राम मंदिर विश्व-बंधुत्व और मानवता के लिए वरदान

अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर के शिलान्यास के अवसर पर प्रसिद्ध साध्वी ॠतंभरा से ‘हिंदी विवेक’ ने विस्तृत बातचीत की। साध्वीजी ने श्री राम के जीवन मूल्यों, जन जन की आस्था, वैश्विक परिवार भाव आदि भारतीय संस्कृति के मूल मूल्यों पर समेत नई शिक्षा नीति पर भी अपने विचार प्रकट किए। प्रस्तुत है इसी के महत्वपूर्ण अंशः

राम मंदिर का भूमिपूजन आगामी 5 अगस्त को होने वाला है, क्या यह आत्मनिर्भर भारत के प्रारंभ का संकेत है?

5 अगस्त को भारत के खंडित स्वाभिमान की अखंड प्रतिष्ठा होने जा रही है। जो समाज आत्महीनता का शिकार होता है उसके होने का कोई अर्थ नहीं होता। भारत का यह अक्षुण्ण सत्य है कि हमने शारीरिक गुलामी झेली, परंतु हमने अपने मन-मस्तिष्क, अपनी चेतना और भावनाओं को कभी गुलाम नहीं होने दिया। भारत की यही सनातन संजीवनी प्रभा है कि यहां मुगल आए, तुर्क आए, हूण आए, अरबों ने हमारा मान मर्दन किया, लेकिन हमने कभी देह के सत्य को सत्य नहीं माना। अत: हमारी चेतनाएं कभी गुलाम नहीं हुईं। भारत ने बहुत लम्बे काल तक गुलामी झेली; परंतु अपनी चित्त चेतना को गुलाम नहीं होने दिया।

देह की रोजी रोटी के लिए तो हर कोई प्रयत्न करता है। परिश्रम का पसीना बहाएंगे तभी रोटी मिलेगी। भारत ने कभी भी पश्चिम के तौरतरीकों से काम नहीं किया था। परंतु जब से करना शुरू किया हमें आत्मग्लानि भी हुई, हम आत्महीन हुए, दूसरों के ऊपर निर्भर भी हुए और दूसरों के समाधान के साधनों को ही अपने समाधान के साधन मानने लगे। अत: 5 अगस्त को केवल मंदिर निर्माण का कार्य ही नहीं होने जा रहा बल्कि मंदिर निर्माण के माध्यम से आत्मनिर्भर भारत की ओर चरण भी उठने जा रहा है। हमारे पास न केवल अपने बल्कि सारी मनुष्य जाति की समस्याओं के समाधान हैं। हम यह जानते हैं कि जो भी इस संसार में शरीर धारण किए हुए हैं उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति कैसे हो सकती है। मन की अगाध ज्ञान की आकांक्षा कैसे पूरी हो सकती है यह भारत ही दुनिया को बता सकता था, परंतु भारत ही दिग्भ्रमित हो गया। जीवन के प्रत्येक मोड़ पर मैं दुनिया से पूछ रही हूं कि हम दुनिया को बदल रहे हैं या दुनिया हमें बदल रही है? हम यह सोचते हैं कि पश्चिम के तौरतरीके हमारा कल्याण कर देंगे। हमारा हाल कुछ ऐसा है कि दो लोगों के पास बकरियां थीं। एक ने दूसरे से पूछा मेरी बकरी बीमार है। जब तेरी बीमार थी तो तूने क्या किया था। दूसरे ने जवाब दिया मैंने उसे मिट्टी का तेल पिला दिया। पूछने वाले ने भी अपनी बकरी को मिट्टी का तेल पिला दिया। बकरी मर गई। वो दूसरे आदमी पास जाकर बोला मिट्टी का तेल पिलाने से तो मेरी बकरी मर गई। सलाह देने वाला आदमी बोला मेरी भी तो मर ही गई थी, पर तूने आगे पूछा ही नहीं। हम भी इसी तरह उन लोगों से अपनी समस्या का समाधान पूछ रहे हैं जिनकी अपनी बकरियां मरी हुई हैं। इससे बढ़कर आत्महीनता और क्या हो सकती है? यूरोप ने येनकेन प्रकारेण लूट खसोट करके दुनिया का धन इकट्ठा किया और कहा कि हम सफल हो गए हैं। अब उनकी देखो सफलता कि मुंह बाए खड़ी है मनुष्यता, समझ कुछ आ ही नहीं रहा है। भारत ने यह विचार कभी नहीं किया। हमारा तो विचार यह था कि त्याग की इच्छा असीम है परंतु देह की इच्छाएं सीमित हैं। हमें तन ढंकने के लिए कपड़ा चाहिए और खाने के लिए दो रोटी चाहिए। बाकी तो सब नाटक है। दूसरों को दिखाने के लिए किया जाने वाला दिखावा है। इस प्रदर्शन में लगी हुई मानवता ने सबका जीवन हराम कर रखा है। पशु-पक्षी, जड़-जंगम सब को अपनी पेट की कब्र में पहुंचा दिया। यह तो सन्मार्ग हो ही नहीं सकता। अत: आत्मनिर्भर बनने की दूसरों को मार्गदर्शन करने वाले भारत की प्रतीक्षा बैठकर नहीं की जा सकती। उसके लिए तप और त्याग करने होंगे। सबको समाधान देने की कोशिश करनी होगी। इस दृष्टि से भारत सारे विश्व का गुरू है। भारत के पास अमृत है। हमें अमृत पान भी करना है। उसकी रक्षा भी करनी है और जिनको उसकी जरूरत है, उन्हें बांटना भी है।
काया और माया के लिए आत्मनिर्भर होना तो बहुत सतही चिंतन है। भारत का तो जन्म ही सारे विश्व की समस्या के समाधान के लिए हुआ है। इन्हीं आध्यात्मिक गहराइयों को और चरित्र की ऊंचाइयों को प्राप्त करने का प्रारंभ 5 अगस्त को मंदिर निर्माण के शुभारंभ से होगा।

