बारिश में ही-मैन और काका


भले धर्मेंद्र की पहचान एक ही-मैन के रूप में रही हो और राजेश खन्ना रूमानी सितारे माने जाते हों, बरसात में भीगे गीतों के मामले में तो ही-मैन ने ही बाजी मारी है।

श्वेत श्याम सिनेमा से जब हम रंगीन सिनेमा की ओर कूच करते हुए उस दौर के बरसात में भीगे गीत देखते हैं तो हमारे सामने यकायक विपरीत शख्सियत वाले दो नायकों के चेहरे झिलमिलाने लगते हैं। इनमें एक तो सौम्य, शालीन, किन्तु पुरुषार्थ से भरपूर व्यक्तित्व के स्वामी धर्मेंद्र और दूसरे अपने दौर के युवक-युवतियों के चहेते राजेश खन्ना। हालांकि दोनों की फिल्मों का मिज़ाज अलहदा ही रहा, लेकिन दोनों की ही फिल्मों के गीत जन-जन की जुबां पर चढ़ते रहे और पीढ़ियां उन्हें गुनगुनाती रहीं। यह भी एक दिलचस्प संयोग है कि राजेश खन्ना और धर्मेंद्र पर बारिश में भीगे अधिकांश लोकप्रिय गीत आनंद बक्षी की कलम से ही निकले हैं।

धर्मेंद्र में दूसरे नायकों की तरह न तो रोमांटिक भूमिकाओं को पूरी संवेदनशीलता के साथ पेश करने का हुनर था, न ही गीत-संगीत पर झूमने के लिए पर्याप्त सेंस ऑफ रिद्म। लेकिन अच्छे व्यक्तित्व, मोहक मुस्कान, आंखों से टपकती शराफत और संवाद अदायगी के ठेठ देसी अंदाज़ ने उन्हें जल्द ही लोक-लाड़ला बना दिया और एक बार दर्शकों ने उन्हें दिल दे दिया, तब उनके नृत्य में लाख कमजोरियां होने के बावजूद उन पर फिल्माए गीत बारंबार सुने जाने लगे। ऐसा ही एक लोकप्रिय गीत ‘आया सावन झूम के’ में था, जिसमें धर्मेंद्र की मस्ती, आशा पारेख की नृत्य क्षमता, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का अभूतपूर्व संगीत, रफी-लता की प्रेम रस में दुबई आवाज़ें और तूफ़ानी ऑर्केस्ट्रा के समन्वय ने प्रेक्षकों पर जादू कर दिया था:

बदरा हाये
बदरा छाए कि झूले पड़ गए हाय
कि मेले लग गये मच गई धूम रे
कि आया सावन
हो झूम के, आया सावन झूम के

इस मुखड़े के बाद कम से कम एक मिनट का संगीत का अद्भुत पीस बजता है, जिसमें सौ वादकों के साथ कोरस की लहराती आवाज श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती है:

जाने किसको किसकी
याद आई के चली पुरवाई

और इसके बाद कई बांसुरियों के साथ दो-दो सेकेंड के तीन टुकड़े बजते हैं और फिर यह पंक्तियां आती हैं:

जाने किस बिरहन का                                                                 
मन तरसा के पानी बरसा

फिर प्रसन्नचित्त कोरस अपनी नन्ही सी प्रस्तुति देते हैं:

हो ओ ओ ओ                                                                                
कंगना हाये
कंगना लाये कि घर लौट के आये
रे परदेसी विदेशवा से घूम के
कि आया सावन
हो झूम के, आया सावन झूम के

प्रेम की गहनता, उदात्तता, आशा, आकांक्षा, अपेक्षा, बिछोह, खुशी, दर्द, साहचर्य और एकाकीपन के बहुविध रंगों के साथ बारिश को याद करने वाला एक और मार्मिक गीत भी हमें याद आता है। ‘जीवन मृत्यु’ में राखी और धर्मेंद्र की गरिमामायी जोड़ी इस गीत के माध्यम से हमें एक अलग ही दुनिया में ले जाती है:

झिलमिल सितारों का आंगन होगा
रिमझिम बरसता सावन होगा
ऐसा सुंदर सपना अपना जीवन होगा

नायक-नायिका में अपने घर को बनाने, उसमें सुखमय जीवन जीने की कोमल सी हसरतें हैं, जिन्हें वे यूं अभिव्यक्त करते हैं:

प्रेम की गली में एक
छोटा सा घर बनाएंगे
कलियां ना मिले ना सही
कांटों से सजाएंगे
बगियां से सुंदर वो बन होगा
रिमझिम बरसता सावन होगा

गीत का दूसरा अंतरा नायिका के नायक के समक्ष आत्मीय समर्पण का निहायत ही सादगीमय अंदाज है, जिसमें वह अपने अंतस को यूं खोलती है:

