठ, तालू; र्हूम् से- यकृत, प्लीहा, पचनेंद्रिय और आंतों को फायदा होता हैै।

 र्हेम् से- मूत्रपिंड; र्हौम् से-बड़ी आत और गुदद्वार; र्है:म् से- छीना, कंठ आदि को फायदा होता है। सूरज के जो १२ नाम हैं उनका भी उच्चारण आवश्यक है। जैसे ॐ र्हाम् मित्राय नम:; ॐ र्हीम् रवये नम:; ॐ र्हूम् सूर्याय नम:द्ध ॐ र्हैम् भानवे नम:; ॐ र्हौम् खगाय नम:; ॐ र्ह:म् पूष्णे नम:; ॐ र्हाम् हिरण्य गर्भाय नम:; ॐ र्हीम् मरिचये नम:; ॐ र्हूम् आदित्याय नम:, ॐ र्हैम् सवित्रे नम:; ॐ र्हौम् अर्काय नम:; ॐ र्ह:म् भास्कराय नम:।

 सूर्य नमस्कार करने की विधि में थोड़ा-थोड़ा बदलाव संभव है।

 पहली स्थिति- दोनों पैरों को चूल्हे जैसा जोड़ें, एडियां जुड़ी हुईं, पंजों में अंतर, हाथ का नमस्कार और दीर्घ श्वास लेकर मंत्र का उच्चारण जोर से करना है।

 १. उर्ध्व नमस्कारासन- दीर्घ श्वास लेकर दोनों हाथ ऊपर उठा कर पीछे झुकना है।

 २. हस्त पादासन- श्वास छोडकर दोनों हाथ पैर के पंजों के बाजू में रख कर घुटने को सिर लगाना है।

 ३. दक्षिण पादप्रसरणासन- दाहिना पैर पीछे, श्वास लेकर बाया घुटना मोड़ा हुआ।

 ४. द्विपाद प्रसरणासन- श्वास छोड़कर दोनों पैर पीछे, सिर से एडियों तक ढलान चाहिए।

 ५. भूजानु आसन- श्वास लेकर घुटने लगाना, श्वास छोडकर माथा जमीन को लगाना।

 ६. साष्टांग प्रणिपातासन- उठते समय श्वास लेना, जमीन से सीना लगाते समय श्वास छोड़ना।

 ७. भुजंगासन- श्वास लेकर भुजंगासन करें।

 ८. भूधरासन- श्वास छोड़ते हुए दृष्टि निाभ के तरफ पैर की एडियां जमीन को स्पर्श करें।

 ९. भूजानु आसन- ५ की स्थिति

 १०. दक्षिणपाद संकोचनासन- श्वास लेते समय दाहिना पैर दोनों हाथों के बीच में रखें।

 ११. हस्तपादासन- श्वास छोड़ते हुए दोनों पैर साथ में घुटने को सिर लगाना।

 १२. पूर्ण नमस्कार- श्वास लेते हुए पूर्व स्थिति।

 ऐसे १२ सूर्य नमस्कार करें और स्वस्थ रहें।

 मो. : ९३७३२८२२४७

 

 

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