साधो ये जग बौराना

Continue Reading साधो ये जग बौराना

अचानक मां दहाड़ मार कर रो दी, क्योंकि उसके कुछ और बच्चों ने मौत को गले लगा लिया था। हमारी जेब में तीन फोन थे, एक लैफ्ट का, एक राइट का, एक लैफ्टाइट का। तीनों बज रहे थे। उस मां की आंखों के आंसू न जाने कैसे हमारी आंखों तक पहुंच गए। ‘साधो ये जग बौराना” कहकर रोते हुए हम उस मां के चरणों में झुक गए...

धरती बार-बार दे रही खतरे की घंटी

Continue Reading धरती बार-बार दे रही खतरे की घंटी

इंसान पहला जीव है जिसने आग पर नियंत्रण रखना सीखा। आग ने ही इंसान को इंसान बनाया है। लेकिन, आज इतनी ज्यादा मात्रा में और इतनी ज्यादा तरीके से आग जलाई जा रही है, ईंधन जलाया जा रहा है कि धरती का तापमान लगातार गरम होता जा रहा है। यह पूरी मानव जाति के लिए खतरे की घंटी है।

जनजाति के लिए प्रकृति ही धर्म है

Continue Reading जनजाति के लिए प्रकृति ही धर्म है

पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध में अपने देश की प्राचीन सभ्यता से कहीं भटकने का डर हमें अस्वस्थ कर रहा है। ऐसी स्थिति में केवल जनजाति समाज और उसकी आदर्श पर्यावरण पूरक जीवनशैली ही हमें फिर से अपने मूल मार्ग पर लाने के लिए सक्षम  है।

बाधा बनते छद्म पर्यावरण आंदोलन

Continue Reading बाधा बनते छद्म पर्यावरण आंदोलन

छद्म पर्यावरण संगठनों की पूरी एक श्रृंखला है, जिन्हें समर्थक संस्थाओं के रूप में देशी-विदेशी औद्योगिक घरानों ने पाला-पोसा है। ऐसे संगठन हमारे आर्थिक विकास की गति को रोक रहे हैं। उन्हें खोजकर उन पर अंकुश लगाया जाना चाहिए।

पर्यावरण चेतना के लोकनायक

Continue Reading पर्यावरण चेतना के लोकनायक

पर्यावरण चेतना की समझ, नागरिकों को उनके कर्तव्यों का बोध कराती है तथा मार्गदर्शन करती है। पर्यावरण चेतना, इतिहास और पर्यावरण के लिए अनेक महानुभावों ने स्वयं को समर्पित कर दिया।

पर्यावरण की रक्षा और वैश्विक संस्थाएं

Continue Reading पर्यावरण की रक्षा और वैश्विक संस्थाएं

पर्यावरण की रक्षा के लिए पूरे विश्व में विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं कार्यरत हैं। यह एक तरह से जनता का संयुक्त अभियान है। इसलिए कि आने वाली भयावह स्थिति से निपटने के लिए अभी से सार्थक कदम उठाना जरूरी है।

जलवायु परिवर्तन का भारत पर प्रभाव

Continue Reading जलवायु परिवर्तन का भारत पर प्रभाव

भारत के साथ ही पूरे विश्व को यह समझना होगा कि जलवायु परिवर्तन मानवीय गतिविधियों से उपजा है। ...इसलिए उन सभी वस्तुओं का त्याग इंसानी जीवन से करना होगा, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण को हानि पहुंचाती हैं।

नागरिकता कानून विरोध की राजनीति?

Continue Reading नागरिकता कानून विरोध की राजनीति?

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ देशभर में हुए हिंसक आंदोलन मोदी सरकार के खिलाफ एक सुनियोजित साजिश थी। कुत्सित राजनीति के हथियार के तौर पर विरोध के अधिकार का खतरनाक इस्तेमाल किया गया। इसे समझना जरूरी है।

जेएनयू पूरा देश नहीं

Continue Reading जेएनयू पूरा देश नहीं

सोशल मीडिया और नागरिक पत्रकारिता के कारण यह सच सभी के सामने आ रहा है कि सीएए के समर्थन करने वालों की संख्या अत्यधिक है और जेएनयू में जो हो रहा है वह दिखावा मात्र है। जेएनयू पूरा देश नहीं है।

उपभोगशून्य स्वामी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

Continue Reading उपभोगशून्य स्वामी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

हिंदी विवेक मासिक पत्रिका द्वारा प्रकाशित कर्मयोद्धा ग्रंथ का विमोचन केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा किया गया। प्रस्तुत आलेख इस अवसर पर उनके द्वारा दिए गए उद्बोधन का शब्दांकन है।

पर्यावरण या इंसान : किसका कद ऊंचा?

Continue Reading पर्यावरण या इंसान : किसका कद ऊंचा?

सृष्टि के हर जीव को जीने का सुंदर वातावरण मिले, यही पर्यावरण की परिभाषा है। किंतु विकास की अति लालसा और औद्योगिकरण की तथाकथित प्रगति के लिए मनुष्य ने प्रकृति को ही गुलाम बनाने का संकल्प किया है। मनुष्य के मन में यह अहंकार पैदा हुआ है कि वह अपनी बुद्धि के बल पर प्रति-सृष्टि पैदा कर सकता है।

End of content

No more pages to load