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***आलोक भट्टाचार्य****

 प्राचीन ग्रंथ खंगालकर प्रेक्षाध्यान को खोज लाकर, उसका पुनरुद्धार कर, उसमें नए प्रयोग जोड़ कर उसे वर्तमान युगानुकूल बनाकर जैन आचार्य श्री तुलसी और आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने संपूर्ण मानव समाज का जो हित किया है, वह अनन्य है, अतुलनीय है।

जैन परंपरा में ध्यान का अत्यंत प्राचीन और विशिष्ट                    प्रयोग है ‘प्रेक्षाध्यान।’ प्राचीन होने के बावजूद इसकी विशिष्टता और विरलता के कारण और इससे प्राप्त होने वाली गहरी और ऊंची उपलब्धियों के कारण इसे अभिनव कहा गया है। प्राचीन जैन ग्रंथों से निकाल कर इसे श्वेतांबर तेरापंथी जैनाचार्य श्री तुलसी ने नूतन रूप दिया है, इसलिए भी यह अभिनव है।

  ‘प्रेक्षा’ शब्द ईश धातु से बना है। इसका अर्थ है- देखना। प्र+ईक्षा=प्रेक्षा, यानी गहराई में उतर कर देखना। विपश्यना का भी यही अर्थ है। प्रेक्षा के माध्यम से आत्मा के द्वारा सूक्ष्म आत्मा को देखने की साधना की जाती है। मन के द्वारा सूक्ष्म मन को, स्थूल चेतना के द्वारा सूक्ष्म चेतना को देखने की साधना की जाती है। ‘देखना’ ध्यान का मूल तत्व है, इसलिए इस ध्यान-पद्धति को प्रेक्षाध्यान कहा जाता है।

 जानना और देखना चेतना का लक्षण है। चेतना का साधारण तौर पर सिर्फ अनुभव ही किया जा सकता है। चेतना को देखने की साधना प्रेक्षा ध्यान है। भावनाओं को मात्र महसूस ही किया जा सकता है। भावनाओं को देखने की साधना प्रेक्षा ध्यान है। साधना के दो सूत्र हैं-  ‘जानो और देखो।’ चिंतन और विचार का पर्यालोचन करो, यानी उन्हें सिर्फ सोचो मत, देखने का प्रयास करो, देखने का अभ्यास करो। यही अभ्यास प्रेक्षाध्यान है।

 जब हम देखते हैं, तब सोचते नहीं और जब सोचते हैं,तब देखते नहीं। दोनों एक साथ करते हैं, तो दोनों में से कोई भी काम सही-सही नहीं हो पाता। विचारों का जो अनंत सिलसिला चलता रहता है, उसे रोकने का पहला और अंतिम साधन है- ‘देखना।’ कल्पना के चक्रव्यूह को तोड़ने का सशक्त उपाय है- ‘देखना।’ आप स्थिर होकर अपने भीतर देखें, अपने विचारों को ‘देखें’, अपने शरीर के आंतरिक प्रकंपनों को ‘देखें’, तो एक समय भीतर की गहराइयों को देखते देखते अपने सूक्ष्म शरीर को देखने लगेंगे।

 जो भीतरी सत्य को देख लेता है, उसमें बाहरी सत्य को देखने की क्षमता अपने आप आ जाती है।

 देखना वह है, जहां केवल चैतन्य सक्रिय होता है। जानने में भी केवल चैतन्य ही सक्रिय होता है। हम पहले देखते हैं, फिर जानते हैं। जो पश्यक है, प्रेक्षक है, वह ‘द्रष्टा’ है। दृश्य के प्रति उसका दृष्टिकोण ही बदल जाता है। मध्यस्थता प्रेक्षा का ही दूसरा रुप है। जो द्रष्टा है, वह सम रहता है। तटस्थ रहता है।

 प्रेक्षाध्यान के माध्यम से हम सत्य की खोज कर सकते हैं। आध्यात्मिक चेतना का विकास कर सकते हैं। सुख-दुख, प्राप्ति-अप्राप्ति, लाभ-हानि, यहां तक कि जन्म-मृत्यु के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करते हैं। निज और पर के बीच सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश करते हैं। स्वभाव-परिवर्तन का प्रयास करते हैं। व्याधि, आधि और उपाधि से मुक्त होकर उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त करते हैं और स्वास्थ्य के माध्यम से मानसिक शांति पाने का प्रयास करते हैं। प्रेक्षा हमें अतींद्रिय ज्ञान से संपन्न करता है।