अपने जीवन मूल्यों के कारण राम नर से नारायण बन गए। प्रभु रामचंद्र जी के आर्दश जीवन मूल्यों की विशेषता बताइए?

जब कोई अवतारी सत्ता मनुष्य का रूप धारण करके आती है तो वह यही बताती है कि मनुष्य को कैसे जीना चाहिए। प्रभु श्री रामचंद्र ने भी इसी मार्ग को प्रशस्त किया था। सम्बंध हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं और सम्बंधों का सम्बोधन मनुष्य को प्राणवंत बना देता है। अपने लिए नहीं अपनों के लिए जीना। पिता की छोटी सी इच्छा के लिए चौदह वर्ष तक जंगल को अपना राज समझकर प्रसन्नता से रहना वह भी ऐसे समय जब उनके राज तिलक की तैयारियां हो रही हों। इतने बड़े त्याग का, आदर्श का चर्मोत्कर्ष प्रभु श्री रामचंद्र के अलावा और कहीं दिखाई नहीं देता। राजसत्ता में पले बढ़े युवक बहुत आत्ममुग्ध, आत्मकेंद्रित होते हैं। लेकिन जब राम अयोध्या से बाहर निकले तो उन्होंने वनवासियों को, भीलों को, निषादों को, केवटों को, शबरियों को इतना प्रेम दिया कि आज भी केवट जाति कहती है कि हम रामसखा हैं।

दूसरी बात हमें जो प्रभु राम ने बताई कि राजनीति और राजसत्ता की ताकत बड़ी नहीं होती। मनुष्य का सत्संकल्प और उसका जनसंग्रह बहुत ब ्री कीमत रखता है। इसलिए रथ पर चढ़ा रावण भी प्रभु राम के सामने बौना है। राम सत्य के रथ पर आरूढ़ हैं। उन्होंने मनुष्य को यह बता दिया कि सत्ता की ताकत, ताकत नहीं होती, सत्संकल्प की ताकत सबसे बड़ी होती है। सत्य के पक्ष में अगर आप नि:शस्त्र भी खड़े हैं तो सारा संसार आपके सहयोग में तत्पर हो जाएगा। पर अपाका संकल्प सत्संकल्प होना आवश्यक है। राम लंका गए परंतु उनकी दृष्टि स्वर्णमयी लंका पर नहीं थी। लक्ष्मण ने कहा भैया देखो लंका कैसे चमक रही है, तब श्री राम ने कहा हां सुंदर तो है परंतु मेरी जन्मभूमि से अधिक सुंदर नहीं है। राजनीति सीखनी हो तो प्रभु राम से सीखिए कि जब बिभीषण सागर पर कर प्रभु राम की शरण में पहुंचे तो राम ने सागर के जल से उनका तिलक, अभिषेक किया और उन्हें आश्वस्त किया कि लंकापति आप ही होंगे। प्रभु राम ने भारत की स्त्री की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी थी। उनकी नीति अपने राज्य के विस्तार की नहीं थी। आज जबकि दुनिया इंच-इंच जमीन के लिए लड़ रही है, भारत का आदर्श यही रहा है। अत: राम हमारे मन में, मति में, गति में, शक्ति में, बुद्धि में सभी जगह राम हैं।

