रामो राजमणि सदा विजयते

जिस प्रकार रावण जैसी दुष्ट प्रवृत्ति पर विजय प्राप्त कर भगवान श्रीराम अयोध्या वापस लौटे थे, उसी प्रकार आज भी समाज की दुष्ट प्रवृत्तियों का अंत कर प्रभु श्रीराम फिर एक बार अयोध्या लौट रहे हैं। मंदिर के शिलान्यास का दिन करोड़ों हिंदुओं के लिए गर्व और खुशी का दिन होगा।

आखिरकार राम नाम की विजय पताका अब अयोध्या में फिर एक बार लहराएगी। राम जन्मभूमि पर सर्वोच्च न्यायालय ने जो फैसला सुनाया वह केवल एक स्थान मात्र का प्रश्न सुलझाना नहीं था, तो लाखों हिंदुओं की आस्था और श्रद्धा की विजय थी। 5 अगस्त को राम मंदिर का शिलान्यास सैकड़ों वर्षों की तपस्या का फल है। हजारों हिंदुओं के बलिदान का और सैकड़ों कार सेवकों की श्रद्धा की विजय है। राम मंदिर इस देश में एक नई सकारात्मक ऊर्जा लेकर आ रहा है। और आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसे इतिहास की गवाही दे रहा है, जिसने कई कष्ट सहने के बावजूद भी अपने पैर जमाए रखे, और आखिरकार इस आस्था को विजय मिली।

किसी भी देश का अस्तित्व वहां के लोगों की आस्था और श्रद्धा के कारण जाना जाता है। हर देश की एक संस्कृति होती है, एक परंपरा होती है, भारत विविधता में एकता वाला देश माना जाता है, और यहां के लोगों की आस्था हमेशा से ही ईश्वर में रही है। राम नाम का जाप सदैव से होता आ रहा है। श्री रामचंद्र की पूजा हर भारतीय घर में होती आ रही है। लेकिन कई सौ सालों पहले मुगल आक्रांताओं ने हमारे देश पर आक्रमण कर यहां की संस्कृति और सभ्यता को नष्ट करने की कोशिश की। हमारी संस्कृति के प्रतीक कई मंदिरों को धर्मस्थलों को तबाह कर दिया। वे केवल इसी पर नहीं रुके तो इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए यहां पर अपने धर्म के प्रतीक कई मस्जिदें भी खड़ी कर दीं। अयोध्या में बाबरी मस्जिद इसी तरह से खड़ी की गई एक मस्जिद थी, जिसका ढांचा आखिरकार 6 दिसंबर 1992 को कार सेवकों द्वारा गिरा दिया गया। यह कार सेवा किसी धर्म विशेष के खिलाफ ना होकर अपनी आस्था को बचाने के लिए थी, मुगल साम्राज्य की काली करतूत को समाप्त करने के लिए थी, बाबर जैसे शासक की हस्ती मिटाने के लिए थी, जिसने हमारे देश को तहस नहस किया। इस आंदोलन के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल, और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तमाम स्वयंसेवकों ने, विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने अपनी जान की भी चिंता ना करते हुए राम जन्मभूमि को वापस वह सम्मान दिलाने के लिए अथक प्रयत्न किए। आखिरकार उन सभी के प्रयत्न आज सफल हुए।