 प्रेक्षाध्यान लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अप्रमाद की साधना-पद्धति है। इस पद्धति में मुख्य आठ प्रयोग हैं- १. कायोत्सर्ग या शवासन, २. अंतर्यात्रा, ३. श्वास प्रेक्षा (अपनी आती-जाती सांसों को ‘देखने’ की साधना), ४. शरीर प्रेक्षा (आंखें बंद कर मानस चक्षु से शरीर के विभिन्न अंगों को देखने की साधन) ५. चैतन्य-केंद्र प्रेक्षा (अपनी चेतना के स्रोत और उसके केंद्र को देखने की साधना), ६. लेश्या ध्यान (शरीर और मानस के आभा मंडल के रंगों को देखने की साधना), ७. अनुप्रेक्षा (स्वभाव परिवर्तन के लिए संकल्प लेना और उन संकल्पों को ‘देखने’ की साधना। प्राचीन ग्रंथों में १२ से १६ अनुप्रेक्षाएं वर्णित हैं। आचार्य श्री तुलसी और आचार्य श्री महाप्रज्ञ की रचनात्मक और प्रयोगात्मक कोशिशों ने अब बढ़ाकर इनकी संख्या ३० कर दी है। पुरानी आदतों को मिटाकर नए संस्कारों के निर्माण के लिए अनुप्रेक्षा बहुत महत्वपूर्ण उपाय है।), और ८. भावना।

 इन ८ प्रयोगों के ४ सहायक प्रयोग और ३ विशिष्ट प्रयोग हैं। सहायक प्रयोग हैं- १. आसन, २. प्राणायाम, ३. ध्वनि, ४. मुद्रा। और विशिष्ट प्रयोग हैं- १. वर्तमान क्षण की प्रेक्षा, २. विचार प्रेक्षा, और ३. अनिमेष प्रेक्षा।

 जिन्हें हम प्रत्यक्ष नहीं देख पाते, मात्र महसूस ही कर सकते हैं, आंखें बंद करके उन्हें ‘देख’ पाना कोई काल्पनिक विलास नहीं, यथार्थ है। वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर संभव है। वैज्ञानिक स्तर पर ऐसा करना शरीर के स्नायुओं एवं अंत:स्रावी ग्रंथि-तंत्र के माध्यम से संभव है। मनोवैज्ञानिक विवेचना के रूप में अवचेतन मन के स्तर पर यह संभव है। निश्चित रूप से इसके लिए गहन एकाग्रता और निष्ठापूर्ण अभ्यास की जरूरत होती है। यह कितनी कठिन साधना है यह समझाने के लिए इतना भर जानना पर्याप्त है कि प्राणायाम प्रेक्षाध्यान को साधने के कई माध्यमों में से मात्र एक माध्यम भर है, जबकि हम जानते हैं कि प्राणायाम स्वयं ही एक स्वतंत्र और कठिन साधना है। महसूस ही किए जाने वाले अहसासों को देखने का प्रयास कल्पना को सत्य, यथार्थ और प्रत्यक्ष बनाने की साधना है। जिस दिन हम अपनी समस्त कल्पनाओं को यथार्थ में ढाल पाएंगे उस दिन हम कितनी ज्यादा प्रगति, कितना ज्यादा विकास कर लेंगे, यह सोचा जा सकता है।

 प्रेक्षाध्यान से हमें ४ प्रकार के लाभ मिलते हैं-

 १. भावात्मक लाभ: कषायों की क्रमिक क्षीणता अंत:करण और स्वभाव में बदलाव। दृष्टिकोण में परिवर्तन।

 २. मानसिक लाभ: एकाग्रता। मानसिक संतुलन। धैर्य में वृद्धि। स्मरणशक्ति में वृद्धि। चिंतन-शक्ति में वृद्धि। कल्पनाशक्ति में वृद्धि। निर्णायक शक्ति का विकास। सकारात्मक सोच का विकास।

 ३. शारीरिक लाभ: रासायनिक परिवर्तन। रोग-प्रतिरोधी क्षमता का विकास। शारीरिक क्रियाओं पर नियंत्रण।

 ४. व्यावहारिक लाभ: कार्यक्षमता में वृद्धि। व्यवहार में स्थिरता और मधुरता। अनासक्ति। मोहमुक्ति सृजनात्मकता का विकास।

 प्राचीन ग्रंथ खंगालकर प्रेक्षाध्यान को खोज लाकर, उसका पुनरुद्धार कर, उसमें नए प्रयोग जोड़कर उसे वर्तमान युगानुकूल बनाकर आचार्य श्री तुलसी और आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने संपूर्ण मानव समाज का जो हित किया है, वह अनन्य है, अतुलनीय है। ध्यान की इस विशिष्ट पद्धति के अनंत लाभ हैं। शर्त सिर्फ यह है कि इसे उचित पद्धति से साधा जाए।

 

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