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संस्कृत शब्द ‘योग’ युज           धातु से बना है, जिसका अर्थ है जोड़ना, परस्पर जुड़ना या युगल बनना, लैटिन में यही बात यूगर (र्ळीपसशीश) यूगम (र्ळीर्सीा), तथा फे्रंच में जोऊग (र्क्षेीस) शब्द के जरिए व्यक्त होती है। योग का अर्थ है व्यक्ति की आत्मा का परमात्मा से मिलन। भारत, पाकिस्तान व बांग्लादेश में आज जो आध्यात्मिक परंपराएं व प्रविधियां चल रही हैं, उनकी जड़ें गहरी हैं। ध्यान (चशवळींरींळेप) का मतलब है अनोखी बातें, अनोखे लोगों के लिए। मूलतया ध्यान का मतलब है शांतिपूर्वक बैठना, कुछ न करना, और सभी विचारों से मुक्त होना। मन तो है कि निरंतर उठते विचारों के व्यर्थ सैलाब से जूझता ही रहता है, और इससे निजात पाने का, मुक्त होने का, शिथिल होने का ध्यान एक अभ्यास है। पारलौकिकता हमारे अस्तित्व का सार है और ध्यान इस पारलौकिक केंद्र से हमें जोड़ने का माध्यम।

 ध्यान करने के अलग-अलग तरीके हैं, लेकिन सब का निचोड़ एक ही है। तरीका अलग हो सकता है, लेकिन अंतिम लक्ष्य एक ही है। ध्यान का लक्ष्य है दिव्य शक्ति से एकरूप होने का प्रयास करना और उससे ऊर्जा प्राप्त करना। योग, अत्युच्च ध्यान, जाप, बुद्ध मंत्र अथवा सूफी दुआ ध्यान के अलग-अलग तरीके हैं। आंतरिक शांति व आनंद हमारे बीच में ही बसा है। आनंद व आंतरिक शांति हमारे बीच में ही है, न कि बाहर। ध्यान से यह कुंजी हमें प्राप्त होती है। नसीरुद्दीन का किस्सा है। उसकी चाबियां खो गई थीं और वह उन्हें सड़क पर खोज रहा था। दोस्त भी उसके साथ चाबियां खोजने लगे, परंतु वे किसी को नहीं मिलीं। तब मित्र ने पूछा कि आखिर ये चाबियां खो कहां गई थीं? उसने जवाब दिया चाबियां तो घर में खो गई थीं। फिर प्रश्न था, जब चाबियां घर में खो गईं तो आप उन्हें सड़क पर क्यों खोज रहे हो? नसीरुद्दीन का मासूम सा जवाब था, सड़क पर ज्यादा रोशनी है इसलिए! निष्कर्ष यह कि हम आध्यात्मिकता की चाबियां रोशनी वाली जगहों में खोज रहे हैं, न कि सही जगह पर; जोकि हमारे स्वयं के भीतर ही मौजूद है। ध्यान हमें हमारे बीच की इस रोशन जगह से जोड़ता है, चाहे मार्ग में कुछ अंधियारे रास्ते ही क्यों न हो। जब हम पूरी तरह एकाग्र हो जाते हैं तब हमारी आध्यात्मिक यात्रा आरंभ होती है। मोझांबिक में रहने वाले दूरदृष्टि उद्यमी, एक सफल व्यवसायी होने के साथ ही लोक-हितैषी कार्य करने वाले एवं प्रेरणादायी वक्ता श्री रिझवान अडातिया का ध्यान, योग, तथा अस्तित्वदर्शी प्राचीन भारतीय शास्त्रों पर दृढ़ विश्वास है। वे पिछले तीस वर्षों से ध्यान और लगभग सात वर्षों से योग साधना कर रहे हैं।

 भारतीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी के आग्रह पर राष्ट्रसंघ महासभा द्वारा २१ जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिन मनाने की घोषणा से श्री अडातिया बहुत खुश हैं। विचारों, भावनाओं, विश्वासों एवं इच्छाओं जैसी आंतरिक बातों के साथ आनंद प्राप्त करने के लिए वे समाज में अपना योगदान दे रहे हैं।