मेरा और मेरे जैसे कइयों का जन्म 1992 के बाद हुआ है। हम ने घर पर बचपन से ही ‘राम जन्मभूमि आंदोलन’ की कई कथाएं सुनी हैं। इस आंदोलन में मेरे परिवार के 8-10 सदस्य शामिल थे। वे अयोध्या गए हुए थे। उस वक्त संचार के साधन आज के जैसे नहीं थे। देश के लिए, देश की संस्कृति के लिए कुछ कर दिखाने के उद्देश्य से मेरे परिवार के सदस्य इसमें शामिल हुए थे। घरवालों को उनकी खुशहाली के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाती थी। जब विवादित ढांचा गिराया गया, उसके बाद देश की परिस्थिति बहुत ही चिंताजनक थी। लेकिन ऐसे समय में भी इन कार्यकर्ताओं ने हार नहीं मानी और ‘रामलला’ के लिए अविरत कार्य करते रहे। मुझे आज भी याद है हम बचपन से ही ‘सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे’ सुनते आए हैं। उस वक्त अटल जी के अमर भाषण, घर पर राम मंदिर विषय पर चर्चा, संघ परिवार में इस विषय की चर्चा हमेशा से ही घर पर कानों पर पड़ती आ रही थी। जब समझ आने लगा, तब एक बात अवश्य समझ आई कि यह एक बहुत महत्वपूर्ण विषय है। जिस भगवान की ‘रामरक्षा’ हम हर शाम को बोलते आ रहे हैं। जिनकी ‘रामायण’ ने हमें हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति से पहचान कराई, जिन्होंने एक आदर्श समाज और आदर्श पुरुष की व्याख्या की ऐसे भगवान श्रीराम के अस्तित्व पर जब देश के कुछ लोग ही प्रश्न उठाते थे, तो यह हमारी पीढ़ी के लिए भी उतना की क्लेशकारक होता था, जितना कि हमारे पहले की पीढ़ी के लिए था। इसलिए राम मंदिर अवश्य बने, वहीं बने और जल्दी बने यह हमारी भी प्रार्थना थी।

हमने अपनी आंखों से राम जन्मभूमि आंदोलन तो नहीं देखा, लेकिन उसका महत्व, उसकी तीव्रता जरूर समझी। आखिरकार यह निर्णय आया, और हमारी प्रार्थनाओं को फल मिला। 5 अगस्त का दिन, इतिहास में सुवर्ण अक्षरों से लिखा जाएगा। आखिरकार श्रीराम भगवान, माता सीता, बंधु लक्ष्मण और रामभक्त हनुमान की फिर एक बार अपने घर में वापसी होने जा रही है। जिस तरह सीता माता को लेकर आने के बाद अयोध्या वासियों ने प्रभु श्रीराम का स्वागत किया था, उसी प्रकार आज भी सारा देश खुशियां मानएगा। इस एक दिन को देखने के लिए हजारों लाखों लोगों की आंखें तरस रही थीं।

आज जब सभी आनंदित हैं, समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो इसे एक अलग रंग देने की कोशिश कर रहा है। बुरा तब लगता है जब अपने ही देश के कुछ लोग इस विषय पर ‘सेक्युलेरिज्म’ की बीन बजाते हैं। जो अपने ही देश की अस्मिता पर सवाल खड़े करते हैं। जो अपने ही देश के इतिहास को शंका की दृष्टि से देखते हैं। 5 अगस्त का दिन उन सभी लोगों के लिये सबक का दिन होगा। राम जन्मभूमि आंदोलन ने सुप्त हिंदू समाज को जागृत किया था, संगठित किया था, और इसी कारण राम जन्मभूमि का यह परिणाम संपूर्ण समाज के लिए बहुत मायने रखता है।

रामरक्षा की कुछ पंक्तियां हैं, ‘रामो राजमणि सदा विजयते, रामं रमेशं भजे, रामेणांभियता निशाचरचमु रामाय तस्मयनम:’ आज इन पंक्तियों का मतितार्थ हमें सही मायने में समझ आ रहा है। जिस प्रकार रावण जैसी दुष्ट प्रवृत्ति पर विजय प्राप्त कर भगवान श्रीराम अयोध्या वापस लौटे थे, उसी प्रकार आज भी समाज की दुष्ट प्रवृत्तियों का अंत कर प्रभु श्रीराम फिर एक बार अयोध्या लौट रहे हैं।

मंदिर वहीं बनेगा, मंदिर भव्य बनेगा। यही सही मायने में प्रभु श्रीराम को दी गई आदरांजलि साबित होगी।

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