हिंदू हित की बात करेगा वहीं देश पर राज करेगा़़, हिंदू जगे तो विश्व जगेगा, भारत का विश्वास जगेगा, राम जन्मभूमि आंदोलन का यह प्रमुख गीत एंव नारा था। आज लगभग 30 वषों बाद इस प्रमुख गीत और नारों को आप किस रूप में देखती है?

हिंदू जगेगा विश्व जगेगा
मानव का इतिहास जगेगा…

इस गीत के पीछे एक दर्शन है। सारा विश्व भौतिकता की मार खाकर, थपेड़े खाकर बिखरा हुआ है। हमारा देश भी उसी दौड़ में दौड़ने लगा है। इसका परिणाम हम सभी देख रहे हैं। कितनी छोटी उम्र में हमारे बच्चे-युवा आत्महत्या कर रहे हैं। आत्महत्या क्यों करनी पड़ रही है? जब आप दौलत को, किसी रूपसी को अपने जीवन का सर्वस्व मान लेते हो तब आपको भरी जवानी में मौत को लगे लगाना पड़ जाता है। हमारा यह आदर्श नहीं है। अपनी जवानी को सत्संग से सत्कार्य में लगाना यह हिंदू भाव है। मातृभूमि की सेवा में अर्पित कर देना यह हिंदू भाव है। तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित, चाहता हूं देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूं। हिंदू सर्वे भवंतु सुखिन: की भावना से ओतप्रोत होता है। वह जब हिंदुत्व में रमण करता है तो उसकी पहली रोटी गौमाता की होती है और आखरी रोटी कुत्ते, पशुपक्षियों की होती है। जब वह सैर करने निकलता है तो वह टूटे चावल और शक्कर लेकर निकला है जिससे चींटियों की भोजन की व्यवस्था हो सके। तेज गर्मी में हिंदुओं का मन व्याकुल हो जाता है तो वे अपने घरों की छतों पर पानी भरकर रख देते हैं कि पंछियों की प्यास उससे बुझ सके। यही वह हिंदू भाव है जो हमें मनुष्य बनाता है। और आज सारे संसार को इसी मनुष्यता की जरूरत है। वरना देखिए चीन ने कैसे दुनिया को मौत बांट दी है। अत: विश्व को जगाने की जिम्मेदारी हमारी है। परंतु पहले हमें स्वयं जागना होगा। हमें अपनी संस्कृति की महिमा को समझना है। उसे केवल कहना सुनना नहीं है। उसे जीवन में उतारना है। आज देश का नेतृत्व ऐसे हाथों में है। जो लोकमानस को, लोकभावना को और भारत होने का अर्थ क्या है यह समझते हैं। यह बहुत शुभ लक्षण हैं। अब सभी का कल्याण ही होगा। हमारे जीवन का लक्ष्य ही है धर्म की जय हो, विश्व का कल्याण हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो।
हिन्दू तत्वज्ञान कहता है कि ईश्वर चराचर में विद्यमान है। फिर भगवान को पूजने के लिए मंदिर बनाना क्यों जरूरी है?
यह सच है कि ईश्वरीय सत्ता सर्वत्र व्याप्त है और वह व्यापक है, निराकार है, ब्रह्म स्वरूप है। वैश्विक सत्ता ब्रह्माण्ड नायक को हम श्री विग्रह में स्थापित कर उसमें प्राण प्रतिष्ठित करके अपने आराध्य का दर्शन करते हैं। हमारे लिए मंदिर केवल ईमारत नहीं है। आपने देखा होगा कि ईसाइयों के चर्च बेचे और ख़रीदे जाते हैं। अरब देशों में बनी मस्जिदों को तोड़ा या स्थलांतरित किया जाता है। पर मंदिर जहां पर होता है वह सनातनी होता है। मंदिर जहां स्थापित होता है उसे हम श्री विग्रह मानते हैं। इसलिए निराकार परमात्मा को हम प्रतिमा के रूप में पूजते हैं। शिव लिंग के सामने हम श्रध्दाभाव से पूजा करते हैं और यह प्रार्थना करते हैं कि-

नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्॥
निराकार मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकाल कालं कृपालुं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम्॥

तो एक मूर्ति के समक्ष खड़े होकर एक अमूर्त का चिंतन करते हैं। यह हमारे सनातन की विधा है। इसलिए मंदिर हमारे लिए भगवान का श्री विग्रह है। मंदिर में प्राण प्रतिष्ठित होकर हमारे लिए जिवंत परमात्म सत्ता बनती है। यही हमारे शास्त्रों की आज्ञा है और यही हमारा भाव साम्राज्य है।

श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन को इस पावन समय में आप किस तरह स्मरण करती हैं?

साधना न कभी व्यर्थ जाती, चल कर ही मंजिल मिल पाती। हम लोग मंजिल पर पहुंच गए हैं। और मंजिल पाने के बाद कितना परमानंद मिलता है और ये तो 500 सालों के संघर्ष की परणीती है, जो हमें प्रभु के मंजिल के रूप में मिली है। इसलिए बहुत ही अवर्चनीय आनंद की अनुभूति हो रही है, जिसे मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाऊंगी।

श्री राम जन्मभूमि आंदोलन में अपने प्राणों का बलिदान देने वाले कोठारी बंधु और सरयू के तट पर हुतात्मा हुए कार सेवकों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया है। उनके पवित्र बलिदान की नींव पर अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर बनने जा रहा है। इस पर आप क्या कहना चाहेंगी?

कोठारी बंधु सहित अन्य सभी हुतात्माओं के चरणों में श्रद्धांजलि मैं अर्पित करती हूं। उनकी माताओं की कोख का मैं वंदन करती हूं। उनके परिवारजनों को स्मरण करती हूं। अनेकों कार सेवकों ने सरयू के पानी को अपने रक्तों से अभिसिक्त किया था। उन सब की जवानी, तरुणाई और बलिदान को मैं बारम्बार प्रणाम करती हूं। मंदिर में जो शिलाएं (स्तंभ) लगने जा रही हैं वे केवल शिलाएं नहीं हैं अपितु वे देश के नौजवानों के प्राण हैं। उनकी जवानियां हैं। उनके रक्त से सिंचित है. इसलिए वन्दनीय है वह जवानियां जो राम के काम आ गईं। हम तो हमेशा कहते हैं कि काया की माया तो मरती है लेकिन जो राम के लिए समर्पित हो जाता है वह अमर हो जाता है। ऐसे हुतात्मा अमर बलिदानियों का स्मरण करके आज अयोध्या सहित सारा विश्व धन्य हो गया है। वह सभी हुतात्मा हमारे एवं देश के स्मृतियों और यादों में सदैव चिरंजीव रहेंगे।

जन-जन के ह्रदय में राम भाव का जागरण होना चाहिए। श्री राम मंदिर के नवनिर्माण के साथ क्या राष्ट्र जागरण का भी शुभ अवसर आ गया है?

जी हा, यह शुभ अवसर आ गया है। यह अवसर है घर – घर तक राम के आदर्शों को पहुंचाने का, भौतिकता को साधन समझने का और राम को साध्य समझने का। यह अवसर है नश्वर के लिए व्याकुल ना हो, सनातन के लिए समर्पित होने का। यह अवसर है राममय होने का, यह अवसर है हमारी संतों को ध्रुव और प्रह्लाद की तरह संस्कारों से सिंचित करने का। यह निश्चित करने का अवसर है कि भारतीयों के बच्चे तुलसी के पौधे हैं, जिन्हें वासनाओं और शराबों से नहीं बल्कि संस्कारों के गंगाजल से सींचा जाना चाहिए। यह अवसर है ऊंच नीच, जात पात, आदि सभी तरह के भेदभाव को खत्म करने का। यह अवसर है सभी भारतीयों के चेहरे पर मुस्कान लाने का। यह अवसर है राष्ट्र विरोधी लोगों के दमन करने का और यह अवसर है राष्ट्रवादी शक्तियों को दृढ़ता से मजबूत करने का। इस अवसर का सदुपयोग करना चाहिए, ऐसा मुझे लगता है। इसी से जन जन में रामभाव का जागरण भी होगा और इसके साथ ही राष्ट्र जागरण भी हो जाएगा।

