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धरती बार-बार दे रही खतरे की घंटी

इंसान पहला जीव है जिसने आग पर नियंत्रण रखना सीखा। आग ने ही इंसान को इंसान बनाया है। लेकिन, आज इतनी ज्यादा मात्रा में और इतनी ज्यादा तरीके से आग जलाई जा रही है, ईंधन जलाया जा रहा है कि धरती का तापमान लगातार गरम होता जा रहा है। यह पूरी मानव जाति के लिए खतरे की घंटी है।

धरती की जिंदगी के हिसाब से वर्ष 2019 बेहद मनहूस साबित हुआ है। इस साल ने धरती को ऐसे बहुत सारे घाव दिए हैं, जिन्हें भूल पाना संभव नहीं। इसी साल ने एमेजॉन के जंगलों में अब तक की सबसे भयंकर आग देखी; तो इसी साल ने ऑस्ट्रेलिया के जंगलों को धू-धू करके जलते देखा। दोनों घटनाओं के कारकों में यूं तो थोड़ा अंतर है; लेकिन, इनके परिणाम ऐसे हैं, जिन्हें हमारी आगे की कई पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।

पृथ्वी पर जीवन कई संयोगों से पैदा हुआ है। अगर उनमें से एक भी संयोग अनुपस्थित होता तो शायद जीवन नहीं पनपता। हर कारक ने अपनी बराबर की भूमिका निभाई है। अभी भी इनमें से किसी एक के कम होने या ज्यादा होने का मतलब सर्वनाश के अलावा कुछ नहीं है। धरती जब से बनी है, तब से उसका कुछ खास तापमान रहा है। रोज सुबह से सूरज धरती को गरम करने लगता है। रोज रात उसे ठंडा करती रहती है। जहां कहीं भी सूरज की रोशनी सीधी नहीं पड़ती, वहां पर तापमान कम होता है। जहां कहीं भी धरती की सतह एक खास ऊंचाई तक पहुंच जाती है, वहां पर बर्फ जम जाती है। यही जमा हुआ बर्फ धीरे-धीरे रिस-रिस कर न जाने कितनी नदियों को जन्म देता है। यही नदियां जब लहराते-बलखाते हुए चलती हैं तो न जाने कितनी संस्कृतियों-सभ्यताओं को जन्म देती हैं, पैदा करती हैं।

थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ धरती का क्रम लगभग सामान्य ही चलता रहा है। परिवर्तन आए भी तो धीरे-धीरे उसके अनुसार जीवन ने भी बदलाव कर लिया। लेकिन, बीते तीन सौ सालों में धरती ने कुछ ऐसे परिवर्तन देखे हैं, जिसकी मिसाल शायद ही पहले कहीं मिली हो।

इंसान पहला जीव है जिसने आग पर नियंत्रण रखना सीखा। आग ने ही इंसान को इंसान बनाया है। लेकिन, आज इतनी ज्यादा मात्रा में और इतनी ज्यादा तरीके से आग जलाई जा रही है, ईंधन जलाया जा रहा है कि धरती का तापमान लगातार गरम होता जा रहा है। एमेजॉन के जंगलों को साफ करके ब्राजील वहां से डॉलर पैदा करना चाहता है। पूरे साल ब्राजील के जंगल धधकते रहे। यहां तक कि उसके धुएं से आसमान काला हो गया। ऑस्ट्रेलिया में पिछले कई सालों से बारिश नहीं होने के चलते नमी की मात्रा लगातार कम होती जा रही है। सूखे का शिकार होने वाले जंगल झाड़ों में लगी आग इस कदर बेकाबू हुई कि उसे बुझाने मे इंसानी प्रयास छोटे पड़ गए। माना जाता है कि इस आग में करोड़ों पशु-पक्षियों की मौत हो गई। यहां तक कि कुछ की प्रजाति के समाप्त होने का भी संकट पैदा हो गया है। यही वह साल है जब ग्लैशियरों के गायब होने की बाकायदा घोषणा हुई और कुछ के तो अंतिम संस्कार में भी लोग जुटे।

