बिहार में बजने लगा चुनावी नगाड़ा

बिहार में विधान सभा चुनावों की तैयारियां जोरशोर से शुरू हो गई हैं। नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए पक्ष अधिक मजबूत दिख है, जबकि दो अन्य प्रमुख दलों- राजग व कांग्रेस अपनी ही चाल चल रहे हैं। इस चुनाव में प्रवासी मजूदर मुख्य मुद्दा होगा और यह वोट बैंक ही सत्ता की चावी का ताला खोलेगा।

बिहार में इस कयास की अब कोई गुंजाइश नहीं बचती दिख रही है कि सूबे में विधान सभा के आम चुनाव समय पर होंगे या नहीं। इसी वर्ष 24 नंवबर से पहले अगली विधान सभा का चुनाव हो जाना है और चुनाव आयोग इसकी तैयारी में जुट गया है। मतदाता सूची पुनरीक्षण, मतदान केंद्रों की जांच-पड़ताल, प्रर्याप्त संख्या में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की व्यवस्था व उसकी टेस्टिंग आदि का शेड्यूल आयोग तैयार कर रहा है। संविधान में घोषित निष्पक्ष व निर्भय मतदान की गारंटी के लिए सुरक्षा व प्रशासनिक व्यवस्था की रूपरेखा को भी निश्चित स्वरूप दिया जा रहा है। लब्बोलुआब यह है कि किसी भी कीमत पर तय समय-सीमा में चुनाव संपन्न करा इस कोरोना काल में बिहार को नई विधान सभा व नई सरकार का तोहपा देने को यह कटिबद्ध दिखने लगा है। जब आयोग तैयार है तो राजनीतिक दल भला क्यों पीछे रहेंगे। इसी का नतीजा है कि सूबे के तीनों बड़े दल भाजपा, जदयू और राजद भी अपने चुनावी अभियान का आगाज कर चुका है।

भाजपा के शिखर चुनावी रणनीतिकार अमित शाह आभासी (वर्चुअल) रैली की, जिसे जनसंवाद का नाम दिया गया। इस रैली के जरिए अमित शाह ने सूबे के लाखों मतदाता से सीधा जनसंवाद किया। भाजपा की इसी वर्चुअल रैली के प्रतिकार में विपक्षी राजद ने सात जून को ही थाली बजाओ आंदोलन चलाया। उसने अमित शाह की इस रैली को लॉकडाउन काल में मजदूरों-गरीबों की मौत के जश्न का नाम दिया।

मुख्यमंत्री व जदयू सुप्रीमो नीतीश कुमार ने अपने नेताओं व कार्यकर्ताओं से चुनावी तैयारी पर सप्ताह-व्यापी संवाद अभियान की शुरुआत की। यह संवाद कार्यक्रम पटना में मुख्यमंत्री आवास से जिलावार आयोजित किया गया। इसके अलावा कांग्रेस, रालोसपा, हम, वीआइपी, सहति वाम व अन्य सभी दल चुनावी मोड़ में आ गए हैं।

सत्ता की राजनीति के रंगमंच से इतर नेपथ्य में भी कम रोचक खेल नहीं चल रहे हैं। यह दौर गठबंधन की राजनीति का है। ऐसी राजनीति में छोटे-छोटे छत्रप भी बड़े खिलाड़ी की तरह भाव खाने लगते हैं। हालांकि कुछ चुनावी घाघ माहौल के आरंभिक दौर में चुपचाप खेल देखते रहते हैं और नाजुक मोड़ पर अपनी भूमिका बदलकर सबको चौका देते हैं। बिहार विधान सभा के चुनावों को लेकर आयोग के हरकत में आने के साथ ही यहां कुछ ऐसा ही राजनीतिक परिदृश्य बन रहा है। सूबे के दो बड़े राजनीतिक गठबंधन ऐसी ही स्थिति में फंसे हैं।

