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विपश्यना साधना स्वयं के   चित्त की शुद्धि साधने की विद्या है। यह सजगता की पराकाष्ठा है- अर्थात शरीर और चित्त के प्रपंच का उसके सही गुणधर्म स्वभाव के स्तर पर पूर्ण परिज्ञान प्राप्त कर लेना। यह संकल्प-विकल्परहित यथाभूत ज्ञान दर्शन की साधना है। विपश्यना वही साधना है जिसका बुद्ध ने, देहदमन और मन को एकाग्र करने की अनेक विधियों द्वारा भव संसरण के जन्म-मृत्यु, दु:ख-पीड़ा आदि से मुक्त होने में असफल होने के बाद, स्वयं अभ्यास करते हुए खोज निकाला था।

 यह इतनी अनमोल विद्या है कि इसे बर्मा में २२०० वर्षों से अपनी परिशुद्ध अवस्था में सीमित गुरु-शिष्य परंपरा द्वारा सुरक्षित रखा गया।

 साधना का निरंतर अभ्यास चित्त को शांत करता है, एकाग्रता को (समाधि) पुष्ट करता है, गहरी सजगता को स्थापित करता है और मनोद्वारों को लोकोत्तर अवस्था के लिए खोल देता है- अर्थात ‘निर्वाण (नितांत दु:ख-विमुक्ति अवस्था) का साक्षात्कार।’

 विपश्यना साधना का आधार शील अर्थात नैतिक व्यवहार है। इसके अभ्यास को समाधि (मन की एकाग्रता) द्वारा पुष्ट किया जाता है। चित्त प्रक्रियाओं का शुद्धिकरण प्रज्ञा (अंतर्बोधजनित विवेक) द्वारा किया जाता है। हम स्वयं के अंतर में चारों महाभूतों के पारस्परिक प्रभाव को पूर्ण समता के साथ देखते हैं, और इस संवर्धमान क्षमता की बहुमूल्यता अपने दैनिक जीवन में भी अनुभव करते हैं।

 यद्यपि विपश्यना साधना का विकास बुद्ध ने किया था, परंतु इसका अभ्यास केवल बौद्धों तक सीमित नहीं रहा और न ही इसमें किसी संप्रदाय विशेष में दीक्षित होने जैसी कोई बात है। यह विधि इस बिना पर कारगर होती है कि मानव मात्र समान समस्याओं से संग्रसित है और जो विधि इन सार्वजनीन समस्याओं का समाधान कर सकती है उसका उपयोग भी सार्वजनीन स्तर पर ही होना चाहिए, और बुद्ध के समय एवं वर्तमान में भी ऐसा ही हो रहा है।

 विपश्यना साधना के प्रशिक्षणार्थियों को कम दस दिन का एक शिविर करना होता है जिसके अंतर्गत उन्हें पांच शीलों का पालन करना अनिवार्य होता हैं- १. हत्या नहीं करेंगे २. चोरी नहीं करेंगे ३. शिविर में ब्रह्मचर्य पालन करेंगे ४. झूठ नहीं बोलेंगे ५. किसी प्रकार के मादक पदार्थ का सेवन नहीं करेंगे। पूरे दस दिनों तक शिविर स्थल की सीमा के अंदर ही रहना होता है। प्रति दिन प्रात: साढ़े चार से सायंकाल नौ बजे तक का व्यस्त कार्यक्रम रहता है। कम से कम दस घंटे साधना करना होता है। तीसरे दिन तक साधक सांस के आने और जाने का निरीक्षण करते हुए मन को एकाग्र करने का अभ्यास करता है। बाकी दिनों में साधक पूरे शरीर में अनुभव होने वाली विभिन्न संवेदनाओं का सजगता सहित सर्वेक्षण करने एवं शरीर और मन के स्वभाव को गहराई तक विपश्यना के द्वारा बींधने का कार्य सीख लेता है। प्रति दिन सायं एक घंटे के प्रवचन में साधना का स्पष्टीकरण किया जाता है। दसवें दिन शिविर में प्राप्त परिशुद्धता को समस्त प्राणियों में समविभाजित किया जाता है।

 शिविर काल में, मन की एकाग्रता एवं निर्मलता को ही प्राथमिकता दी जाती है। इसके परिणाम स्वत: परिलक्षित होते हैं। दार्शनिक एवं कल्पनाजनक विवाद को निरुत्साहित किया जाता है।

 साधना सिखाने के लिए किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता। निवास, भोजन एवं अन्य सामान्य व्यवस्थाएं पूर्व शिविरों में विपश्यना साधना से लाभप्राप्त साधकों की स्वैच्छिक साभारप्राप्त दानराशि से की जाती है। शिविर सफलतापूर्वक पूर्ण कर लेने पर यदि साधक स्वयं को लाभान्वित महसूस करता है तो इसका लाभ  अधिक से अधिक लोगों को मिले, ऐसी शुद्ध चेतना के साथ आगामी शिविरों के लिए दान दे सकता है।

 साधक की धर्म में प्रगति उसके पुरुषार्थ के पांच अंगों-श्रद्धा, आरोग्य, लगन, वीरता, विवेक पर निर्भर करती है।

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