हर कोई हर समय ग्राहक होता है

हम सभी नागरिक ग्राहक या उपभोक्ता हैं। हमारे जन्म से पहले और मृत्यु के बाद भी हम उपभोक्ता हैं। हमारी मां गर्भ विकसित हो इसलिये कुछ दवाएं और कुछ खाद्य पदार्थ ग्रहण करती हैं। और, हमारी मृत्यु के बाद हमारी अत्यंविधि के लिए कुछ चीजें खरीदी जाती हैं। इस लिए हम सभी आजन्म ग्राहक या उपभोक्ता के रूप में संचार करते हैं।

मगर सवाल यह है कि हमारे भारतीय ग्राहकोें में से कितने ग्राहकों या उपभोक्ताओं को उनके अधिकार क्या है इसकी पूरी जानकारी होती है? कितने उपभोक्ताओं को उनके क्या कर्तव्य हैं और उनकी क्या जिम्मेदारियां हैं, यह मालूम होता है ? इस विषय से हमें पहले भारतीय उपभोक्ताओं का इतिहास जानना पडेगा।

स्वातंत्र्य प्राप्ति के पूर्व और उसके बाद के 20-30 साल के काल में भारतीय उपभोक्ता की स्थिति निम्नलिखित स्वरूप की थी-

1. भारतीय ग्राहक अशिक्षित था।

2. भारतीय ग्राहक अ-जागरुक था।

3. भारतीय ग्राहक गरीब था।

4. उसकी क्रयशक्ति कम थी।

5.भारतीय ग्राहक की उधारी में वस्तु खरीदी की प्रवृत्ति और अवस्था थी।

6. भारतीय ग्राहक असंगठित था।

7. भारतीय ग्राहक को बाजार में राजा कहा जाता था; मगर सही मायने में वह गुलाम था। उसका उत्पादक और व्यापारी वर्ग से शोषण होता था।
मात्र उद्योजक और व्यापारी शक्तिमान थे। संगठित थे। उत्पादन कितना करना, किस भाव से वस्तु बेचना और कितना मुनाफा कमाना यह सभी वे तय करते थे। कारण हमारे देश में लंबे समय तक ‘विक्रेतांओं का बाजार’ अस्तित्व में था। इसी कारण निम्नलिखित तरीके से उपभोक्ताओं का शोषण होता था-

1. बाजार में कृत्रिम अभाव की परिस्थिति निर्माण की जाती थी।
2. उसके कारण वस्तुओं की कीमतें बढा दी जाती थीं।
3. उपभोक्ताओं को निम्न दर्जे की वस्तु दी जाती थी।
4. वस्तुओं में मिलावट की जाती थी। उदा. तेल।
5.वस्तुओं की जमाखोरी कर काला बाजार किया जाता था।
6.उपभोक्ताओं को उधारी में महंगे दाम से वस्तुएं बेची जाती थीं।
7. वस्तु वजन में कम दी जाती थी।

संक्षेप में, भारतीय उपभोक्ताओं का हर प्रकार से शोषण किया जाता था।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी उद्योजकों और बेपारियों से कहते थे, ‘उपभोक्ता आपके व्दार पर आनेवाला सब से महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है। उससे बेहतर बर्ताव होना चाहिए।’ उसका असर दिखाई देता था, मगर बहुत कम मात्रा में। क्योंकि, उस समय उद्योजक और बेपारियों का ‘अधिकाधिक मुनाफा कमाना’ यही एकमात्र लक्ष्य था। इसी कारण हमारे देश में अतिरिक्त मात्रा में मुनाफखोरी होती रही। हमारे शासनकर्ता उदासीन और हतबल थे। ग्राहकों को संरक्षण प्रदान करने वाले अधिनियम, नियम अस्तित्व में नहीं थे।