  ‘‘अचेतन मन का सकारात्मक विचारों व ऊर्जा पर सकेंद्रीकरणः अधिकाधिक लोगों के जीवन में सुख, आंतरिक आनंद की प्राप्ति हो इसलिए वे अपना समय, ज्ञान व अनुभव बांटने में विश्वास करते हैं।’’

 श्री अडातिया के मिशन २०१५-२०३० का प्रमुख उद्देश्य आंतरिक आनंद दिलाना है। श्री अडातिया कहते हैं, आनंद प्राप्ति की कोशिश करना हरेक का अधिकार है और शायद यही जीवन का लक्ष्य भी है। लिहाजा, आनंद क्या है, अथवा आनंद पाने का मार्ग व दिशा क्या है, इसके बहुतायत मार्ग हैं और उन पर असहमतियां भी हैं। आनंद पाने के लिए बहुत से लोग रोजमर्रेया बाहरी गतिविधियों के जरिए खुशियां खोजने में अपना समय व ऊर्जा खर्च करते हैं जैसे कि भौतिक व भावनात्मक आश्वस्ति, विषयसुख के जरिए आनंद की प्राप्ति, अथवा अच्छी प्रतिष्ठा या खूब धन पाना। लिहाजा, अतिरिक्त धन पाने, इंद्रिय सुख लेने, स्वादिष्ट भोजन करने, अथवा अपेक्षित पद पाने से हमें मात्र क्षणिक आनंद ही मिल सकता है। जीवन में सही अर्थ में जो चाहते हैं, वैसा गहन संतोष इन चीजों से प्राप्त नहीं हो सकता। आनंद तो मन की अवस्था है, देर-सबेर हमारी भावना असंतोष में बदल सकती है, और सदानंद की ओर जाने के बजाय हम सामाजिक रूप से वांछित खुशियों के पीछे अधिकाधिक दौड़ने लगते हैं।

स्वस्थ्य एवं आनंदी युवा किसी भी देश के विकास की बुनियाद है और सच्चा आनंद विश्व के मायाजाल में प्राप्त नहीं हो सकता। आनंद मन की अवस्था है; अतः, सच्चा आनंद मन और आत्मा से ही प्राप्त हो सकता है, न कि बाहरी परिस्थितियों से। चाहे हम कितनी भी कोशिश करें लेकिन विषयसुख के पीछे भागते रहेंगे तो हमें सच्ची आश्वस्ति कभी प्राप्त नहीं होगी। कई ॠषि-मुनियों के कथनों व अध्ययनों से पता चलता है कि ध्यान अथवा ध्यान साधना से सच्चा आनंद- आंतरिक शांति व आश्वस्ति प्राप्त करने में मदद मिलती है। ध्यान से होने वाले लाभों को लेकर कई वर्षों से असंख्य अध्ययन हुए हैं। अधिकांश अध्ययनों ने इस बात को स्वीकार किया है कि तनावों के विपरीत परिणामों को दूर करने व तनावमुक्त करने की ध्यान में शक्ति है। लिहाजा, हाल में कुछ ठोस अध्ययनों ने हमारे इस अनुमान को सही साबित किया है कि ध्यान-साधना हमें आनंद प्राप्ति में सहायता करती है।

 श्री अडातिया देने और बांटने को अपनी सफलता का श्रेय देते हैं। उनका सपना है कि लाखों लोगों तक पहुंच कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए सशक्त बनाना, गरीब बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराना, योग्य युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना, खाद्यान्न व चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करना, सभी आयुवर्ग के लोगों को आंतरिक संतोष देना, प्राकृतिक आपदाओं के इलाकों में राहत व बचाव कार्य में सहायता देना आदि।

 ‘‘ध्यान से नकारात्मक भावनाएं दूर होती हैं, ब्रह्मांड में सकारात्मक स्पंदनों को खोजने में सहायता मिलती है, आत्म-विश्वास बढ़ता है तथा आंतरिक शांति पाने व जीवन का अर्थ प्राप्त करने में मदद मिलती है।’’

 

 

 

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