यह कहने की जरूरत नहीं कि राजनीतिक तौर पर एनडीए ज्यादा सुगठित, ज्यादा सन्नद्ध व ज्यादा अनुशासित गठबंधन है। इसके घटक दलों में परस्पर राजनीतिक सम्मान-भाव तो अधिक है ही, घटक दलों के नेता अपनी महात्वाकांक्षा या आपत्ति, जो बहुधा सत्ता-लोलुपता तक जाती है, को अमूमन सार्वजनिक तौर पर जाहिर नहीं करते हैं। ऐसी राजनीतिक परिपव्कता का महागठबंधन के दलों में घोर अभाव है। कोरोना त्रासदी के बावजूद एनडीए में सीटों के बंटवारे को लेकर अनौपचारिक बातचीत चलती रही है और वह एक मुकाम पर पहुंच भी गई है, बगैर किसी दावे-प्रतिदावे के। पर, महागठबंधन में हालत इसके उलट हैं। यह तीनों भागों में और अलग-अलग दिशा में मुंह करता दिख रहा है। राजद सूबे में अपनी औकात के कारण अपने ढंग से चल रहा है, तो कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी के हैंगओवर में ही पड़ी रहती है, जमीनी हकीकत से दूर। बाकी तीन पार्टियां रालोसपा, हम व वीआइपी जमीन से ऊपर होकर ही राजनीति को देख रही हैं। महागठबंधन के दलों की अब तक कोई औपचारिक व अनौपाचरिक बैठक नहीं हुई है। हां विधान सभा सीटों के लिए दावे आने लगे हैं।

विधान सभा चुनाव के मुद्दे तो बहुत हैं, पर कोरोना महामारी और इसकी रोकथाम व इसके निपटने के उपाय के साथ-साथ प्रवासी बिहारी से बड़ा मुद्दा कोई है ऐसा लगता नहीं है। यह सत्ता पक्ष के लिए भी और विपक्ष के लिए भी। अब सारा राजनीतिक कौशल इन मुद्दों को पेश कर उन्हें वोट में बदलने पर निर्भर करता है। वैश्विक महामारी की बिहार पर पड़ी मार और उससे लोगों को राहत देने के सरकारी उपाय और इन उपायों से पीड़ित प्रवासी बिहारी ही चुनाव अभियान का मूल राजनीतिक आधार बनेगा। सूबे में कानून व्यवस्था की हालत व अन्य कई बुनियादी समस्याएं हैं। पर, वे सभी परिधि में होंगे। केंद्र में तो प्रवासी बिहारी के साथ बिहार की सत्ता राजनीति का सलूक व कोरोना त्रासदी से बचाव के उपाय ही होंगे। प्रवासी बिहारी व दूसरे राज्य में पढ़ रहे बिहारी छात्रों की घरवापसी को लेकर नीतीश कुमार की सरकार पिछले एक महीने से जिस हद तक सक्रिय है। आरंभिक सवा महीनों लॉकडाउन दो तक में उसकी भूमिका उतनी ही नकारात्मक रही। प्रवासी बिहारियों की बात तो दूर कोटा में पढ़ रहे कोई 15 हजार बिहारी छात्रों की घर वापसी को भी यह सरकार तैयार नहीं थी। नीतीश सरकार का मूल कथन था कि जहां है, वहीं रहे। बाद में राजनीतिक व सामाजिक दबाव में छात्रों व प्रवासी बिहारियों की घरवापसी के लिए तैयार होना पड़ा। यह जन धारणा है जो गलत नहीं है कि नीतीश कुमार की सरकार इनकी घरवापसी के पक्ष में नहीं थी।

अब लौट चुके इन्हीं कोई 25 लाख प्रवासी बिहारियों की वोट के लिए एनडीए परेशान है और यह भी कि बिहार पुलिस ने इन्हें आपराधी प्रवृत्ति के साबित करने की बात कह दी है। हालांकि इस बात को वापस ले लिया गया। जो भी हो, मतदाताओं की यह तादाद विधान सभा चुनाव में बड़ी निर्णायक भूमिका निभा सकती है। जान बचाने को घर लौटे और जीवन-यापन की जद्दोजहद में फंसे 25 से 30 लाख प्रवासी मजदूर वोट बैंक में तब्दील हो रहे हैं। इन सब पर सत्तारूढ़ एनडीए दावा कर रहा है, तो विपक्ष भी।
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