मेघदूत का टी.ए. बिल

“ऑडिटर कालिदास से बोले, ‘सर, आपकी रचनाएं तो समयमान-वेतनमान में नहीं, युगांतर में भी पाठकों के आकाश में यात्रा करती रहेंगी।’ कालिदास प्रमुदित थे। ऑडिट में साहित्य रस का ऐसा योग? ऑडिटर के सत्कार के बाद कालिदास विदा हुए तो ऑडिट की आपत्तियां भी विदा हो गईं।”

जैसे बीरबल लहरें गिनने के लिए जहाजों के आवागमन को रोक सकता है, वैसे ही ऑडिटर भी कागज पर आती हुई लक्ष्मी को। यों आंकड़ों के खेल निराले होते हैं, पर उनमें भी मजे के अवसर होते हैं। न होते तो गणितज्ञ का एलजेब्रा आनंद में लंबायमान न होता। ऑडिट की सूखी जमीन भी ठहाकों के अवसर निकाल ही लेती है।

इस बार जब कालिदास का टी.ए. बिल कोषालय पहुंचा तो ऑडिटर मुस्कुरा दिया। यों उसने कालिदास के साहित्य को भी पढ़ा था। नाटक भी देखे थे। पर इच्छा थी कि उनके साथ संगत हो जाए। दरअसल यक्ष की विरह वेदना का संज्ञान लेते हुए राजाज्ञा प्रसारित हुई थी कि उसका संदेश लेकर किसी कवि को अलकापुरी भेजा जाए। कालिदास को मुकर्रर किया गया तो वे भी विश्वविद्यालयीन विशेषज्ञ की तरह अड़ गए- “मैं सड़क मार्ग से नहीं, एयर-मेघ से जाऊंगा।” यक्षों की दुनिया धनी-मानी थी ही। सो वे रामटेक पर्वत से एयर-मेघ के साथ अकलकापुरी पहुंचे और अपना टी.ए. बिल कोषालय भिजवा दिया।

कोषालय की आपत्तियां कागज पर उतरने लगीं। मंद-मंद मुस्कुराते हुए ऑडिटर ने लिखा- कालिदास को हवाई रूट से भेजा गया था, तो वे सीधे नागपुर होते हुए अलकापुरी न जाकर विदिशा में क्यों अटके? विदिशा से वे वक्री होकर उज्जैन क्यों चले गए? इस तरह यात्रा मार्ग एवं दिन क्यों बढ़ाये गए? दूसरी आपत्ति यह कि कालिदास ने मौजमस्ती से पर्यटन का आनंद लिया। विदिशा में यक्षिणियों के सौंदर्य में सुलझे रहे और उज्जयिनी में महाकाल मंदिर में कपोत-कपोती का कलकूजन में कविता बिखेर दी। वे क्षिप्रा और गंभीरा के जल प्रवाह में भी उलझे रहे। यही नहीं, नगर के मार्गाें पर जाती हुई श्रमिकाओं के पसीने पर नन्हीं बूंदें भी बरसा दीं। तीसरी आपत्ति यह कि टी.ए. बिल में केवल हवाई विवरण नहीं है। ये जमीनी विवरण भी हैं। एकसाथ सड़क और हवाई यात्रा आपत्तिजनक है। चौथी आपत्ति यह कि कालिदास को विरह की चिट्ठी लेकर जाना था, सो भी ‘यक्ष सरकार के सेवार्थ’ लिफाफा सील लगाकर। माना कि यक्ष ने मौखिक संदेश दिया होगा, पर कवि ने उसमें अपना मसाला मिला दिया है। उसने लिखा है- श्यामल लताओं में तुम्हारा शरीर, चकितहरिणी की आंखों में तुम्हारी चितवन, चन्द्रमण्डल में तुम्हारा मुख, मयूर-पंखों में तुम्हारी केशराशि, नदी की तरंगों में तुम्हारी भौंहों का विलास देख लेता हूं, पर सारे सुंदर उपमान एकसाथ नहीं मिलते जैसी तुम्हारी सुंदर देह में एकत्र मिल जाते हैं।’ तो क्यों न ऐसा माना जाए कि कवि ने यक्ष के बहाने अपना काम उसी तरह निकाला है, जैसे कई बार निजी कार्याें के लिए सरकारी काम निकालकर यात्रा कर ली जाती है। अत: यह बिल मूलत: वापस किया जाता है।

आपत्तियां विभागाध्यक्ष तक लौटीं, तो वे भी मुस्कुराते हुए चिंतित हो गए। ऑडिटर भी कितना मजेदार है, कण्डिकाओं में भी रस ले रहा है। छंद कालिदास ने रचे, वैसे ही ऑडिटर ने कंण्डिकाओं के छंद। उन्होंने कालिदास को बुलाया। बोला – ‘अब आप ही कोषालय में जाकर इन कण्डिकाओं के निराकरण की बात कर लो।’ कालिदास तो स्वाभिमानी थे ही। यों भी राज्याश्रय उन्हें कम ही स्वीकार्य था। पर ऑडिट-आपत्तियों को पढ़कर वे भी मुस्कुरा गए। आखिरकार कोषालय पहुंचे और ऑडिटर से बात की।

ऑडिटर ने कहा – ‘पहले आप बताइए कि चाय लेंगे या कॉफी? या गर्मी बहुत ज्यादा है तो ‘ठंडा यानी….’ बुलवा लूं, ताकि मेघदूत की श्रमिकाओं के माथे पर, वर्षा की बूंदों की तरह आपका पसीना भी सूख जाए।’ कालिदास अचंभित हुए। कोषालय तो कभी चाय पिलाता नहीं है और ये महाभाग ठंडा पिलवा रहे हैं, सो भी इतनी आपत्तियों के बावजूद। कालिदास बोले -‘मैं तो आपत्तियों के निराकरण हेतु आया था, और आप हैं कि………।’ ऑडिटर ने कहा -‘सो तो हो जाएंगी, आप क्यों चिंता करते हैं?’ कालिदास बोले – ‘अरे, इतनी भारी भरकम आपत्तियां। ये आपत्तियां तो न मुझे जमीन पर चलने देती हैं, न मेघ की तरह हवा में उड़ने देती हैं। सारी यात्रा की हवा ही निकल गई।’ ऑडिटर ने कहा – ‘सर, आपकी कविताएं तो हमारी इन कंडिकाओं के ऊपर हवाई यात्रा करती रहती हैं। हम कौन आपत्ति लगाने वाले हैं, जिनकी रस धार हमारे भीतर बहती है। एकबारगी इच्छा थी कि आप मेघों को दूत बनाकर कोषालय भी ले आते। सो बुलवा लिया। अब तो ठंडा पीकर हमें भी ठंडक दीजिए। आपकी रचनाएं तो समयमान-वेतनमान में नहीं, युगांतर में भी पाठकों के आकाश में यात्रा करती रहेंगी। कालिदास प्रमुदित थे। ऑडिट में साहित्य रस का ऐसा योग? सत्कार के बाद कालिदास विदा हुए तो ऑडिट की आपत्तियां भी विदा हो गईं।

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