ध्यान योग का अभिनव प्रयोग: प्रेक्षाध्यान

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 प्राचीन ग्रंथ खंगालकर प्रेक्षाध्यान को खोज लाकर, उसका पुनरुद्धार कर, उसमें नए प्रयोग जोड़कर उसे वर्तमान युगानुकूल बनाकर आचार्य श्री तुलसी और आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने संपूर्ण मानव समाज का जो हित किया है, वह अनन्य है, अतुलनीय है। ध्यान की इस विशिष्ट पद्धति के अनंत लाभ हैं। शर्त सिर्फ यह है कि इसे उचित पद्धति से साधा जाए।

क्रांतिकारी उत्तरयोगी श्री अरविंद

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योगी अरविंद के कुछ विचार तो इतने ज्यादा बौद्धिक हैं कि चमत्कृत तो करते ही हैं, नई राह भी दिखाते हैं। इसीलिए विश्व के प्रसिद्ध दार्शनिकों में उनका नाम बहुत ही आदर के साथ लिया जाता है। विश्व के बड़े शिक्षविदों में भी उनका प्रमुख स्थान है। योगी के तौर पर तो उन्हें अभिनव महत्व हासिल है- उन्हें ‘उत्तरयोगी’ कहा जाता है, यानी योग के बल पर ही जो योग से आगे निकल चुका है।’ 5 दिसम्बर उनका स्मृति दिवस है।

रवींद्र नाथ ठाकुर

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लोग या तो सिर्फ गायक होते हैं, या वादक, या फिर सिर्फ धुनों के सर्जक संगीतकार -और यह सब काम भी सिर्फ दर्जनों या सैकड़ों के आंकड़े तक सीमित।

नमो की हिंदी -नीति

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धानमंत्री नरेंद्र मोदी को अंग्रेजी आती है। अंग्रेजी में अगर वह बहुत कुशल और सहज नहीं भी हैं, लेकिन इतनी पकड़ तो वह इस भाषा पर रखते ही हैं कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर अंग्रेजी में अपनी बात पूरी तरह रख सकें।

प्रेम और भक्ति के लिए मीरा का प्रतिरोध

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जिन्होंने देश को अन्याय-अत्याचार के घने अंधकार से मुक्त करके न्याय-विकास के प्रकाश से प्रकाशित किया है। अपनी रचनाओं से जिन्होंने साहित्य को तो आलोकित किया ही है, अपने अटल विद्रोह से जिन्होंने समाज को न्याय, समता, निष्ठा और अदम्य साहस की उजली राह दिखायी।

खतरे में हैं हमारी भाषाएं।

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अपनी पारिवारिक-सामाजिक-व्यावसायिक व्यस्तताओं के बीच से एक-दो पल का वक्त निकालिए और जरा थमकर अपने आस-पास के माहौल पर गौर फरमाइए, तो चकित होते हुए आप पाइएगा कि आपके आस-पास का सारा माहौल ही बदल गया है।

हमारे जीवन पर विवेकानंद का प्रभाव: मेरे भीतर के विवेकानंद!

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आचार्य तुलसी ने मुझे हाथ पकड़कर एक ऐसे महानुभाव के पास ला खड़ा किया, जिन्होंने मुझे मेरे भीतर के विवेकानंद को फिर से तुष्ट करने की राह दिखायी, मुझे स्वामी विवेकानंद के मुझाये रास्तों पर चलने के उपाय बताये और हताशा-निराशा के गहन अंधकार से बाहर निकाला। ये थे आचार्य तुलसी के ही शिष्य आचार्य महाप्रज्ञ।

शब्द शक्ति का कालजयी जादू वंदे मातरम्!

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सन् 1907 में जब भिकाजी कामा ने भारत के राष्ट्रध्वज      के रूप में पहली बार तिरंगा का निर्माण किया और जर्मनी के स्टुटगार्ड में उसे फहराया, तब राष्ट्रगीत के तौर पर वहां ‘वंदे  मातरम्’ का ही गायन हुआ। लेकिन जब आज़ादी का समय आया, तब देश के राष्ट्रध्वज के साथ ही जब राष्ट्रगीत के चयन की बात आयी, तब रवींद्रनाथ ठाकुर के ‘जन गण मन’ के मुकाबले ऐतिहासिक ‘वंदे मातरम्’ पिछड़ गया।

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