अगर हम अपने देश में देखें तो यहां भी हाल कुछ अलग नहीं है। मौसम चक्र बदलने और जलवायु संकट के संकेत हमारे यहां भी दिन-दिन ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट होते जा रहे हैं। भारत की राजधानी दिल्ली के लिए 30 दिसंबर का दिन इतिहास में दर्ज हो चुका है। इस दिन ठंड ने ऑल टाइम रिकार्ड कायम किया। 30 दिसंबर को दिन का अधिकतम तापमान 9.4 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया जो कि 1901 से लेकर अब तक सबसे कम है। इससे पहले 1997 में 28 दिसंबर को 11.3 डिग्री सेल्सियस तापमान रहा था जो कि सबसे कम रहा था। लेकिन, बाईस सालों के वक्त में ही पुराना रिकार्ड टूट गया और नया बन गया। यही नहीं इस बार की कड़ाके की सर्दियां भी सबसे ज्यादा देर तक टिकी रही। दिसंबर महीने में लगातार 18 कोल्ड डे या सीवियर कोल्ड आए। जबकि, इससे पहले वर्ष 1997 में लगातार 13 कोल्ड डे ही आए थे। जान लें कि मौसम विभाग की तकनीकी भाषा में अगर न्यूनतम तापमान दस से नीचे और अधिकतम तापमान साढ़े चार डिग्री से कम है तो उसे कोल्ड डे और अगर अधिकतम तापमान साढ़े छह डिग्री सेल्सियस से कम है तो उसे सीवियर कोल्ड डे कहा जाता है। दिल्ली के लोगों ने इस बार भीषण सर्दियों का सामना किया। जबकि, वर्ष 2019 के जून महीने की 11 तारीख ने भी एक रिकार्ड कायम किया था। इस दिन दिल्ली के पालम में अधिकतम तापमान 48 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया था जो कि ऑल टाइम रिकार्ड है। यानी जब से रीडिंग ली जा रही है तबसे यह सबसे गर्म दिन रहा था। इससे पहले 9 जून 2014 को पालम में सबसे ज्यादा तापमान 47.8 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया था। यानी 2014 का ऑल टाइम रिकार्ड सिर्फ पांच साल टिक पाया।

इससे भी पहले 2019 के फरवरी महीने की सात तारीख को दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में इतने भारी पैमाने पर ओलावृष्टि हुई कि धरती सफेद हो गई। दूर-दूर तक ओले की चादर ऐसी बिछी हुई थी मानों दिल्ली-एनसीआर में बर्फबारी या हिमपात हो गया हो। जानने वाले बताते हैं कि इससे पहले शायद ही दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में इतनी भयंकर ओलावृष्टि हुई हो।

बरसात भी कुछ कम नहीं। दिसंबर महीने की 13 तारीख को दिल्ली में जोरदार बरसात हुई। एक दिन में 33 मिलीमीटर बरसात हुई। 1952 से लेकर यह अब तक का दिसंबर महीने में सबसे ज्यादा बरसात वाला दिन रहा था।

एक ही साल यानी 2019। वही जिसे हम बस अभी-अभी विदा कर चुके हैं। उसी साल में सबसे भयंकर जाड़ा, सबसे भयंकर गर्मी, सबसे भयावह ओलावृष्टि और सबसे भारी बरसात। क्या ऐसा संभव है?

जी हां, वर्ष 2019 को पूरी दुनिया में ही मौसम चक्र में होने वाले परिवर्तनों के लिए जाना जा रहा है। यही वह वर्ष है जिसने यूरोप में लू चलते हुए देखा। यही वह वर्ष है जब हमारे यहां लोगों को लू से बचाने के लिए धारा 144 तक लगानी लड़ी। यही वह वर्ष है जिसने पहले तो भीषण गर्मी झेली फिर भयंकर सर्दियों का सामना किया। लोगों की जान लेने वाला सूखा आया तो लोगों को डुबाने वाली बाढ़ भी आई।

नतीजे कौन भुगतेगाः

ऑस्ट्रेलिया में ऊंट नहीं पाए जाते थे। जब पहली बार यूरोपीय नाविक समुद्र में अलग-थलग पड़े ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप पर पहुंचे तो उन्हें यहां पर कुछ अलग ही नजारे दिखाई पड़े। यहां के जीव-जंतु एकदम अजीब थे। खैर, जीव-जंतुओं से उन्हें ज्यादा मतलब नहीं था। वे तो वहां मौजूद प्राकृतिक संसाधनों पर ज्यादा से ज्यादा कब्जा और उसकी लूट चाहते थे। महाद्वीप के अंदरूनी हिस्से से माल ढोकर नावों तक पहुंचाने का उन्हें साधन चाहिए था। वे इस काम के लिए ऑस्ट्रेलिया में ऊंट ले आए।