तेरी आंखों से सारा                                                 
संसार मैं देखूंगी
देखूंगी इस पार या
उस पार मैं देखूंगी
नैनों को तेरा ही दर्शन होगा
रिमझिम बरसता सावन होगा

धर्मेंद्र की तुलना में राजेश खन्ना की सफल नायक के रूप में पारी संक्षिप्त थी। लेकिन उनका समय अद्भुत था। वर्ष 1969 से 1972 तक के ढाई साल के समय में एक ऐसा दौर आया था, जब फिज़ाओं में राजेश खन्ना ही राजेश खन्ना की गूंज थी। ‘आराधना’ (सितंबर 1969) से ‘दुश्मन’ (मार्च 1972) तक के कालखंड में काका ने ‘दो रास्ते’, ‘बंधन’, ‘डोली’, ‘सच्चा झूठा’, ‘कटी पतंग’, ‘आन मिलो सजना’, ‘सफ़र’, ‘आनंद’, ‘द ट्रेन’, ‘हाथी मेरे साथी’, ‘दुश्मन’, ‘मर्यादा’, ‘अंदाज़’ और ‘अमर प्रेम’ जैसी एक के बाद 16 हिट फिल्में दीं। राजेश की इस सफलता में एक बहुत बड़ा योगदान उन पर फिल्माए गीतों का भी था। गीतों के चयन, धुन और रेकॉर्डिंग में वे पूरी दखल रखते थे। आनंद बक्षी उनके पसंदीदा गीतकार थे और उनके लिए अधिकांश फिल्मों में उन्होंने हिट गीत लिखे। चूंकि काका रोमांटिक नायक थे, इसलिए रोमांस की मुख्य धारा का मौसम ‘बरसात’ भी उनके करियर में बार-बार आया और इस मौसम में उन्होंने कई झूमते इठलाते गीत पेश किए। काका और बरसात के साझे-सफर का पहला पड़ाव ‘दो रास्ते’ का ‘छुप गए सारे नज़ारे’ गीत था। इसके बाद ‘रोटी’ आई, जिसमें एक बार फिर आनंद बक्षी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, किशोर कुमार, लता मंगेशकर, राजेश खन्ना और मुमताज़ का ‘सप्त मंडल’ संगीत रसिकों से ‘गोरे रंग पे ना इतना गुमान कर’ गीत के जरिए मुखातिब हुआ। ‘अजनबी’ में ‘भीगी भीगी रातों में’ गाना भी खूब चला, लेकिन बाजी मारी ‘प्रेम नगर’ के गीत ‘ठंडी हवाओं ने’ ने। यह तो हम सभी जानते हैं कि राजेश खन्ना के पसंदीदा संगीतकार सचिन देव बर्मन और आर. डी. बर्मन थे। होते भी क्यों नहीं? आखिर इन्होंने ही तो ‘आराधना’ से काका का करियर संवारा था। ‘प्रेम नगर’ में सचिन दा गीत की शुरुआत पूर्वी भारत के लोक से जुड़ी इन पंक्तियों से करवाते हैं:

हुर्रे हो, हुर्रे हो
डमवा बारू रे हे आयो रे
हुर्रे हो, हुर्रे हो

उसके बाद आदमक़द नगाड़ों की ज़बरदस्त आवाज़ होती है और किशोर-आशा गाते हैं:

हे ठंडी हवाओं ने गोरी का घूंघट उठा दिया
हे काली घटाओं ने साजन को नटखट बना दिया

मुख्य गायकों की इन आवाजों के अनुपूरक में कोरस का समवेत गूंजता है, जिसकी किशोर-आशा संगत करते हैं:

डगर डगर मगर मगर पनघट बना दिया
गोरी का घूँघट उठा दिया
हे ठंडी हवाओं ने गोरी का घूंघट उठा दिया

बहुत सारे नृत्य कलाकारों से सुसज्ज गीत बनाने में बर्मन दा हमेशा आगे रहे हैं। ‘ज्वेल थीफ’ के ‘होठों पे ऐसी बात’ और ‘तलाश’ में ‘आज तो जुनली रात मां’ की भव्य प्रस्तुति के हम सभी साक्षी रहे हैं। यहां भी वे बहुत बड़े ऑर्केस्ट्रा के साथ मौसम को निचोड़ कर रख देते हैं:

रिमझिम फुहार रिमझिम फुहार                                       
रिमझिम फुहार पड़े रिमझिम फुहार
तेरी नज़र सब पे तुझे सबकी खबर
पर ये पता है के नहीं
मैंने जो सावन से कहा
चुपके से वो तूने सुना है के नहीं
सावन से सावन से
सावन से पहले मन ने बता दिया
साजन को नटखट बना दिया

कहना न होगा, भले धर्मेंद्र की पहचान एक ही-मैन के रूप में रही हो और राजेश खन्ना रूमानी सितारे माने जाते हों, बरसात में भीगे गीतों के मामले में तो ही-मैन ने ही बाजी मारी है।

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