भूपेन हजारिका: ब्रम्हपुत्र कि सूर- संस्कृती


किसी भी क्षेत्र में लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचना आसान नहीं होता। भारतीय संगीत में डॉ. भूपेन हजारिका ने भी यह साबित कर दिया था कि उनकी गायकी किसी बड़े गायक से कम नहीं थी। गीत-संगीत की दुनिया का यह सितारा अनमोल था। असम की माटी में जन्म लेकर वहां की कला संस्कृति को अपने अनोखे अंदाज में प्रस्तुत करके हजारिका ने संगीत प्रेमियों के मन में वह स्थान बनाया, जो देश के कई नामी-गिरामी गायकों तथा संगीतकारों ने बनाया। भारतीय फिल्म के पितामह दादा साहेब फालके पुरस्कार विजेता डॉ. हजारिका ने संगीत के जरिए आसाम राज्य का जैसा दर्शन कराया, वैसा प्रयास बिरले ही कर पाते हैं।

भारतीय फिल्म संगीत में अपनी अलग पहचान बनाने वाले असमिया माटी के सपूत भूपेन हजारिका की गायकी का रंग भले ही अल्हदा हो, पर उन्होंने जो गाया, उसकी जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। 8 सितंबर, 1926 को असम के साडिया गांव में जन्मे डॉ. भूपेन हजारिका का विगत 5 नवंबर को मुंबई के अंधेरी उपनगर के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। अपने चार दशकीय संगीत जीवन में डॉ. हजारिका के स्वर से सजे गीत उनके संगीत विश्व का बखान करते हैं। उनकी लंबी संगीत यात्रा का हर पड़ाव उन्हें प्रगति के सोपान पर ले जाता रहा है। भारतीय संगीत विश्व के लिए यह साल दु:खदायी ही रहा। दीप पर्व से पहले गज़ल सम्राट जगजीत सिंह तथा दीप पर्व बाद डॉ. भूपेद्र हजारिका का निधन संगीत प्रेमी को दु:खी कर गया। जगजीत सिंह से बिल्कुल अलग धारा के गायक हजारिका ने 1942 तक गुवाहाटी में शिक्षार्जन किया।

असम की माटी के इस कलाकार ने उत्तर प्रदेश की सरजमीं पर उच्च शिक्षा अर्जित की। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1944 में स्नातक की उपाधि अर्जित की। 1946 में राजनीति शास्त्र से स्नातकोत्तर की शिक्षा पूरी करने के बाद हजारिका ने अपना अध्ययन जारी रखा और अमेरिका में पांच वर्ष रहकर कोलंबिया विश्वविद्यालय से उन्होंने जनसंचार माध्यम में डॉक्टरेट की उपाधि अर्जित की। भारतीय फिल्मों तथा संगीत के प्रति रूझान रखने वाले डॉ. भूपेन हजारिका ने 1939 में इंद्रमालती फिल्म में बतौर बाल कलाकार अपने अभिनय का जौहर दिखाया। बाल कलाकार रहते समय ही संगीत के प्रति उनमें रूचि पैदा हुई। दस वर्ष की छोटी सी उम्र में पहली बार असमी भाषा में गीत लिखा और उसे अपना स्वर दिया और यही से शुरू हुआ हजारिका संगीत का सफर जो उनकी आयु के 85 वर्ष तक चलता रहा। 1960 से 1988 की कालावधि तक असमी फिल्मों को संगीत देने वाले हजारिका ने हिन्दी फिल्म संगीत में भी अहम योगदान दिया। 1986 में कल्पना लाजमी के ‘एक पल’ से लेकर ‘रुदाली’ तक के फिल्मी सफर में हजारिका का योगदान अहम रहा। 1996 में लेख टंडन की ‘मिल गई मंजिल मुझे’ और सई परांजपे की ‘साज’ इन दो फिल्मों में संगीत देकर हजारिका ने यह साबित कर दिया कि वे सिर्फ असमी ही नहीं, हिन्दी फिल्मों में भी संगीत देने की महारथ रखते हैं।

एम. एस. हुसैन की ‘गजगामिनी’ में संगीत देने वाले डॉ हजारिका ने अपने गृहराज्य असम के साथ-साथ पूर्व भारतीय संगीत क्षेत्र में अहम योगदान दिया।

हंसमुख चेहरे के इस उम्दा कलाकार का व्यक्तित्व बहुत ही मिलनसार था। सच तो यह है कि भूपेन दा को सिर्फ एक कलाकार या फिल्मकार के रूप में आंकना गलत है, वे हिन्दी गानों को असमी पृष्ठभूमि का जो दमखम रखते थे, कि हिन्दी क्षेत्र की जनता भी उनके संगीत कौशल्य को दाद देती थी। असम से वाराणसी और उसके बाद देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में अपनी संगीत सेवा को जारी रखा। देश के सर्वोच्च सम्मानों में से एक पद्मविभूषण से उन्हें अलंकृत किया गया। वे सदा सादगीभरा जीवन पसंद करते थे। उनका कहना था कि सादगी तथा संगीत ही मेरी पहचान है। इस पहचान को उन्होंने ताउम्र बरकरार रखा।

उच्च शिक्षित इस उम्दा कलाकार ने राजनीति मे भी दांव आजमाया और चुनाव भी लड़ा। हालांकि हजारिका ने इस सच को स्वीकार किया कि चुनाव लड़ना उनकी फितरत नहीं है, फिर भी अपने कुछ निकट सहयोगियों के कहने पर उन्होंने चुनाव लड़ा, पर जीत हासिल नहीं कर पाए। संगीत क्षेत्र में कार्य करते हुए भी हजारिका अन्य क्षेत्रों में क्या कुछ हो रहा है, उसे जानने के प्रति उत्सुक रहते थे।

आज हजारिका हमारे-आपके बीच नहीं है, पर उन्होंने अपने जीवन काल में संगीत क्षेत्र में जो कुछ योगदान दिया, उससे वे सदैव याद किए जाते रहेंगे। असम की कला-संस्कृति से भारतीय संगीत प्रेमी जनता को परिचित कराते तक ही डॉ. हजारिका खुद को सीमित कर लेते तो शायद वे भारतीय संगीत जगत में चर्चित चेहरा नहीं बनते। उनकी कला सिर्फ एक प्रांत तक सीमित रह जाती, इसीलिए हजारिका ने अपने संगीत कौशल्य का प्रचार-प्रसार किया। जब तक सूरज चांद रहेगा, हजारिका आपका नाम रहेगा, यदि इस उक्ति के लिए डॉ. हजारिका के लिए प्रयुक्त किया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

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