पंचर, कपलिंग और टाइमपास लोकतंत्र

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लोकतंत्र की क्या कहिए। कब पंचर हो जाए। कब तक स्टेपनी साथ दे। कब इंजिन सहमति दे जाए। कब कौन पत्ते फैंट दे। कब कौन तीन पत्ती शो कर दे। कब गुलाम और इक्का मिलकर बादशाह को पंचर कर दे। कब ताश की दुक्की ट्रंप बन जाए। चाय, अखबार और चैनलों में पसरे हुए जनता के दिन इस बहाने कितने लोकतांत्रिक ढंग से कट जाते हैं।

मेघदूत का टी.ए. बिल

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“ऑडिटर कालिदास से बोले, ‘सर, आपकी रचनाएं तो समयमान-वेतनमान में नहीं, युगांतर में भी पाठकों के आकाश में यात्रा करती रहेंगी।’ कालिदास प्रमुदित थे। ऑडिट में साहित्य रस का ऐसा योग? ऑडिटर के सत्कार के बाद कालिदास विदा हुए तो ऑडिट की आपत्तियां भी विदा हो गईं।”

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