माना जाता है कि वर्ष 1840 में पहली बार ऑस्ट्रेलिया में ऊंटों को लाया गया। उस दौर की आप कल्पना कीजिए। यूरोपीय देश ज्यादा से ज्यादा जमीन पर कब्जे की मुहिम में लगे हुए थे। उन्हें ऐसी जगहों की तलाश थी, जहां पर धातुओं का भंडार हो, जहां पर खेती के लिए बेहिसाब जमीनें हों या जहां की आबादी में वे अपना माल बेच सकें। भौगोलिक खोजों का दौर भारत के नए रास्ते की तलाश के साथ शुरू हुआ और जल्द ही तमाम अनछुए इलाकों में पहुंचने की होड़ लग गई। जहां पर कब्जा किया जा सके। जहां के संसाधनों की खुली लूट की जा सके।

इसी क्रम में औपनिवेशिक लोग ऑस्ट्रेलिया पर भी कब्जा करने पहुंचे। ऑस्ट्रेलिया सदा से ही एक अभागा महाद्वीप रहा है। इसे अनूठा भी कह सकते हैं। जब पृथ्वी की प्लेटें खिसक रही थीं, उसी समय यह मुख्य जमीन से अलग हो गया था। उस समय तक यहां पर स्तनपायी जीवों का विकास भी नहीं हो पाया था। इसी के चलते यहां पर जैव विकास या इवोल्यूशन अलग

दिशा पकड़ते हुए चला। यहां पर शिशुधानी वाले ऐसे गजब मार्सूपियर्स विकसित हुए, जो और कहीं नहीं पाए जाते। इनमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय कंगारू है। अपने पेट की थैली में बच्चे को लिए और पिछली दो टांगों पर उछलते कंगारुओं को हमने तस्वीरों में देखा है। उनकी शकल काफी कुछ चूहे या खरगोश से मिलती-जुलती है।

ऑस्ट्रेलिया की जैव-विविधता एकदम अलग है। वहां पर बहुत से अनूठे और निराले जीव रहा करते हैं। हम इंसानों के जाने के साथ ही वहां की जैव विविधता को नुकसान पहुंचना शुरू हुआ। यूरोपीय देशों ने वहां पहुंचते ही ज्यादा से ज्यादा जमीनों पर अपनी बाड़ेबंदियां शुरू कर दीं।

माल ढोने के लिए ढेरों ऊंट यहां पहुंचाए गए। लेकिन, मोटर और रेलवे का आविष्कार होते ही ऊंट बेकार हो गए। अब उन्हें पालना और सामान ढोने में उनका इस्तेमाल ज्यादा खर्चीला हो गया। औपनिवेशिकों ने उन्हें खुले में छोड़ दिया गया। ये ऊंट ऑस्ट्रेलिया की खुश्क जलवायु और बंजर जमीनों पर खूब फलने-फूलने लगे। वे जंगली जानवरों की तरह रहने लगे। आज ऑस्ट्रेलिया में उनके बड़े-बड़े झुंड घूमा करते हैं। माना जाता है कि अभी ऑस्ट्रेलिया में बारह लाख से ज्यादा जंगली ऊंट मौजूद हैं।

एक प्रजाति जो किसी वातावरण में विकसित न हुई हो, जिसका क्रमिक विकास वहां पर नहीं हुआ हो, अगर वो वहां पर पहुंच जाती है तो एक प्रकार का प्राकृतिक असंतुलन पैदा होता है। जो प्रजाति जिस वातावरण में विकसित होती है, वहां पर उसके दुश्मन भी होते हैं जो उसकी तादाद पर नियंत्रण लगाते हैं। लेकिन, नियंत्रण लगाने वाली किसी प्रजाति के नहीं होने पर उनकी संख्या तेजी से बढ़ती है। जिससे असंतुलन गहराने लगता है। कुछ इसी तरह का असंतुलन ऑस्ट्रेलिया में बिल्लियों और कुत्तों ने भी पैदा किया है। यूरोपीय लोगों की घरेलू बिल्लियां आज जंगलों में आजाद घूम रही हैं और वहां की नैसर्गिक प्रजातियों के जान की दुश्मन बनी हुई हैं। यहां तक कि वहां पर बिल्लियों को मारने के लिए भी खास लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। इसी प्रकार कभी पालतू रहे कुत्तों के वंशज भी आज यहां जंगली कुत्तों की तरह झुंडों में रहने लगे हैं।