भारत में नई शिक्षा नीति लागू हो गई है। इसे आप किस दृष्टिकोण से देखती हैं?

मुझे बहुत आनंद है कि शिक्षा में सुधार एवं आवश्यक बदलाव किया गया है। मुझे लगता है कि जो नई शिक्षा नीति लागू की गई है उससे युवाओं को स्वावलंबी बनने में मदद मिलेगी। देश आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेगा। परिवर्तन की बेला आरंभ हो गई है। सूर्य उदयमान है। नई शिक्षा भारत के संतानों के ह्रदय को सिंचित करेगी। छोटे-छोटे बच्चों को जब उनके की मातृभाषा में शिक्षा दी जाएगी तो उनके जीवन की बुनियाद मजबूत बनेगी। शिक्षा के पुरोधा जिनके हाथों में शिक्षा की जिम्मेदारी है वह देशभक्त है, वह राष्ट्र के हित को ही सर्वोपरि मानेंगे। भारत का हित इसी में है कि भारत की संतानें राष्ट्रभक्त बनें, निष्ठावान बनें, सज्जन बनें, माता पिता एवं गुरुजनों की आज्ञा का पालन करें। चिंताओं से छात्र मुक्त बने और नशे से दूर रहें। हमारी शिक्षा संस्कार ऐसी होनी चाहिए कि हमारे शिशु सिंहों से खेलें और नौजवान सृजन करें। हमारे बुजुर्ग जगत में वंदनीय बनें। मुझे विश्वास है कि ऐसे ही शिक्षा का शुभारंभ होने जा रहा है। इसका मुझे सुखद अहसास हो रहा है।

शरद पवार ने कहा था कि क्या राम मंदिर भूमिपूजन से कोरोना भाग जाएगा? इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

मुझे समझ में नहीं आता कि ऐसे व्यक्ति पर मैं क्या टिप्पणी करूं। मुझे उनके बारे में कुछ भी नहीं कहना जो नासमझ हैं। लेकिन यह बात तो तय है कि राम मंदिर हमारे आस्थाओं को मूर्त रूप दे रहा है। हमारे स्वाभिमान को प्रतिष्ठा दे रहा है। रामचंद्र जी का आदर्श जीवन हमें संयम सिखाएगा और जब हम सयंमित रहेंगे तो कोरोना से भी बचे रहेंगे।

राम मंदिर राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतिक बने, इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?

मुझे लगता है कि 500 वर्षों का इतिहास वहां पर लिखा जाना चाहिए। राम जी के जीवन आदर्शो और कार सेवको की वहां पर झांकी बननी चाहिए। राम मंदिर पूरी दुनिया के लिए प्रेरणास्रोत बनें और संस्कारित करें। उस द़ृष्टि से काम करना चाहिए। न्यास इस दिशा में बेहतरीन काम कर रहा है।

श्रीराम मंदिर क्या विश्व के लिए वरदान साबित होगा? राम मंदिर के माध्यम से भारतीय संस्कृति को देखकर क्या विश्व बंधुत्व की भावना सभी में जागेगी?