1960-61 तक यह परिस्थिति पूरे देश में मौजूद थी। इसी समय एक अच्छी घटना घटित हुई। अमेरिका में 1961-62 में चुनाव होने वाले थे। इस चुनाव में जे. एफ. कैनडी उम्मीदवार थे। उन्होंने अमेरिकी मतदाताओं से कहा कि यदि मैं इस चुनाव में जीत गया तो मैं आप सभी को उपभोक्ता मानकर निम्नलिखित चार अधिकार प्रदान करूंगा और उन्हें अधिकार अमेरिकी संविधान में सम्मिलित करूंगा-

1. चयन का अधिकार
2. सुरक्षा का अधिकार
3. राय व्यक्त करने का अधिकार
4. जानकारी पाने का अधिकार

इस चुनाव में कैनडी की जीत हुई और पूरे विश्व के उपभोक्ताओं में चेतना निर्माण हुई। भारत में भी चेतना दिखाई दी। ग्राहक अपने अधिकारों के बारे में सोचने लगा, बोलने लगा।

परिणाम स्वरूप हमारे देश में कुछ लोगों ने ग्राहक वर्ग को संगठित करने का प्रयास किया। कुछ अच्छे संगठन स्थापित हुए। कंज्यूमर्स गायडन्स सोसायटी ऑफ इंडिया की स्थापना मुंबई में कुछ महिलाओं ने की। इसके बाद श्री बिंंदु माधव जोशी (पुणे) ने अखिल भारत ग्राहक पंचायत की स्थापना की। इसलिए उनको भारतीय ग्राहक आंदोलन का संस्थापक माना जाता है। अ.भा. ग्राहक पंचायत की शाखाएं सर्वदूर खूलने लगीं। ग्राहकों को संगठित करने का कार्य जोर से शुरू हुआ। ग्राहकों का प्रबोधन और उन्हें संगठित करने उद्देश्य से अ.भा. ग्राहक पंचायत ने अपना कार्य शुरू किया।

उसके बाद मुंबई में सर्वश्री मधु मंत्री, संगीतकार सुधीर फडके और ज्येष्ठ पत्रकार पां. वा. गाडगीळ ने मुंबई ग्राहक पंचायत की स्थापना 1975 में की। यह संगठन सिर्फ महाराष्ट्र में नहीं, पूर भारत में फैला और एशिया का सब से बड़ा संगठन बन गया। इस संगठन के वर्तमान में 28000 परिवार सदस्य बने हैं और यह संगठन ‘न लाभ, न हानि’ के सिद्धांत को स्वीकार कर अपने 28 हजार सदस्यों को आवश्यक 400 वस्तुओं का वितरण कर रहा है।
आज की स्थिति में ग्राहकों के मन में थोडी जागरूकता आ गयी है। भारत में 15-20 अच्छे ग्राहम संगठन कार्यरत हैं। मगर, संगठित ग्राहकों का हिस्सा देश की कुल जनसंख्या में मात्र 5 प्रतिशत भी नहीं है, इसका हमें दुख होता है। ग्राहक जागृत और संगठित हो यह हमारी कामना है; मगर बहुत सारे ग्राहक उदासीन दिखाई देते हैं। उन्हें अपनी ताकत महसूस नहीं होती, यह दुर्गाग्य की बात है । यदि हम सभी ग्राहक संगठित हो कर हमारा ‘ दबाव गुट’ बनाए तो हम ग्राहक शोषण विरहित अर्थव्यवस्था और समाज निर्माण कर सकते हैं।

ग्राहक कार्यकर्ताओं और संगठनों के दबाव पर ग्राहक हित में ग्राहक संरक्षण कानून, 1986 लागू हुआ है। यह एक क्रांतिकारी कानून है, जिसमें उपभोक्ताओं को शोषण से मुक्ति के प्रावधान हैं। उनके अधिकारों को सुरक्षा मिली है। इस कानून ने इस वर्ष अपनी रजत जयंती पूरी की है।

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