यहां के जंगलों में सितंबर महीने से आग लगी हुई है। यह आग कितनी बड़ी है और इसका धुआं कितना ज्यादा घातक है, यह इससे समझा जा सकता है कि इसका धुआं अब ब्राजील तक पहुंचने लगा है। ऑस्ट्रेलिया के बड़े हिस्से पर इस आग का धुआं छाया रह चुका है। मेलबर्न जैसे आधुनिक शहरों में लोग सांस लेने के लिए परेशान हैं और धुएं से लोगों की आंखों में जलन हो रही है।

ऐसे में ऊंटों को खलनायक माना जाना तय था। ऊंट पांच किलोमीटर की दूरी से भी पानी की गंध सूंघ लेते हैं। वे ऐसी तमाम जगहों पर एकत्रित हो जाते हैं जहां पर पानी मौजूद हो। यहां तक कि एयर कंडीशनर से टपकने वाले पानी के लिए भी ऊंटों का झुंड जमा होने लगता है। ऑस्ट्रेलिया सरकार मानती है कि ये ऊंट बहुत ज्यादा पानी पीते हैं। ऐसे में ऊंटों की समस्या से छुटकारा पाने के लिए या समस्या को सीमित करने के लिए समय-समय पर उनकी आबादी को कम करने का प्रयास किया जाता है। इससे पहले वर्ष 2009 और 2013 में भी ऊंटों की आबादी सीमित करने का प्रयास हो चुका है। अब दस हजार ऊंटों को मारने का लक्ष्य रखा निर्धारित किया गया।

हर किसी के मन में यह सहज जिज्ञासा है कि आखिर यह आग क्यों लगी। जंगलों में आग लगना कोई अनोखी बात नहीं है। हमारे यहां भी उत्तराखंड के जंगलों में लगभग हर साल ही आग लगती है। इसके लिए वहां पर अलग शब्द दावानल का प्रयोग भी किया जाता है। लेकिन, जब आग इतनी भयंकर हो जाए, जो पूरे एक महाद्वीप को ही जलाकर राख कर देने पर उतारू हो जाए, तो निश्चित तौर पर उसके कारणों पर विचार किया जाना चाहिए। ऑस्ट्रेलिया भी क्लाईमेट एमरजेंसी के उसी हमले का सामना कर रहा है, जिसका सामना दुनिया के अन्य देश दूसरी तरह से कर रहे हैं। यहां पर पिछले कई सालों से लगातार सूखा पड़ रहा है। पिछला दशक ऐतिहासिक तौर पर सबसे सूखा माना जा रहा है। बीते दिसंबर महीने में यहां पूरे राष्ट्र ने सबसे ज्यादा गरम दिन देखा था। यहां पर पूरे देश का औसत तापमान 41.9 डिग्री तक पहुंच गया था। लू चल रही थी।

वर्ष 1920 से लेकर अब तक ऑस्ट्रेलिया के औसत तापमान में एक डिग्री तक का इजाफा हो चुका है। गर्मी लगातार बढ़ रही है। जंगल सूख रहे हैं। झाड़ियां सूख रही हैं। नमी कम हो रही है। यानी आग के लिए वह सबकुछ मौजूद है, जिस पर वह फलती-फूलती है। इसी ने इस आग को भयंकर बना दिया है। तीन महीने से यह आग ऑस्ट्रेलिया के जंगलों को राख कर रही है। वहां से लगातार दिल तोड़ने वाली तस्वीरे आ रही हैं। माना जाता है कि ऑस्ट्रेलिया की आग में पचास करोड़ से ज्यादा पशु-पक्षी मारे गए हैं। यहां तक कि उनकी प्रजातियों के विलुप्त होने का भी संकट पैदा हो गया है।

जाहिर है कि ऑस्ट्रेलिया में पैदा हुआ अग्निसंकट खतरे की एक और घंटी है। अब यह हम पर है कि हम कितने दिनों तक खतरे के इस सायरन को अनदेखा करते हैं।

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