जी बिलकुल, राम मंदिर से पूरे विश्व को संस्कार और मार्गदर्शन मिलेगा। जिसके आधार पर वह अपना बेहतर विकास कर पाएंगे। राम मंदिर दुनिया के आकर्षण का केंद्र बनेगा और पूरी दुनिया इसे देखने के लिए अयोध्या आएगी। तब उन्हें भारतीय संस्कृति को नजदीक से देखने और समझने का मौका मिलेगा। जब उन्हें यह पता चलेगा कि यहां की संस्कृति किसी को पराया नहीं मानती, सभी से समान प्रेम करती है तो वह भी इससे प्रभावित होंगे और उन्हें भी भारत से प्यार हो जाएगा। उन्हें यह पता चलेगा कि भारतवासी सबको अपना मानते हैं। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना भारत में कूट कूट कर भरी हुई है। भारतीय सदैव सभी के आंसू पोंछने के लिए तत्पर रहते हैं। ऐसे उदार एवं विराट ह्रदय वाले भारतीयों के नजदीक जो भी आएगा वह भारतीयों का सदा के लिए हो जाएगा। मुझे विश्वास है कि राम मंदिर विश्व बंधुत्व और मानवता के लिए वरदान साबित होगा।

भारतीयों के मन में सदियों से रामराज्य की संकल्पना बसी हुई है। भारत में रामराज्य का सपना कब पूरा होगा? क्या हम रामराज्य की ओर जा रहे है?

प्रत्येक व्यक्ति को राम बनना होगा। दूसरों को उपदेश देने का सिलसिला बंद करना होगा। धर्म ग्रंथों के आदेश का पालन करना होगा। कहने और सुनने से रामराज्य नहीं आएगा। राम के जीवन मूल्यों को अपने जीवन में उतारना होगा। इसलिए रामराज्य की स्थापना करने के लिए सभी भारतीयों संकल्पवान बन जाओ। जीवन एक अवसर है श्रेष्ठ बनने का, श्रेष्ठ करने का, श्रेष्ठ पाने का। जब हम श्रेष्ठ बनेंगे तो हमारा कर्म भी श्रेष्ठ होगा और उसके फल भी श्रेष्ठ होंगे। यही है रामराज्य को दृढ़ रूप से स्थापित करने का मार्ग।

भारतीय परिवार व्यवस्था टूट रही है, हमारे जीवन में परिवार का क्या महत्व है? इसके अलावा क्या रामजी के आदर्शों पर चलकर विश्व की किसी भी चुनौती का सामना किया जा सकता है?

परिवार में फूट तब पड़ती है तब मैंने क्या पाया इसका चिंतन नहीं होता और मैंने क्या दिया इसका चिंतन होता है। जब हम अपने अधिकारों की लालसा लेकर बैठ जाते हैं तब कुटुंब टूट जाते हैं। जहां पर अधिकार की नहीं बल्कि कर्तव्य की भावना होती है वह घर कभी नहीं टूटते। गुलामी के दौर में भी हम इसलिए बचे रहे क्योंकि हमारे पास कुटुंब जैसी संस्था थी। परिवार के रिश्तों को मजबूत बनाए रखने के लिए प्रभु रामचंद्र जी के आदर्श जीवन को छोड़कर अन्य दूसरा कोई आदर्श हमारे पास नहीं है। यदि हमें विश्व की कोई शक्ति चुनौती दें तो उस चुनौती को साहस पूर्वक स्वीकार करना चाहिए, यह भी हमें प्रभु राम जी से सीखने को मिलता है। इसलिए यदि त्यागने का अवसर आए तो सब त्याग दो लेकिन कंधे पर तीर धनुष रहना चाहिए। तेजस्वी ओजस्वी रहोगे तो संसार का मार्गदर्शन कर पाओगे और दुनिया के किसी भी चुनौती का सहजता से सामना कर पाओगे। राम जी ने अपने शौर्य पराक्रम से विश्व विजेता रावण का अंत किया था। उसी तरह भारत भी राम जी के बताए गए पदचिह्नों पर चलकर और अपने शौर्य पराक्रम को जगाकर किसी भी चुनौती का सामना कर सकता है।

‘हिंदी विवेक’ के पाठकों को आप क्या संदेश देना चाहती हैं?

मैं ‘हिंदी विवेक’ के ज्ञानवान पाठकों को बहुत बहुत शुभकामनाएं देती हूं। अपनी भाषा, अपनी वेशभूषा, अपना चिंतन, अपना विचार, अपना भाव साम्राज्य, इसको समृद्ध कीजिए और इसी तरह ‘हिंदी विवेक’ पढ़कर विवेकवान बनिए। राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण सहित रक्षाबंधन की सभी भारतीयों को हार्दिक मंगलमय शुभकामनाएं देती हूं।
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