बंध्यत्व की चिकित्सा संभव है

शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ व निरोग रहकर गृहस्थ जीवन के सुख प्राप्त करते हुए वंश-वृद्धि करना हरेक व्यक्ति की कामना होती है और प्रकृति का सर्वसामान्य नियम भी है। विवाह के पश्चात यदि दो वर्षों तक यदि गर्भ धारण न हो तो उस दंपति में बंध्यत्व होना मान लिया जाता है। मुंबई के प्रसिद्ध होम्योपैथ डा मंदार नाबार कहते हैं कि गर्भधारण होने पर भी यदि वह पूरे समय तक ठहर न सके, तो उसे ‘सेकेंडरी इनफर्टिलिटी’ कहा जाता है, जबकि गर्भधारण ही न हो तो उसे ‘प्रिओनरी इन्फर्टिलिटी’ कहा जाता है।

डा. मंदार नाबार का कहना है कि गर्भधारण होना स्त्री व पुरुष दोनों पर निर्भर करता है। इसलिए चिकित्सकों को जांच करके सुनिश्चित करना होता है कि बंध्यत्व स्त्री या पुरुष में से किसमें है। वे कहते हैं कि समाज के प्रभाव के कारण ज्यादातर लोग यही भ्रम पाले रहते हैं कि बंध्यत्व स्री में ही होता है। इसलिए यह विशेष रूप से समझने की आवश्यकता है कि बंध्यत्व स्त्री व पुरुष दोनों में ही हो सकता है। पुरुषों में किसी शारीरिक क्षति के कारण, जो बंध्यत्व होता है, उसे ‘मेल फैक्टर इन्फर्टिलिटी’ कहा जाता है। इस तरह, जब किसी स्त्री में बंधत्व होता है,तो चिकित्सा की भाषा में उसे ‘फीमेल इन्फर्टिलिटी’ कहते हैं। कई बार स्त्री-पुरुष दोनों में ही दोष न होने अथवा अल्पदोष होने पर गर्भधारणा नहीं हो पाती, ऐसे बंध्यत्व को ‘अनएक्सप्लेंड इंफर्टिलिटी’ कहा जाता है।

पुरुष बंध्यत्व:
डा. मंदार नाबर के अनुसार, पुरुषों की प्रारंभिक जांच बहुत आसान होती है। यह बहुत कष्टकारी और अल्प खर्चीला होता है। सामान्यत: स्त्री की जांच करने से पूर्व ही पुरुष की जांच करनी होती है। इसे वीर्य की जांच कहा जाता है। इस जांच में शुक्राणु की मात्रा, वीर्य का घनत्व, शुक्राणु का वेग और उसकी सुदृढ़ता की जांच की जाती है। डा मंदार का मानना है कि आंकड़ों की दृष्टि से उनके पास आनेवाले मरीजों में लगभग 40 प्रतिशत पुरुष बंध्यत्व तथा इतने ही स्त्री बंध्यत्व के होते हैं। जबकि 20 प्रतिशत अज्ञात कारणों से होते हैं।

अपने अनुभव के आधार पर डा मंदार नाबर सुझाव देते हुए कहते हैं कि बंध्यत्व के कारणों का पता लगाते समय स्त्री-पुरुषों को डाक्टर से किसी भी प्रकार का संकोच न करते हुए सारी जानकारी सही-सही देना चाहिए। इससे डाक्टर का कार्य सरल हो जाता है। जांच के दौरान पाया जाता है कि अनेक पुरुषों के वीर्य में शुक्राणु आवश्यक प्रमाण में नहीं होते। कभी-कभी तो होते ही नहीं। अनेक पुरुषों की शुक्रवाहिनी में अवरोध उत्पन्न होने के कारण शुक्राणु का प्रवाह उचित गति से नहीं होता है। ऐसी स्थिति में शल्य-क्रिया का सहारा लेना पड़ता है। अनेक बार शुक्रवाहिनी में अवरोध नहीं होता, फिर भी शुक्राणु का प्रमाण शून्य होता है। ऐसी स्थिति में उनका कहना है कि ‘हार्मोनल टेस्ट’ करना आवश्यक हो जाता है।

स्त्री बंध्यत्व:

डा. मंदार नाबर का कहना है कि स्त्री में बंध्यत्व कैसे होता है, उसके कारण क्या होते हैं, यह समझने के लिए प्रजनन प्रक्रिया की जानकारी होना आवश्यक है। दो ऋतुकाल के बीच का समय गर्भधारण के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे ‘फर्टाइल पीरिएड’ कहा जाता है। इस अवधि में शारीरिक संबंध होने से गर्भधारण हो सकता है। यह अवधि ऋतुकाल के 10वें से 20वें दिन तक हो सकती है। वीर्यकोष से परिपक्व वीर्य बाहर निकलकर गर्भनली से होकर गर्भाशय तक पहुंचता है। स्त्री-पुरुष संबंध होने पर पुरुष शुक्राणु से स्त्री वीर्य का संयोग होता है और प्राथमिक अवस्था का गर्भ तैयार होता है। इस प्रक्रिया में कहीं भी बाधा उत्पन्न होने पर बंध्यत्व उत्पन्न होता है।

डा. मंदार नाबर का कहना है कि गर्भाशय की नली में अवरोध उत्पन्न होने पर ‘हिस्टेरियोसाल्फिंगोग्राफी व लेप्रस्कोपी द्वारा निदान किया जाता है। वस्तुत: शरीर के कई तत्वों, रक्त में घुले हुए एफएसएच तथा एलएच के स्राव से भी गर्भाशय की नली में अवरोध उत्पन्न होता है। इसी प्रकार स्त्री-जननांग में सूजन आ जाने से शारीरिक-संबंध पीड़ादायक हो जाता है। इस कारण भी गर्भधारण करना कठिन हो जाता है। इस सबका निदान अनुभव और शारीरिक जांच के द्वारा किया जा सकता है।

होमियोपैथी चिकित्सा के संबंध में :-

होमियोपैथी चिकित्सा का केंद्र-बिंदु व्यक्ति होता है। व्यक्ति की प्रकृति के अनुरूप चिकित्सा की जाती है। इसके स्वभाव के अनुरूप औषधि में बदलाव किया जाता है। वस्तुत: यह औषधि किसी एक अवयव के बजाय पूरे शरीर पर कार्य करती है। अनेक बार स्त्री-पुरुष दोनों के पूर्ण समर्थ होते हुए भी गर्भधारण नहीं होेता है। ऐसे समय में होमियोपैथी चिकित्सा विशेष कारगर होती है।

डा. मंदार नाबर के अनुसार बिना पूरी जांच किये दवा देना उचित नहीं होता। अनेक बार जांच करने पर भी सही कारण पता नहीं चलता, तब लक्षण समुच्चय करना होता है। डाक्यूमेंटेशन करना होता है। कभी-कभी स्त्री-पुरुष के आधार पर (जेंडर बेस्ड) दवा दी जाती है। कभी-कभी समस्या पैदायशी होती है- जैसे पुरुष में शुक्राणु की समस्या, एक वृषण होना, महिलाओं को गर्भाशय न होना या बहुत छोटा होना आदि। ऐसी दशा में औषधि का प्रभाव कम कारगर होता है। सफलता के मामले में उनका कहना है कि यह उम्र, धारणा, कारम पर निर्भर करता है।

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