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एसएफसी एनवायरमेंटल टेक्नॉलजी प्रा.लि. सन २००५ से जल शुद्धिकरण के क्षेत्र में अपना योगदान दे रही है। कंपनी  सीटेक जैसे आधुनिक तंत्रज्ञान से दूषित जल शुद्धिकरण के लिए कार्यरत है। कम्पनी गंगा शुद्धिकरण परियोजना में अपना योगदान देने के लिए तैयार है। पेश है कम्पनी के मैनेजिंग डायरेक्टर श्री संदीप आसोलकर से बातचीत के कुछ मह्त्वपूर्ण अंश।

गंगा का नाम सुनते ही भारतीय जनमानस में पवित्रता का भाव निर्माण होता है। आप जल शुद्धिकरण और उसके पुनर्प्रयोग के विशेषज्ञ हैं। आपके गंगा के संदर्भ में क्या विचार हैं?
‘गंगा’ शब्द ही भारतीय मनों को ताजगी और पवित्रता का स्मरण कराने वाला शब्द है। यह भारतीयों की भावना से संबंधित है। यह एक पावन तीर्थ है। भारतीय परंपरा में तीर्थ का सदैव ही महत्व रहा है। तीर्थ शब्द का अर्थ है पवित्र करने वाला। जिस क्षेत्र में, जिस जगह पर दिव्य पावन शक्ति होती है वहां मानव का अंत:करण भी पावनता का अनुभव करता है। भारतीय संस्कृति में नदियों को भी पवित्र तीर्थों के समकक्ष ही स्थान प्राप्त है। गंगोत्री से गंगा सागर तक का लगभग २५०० किमी का प्रवास करते समय इस पूरे प्रदेश को सुजलाम सुफलाम करने वाली, लोगों के जीवन को संवारने वाली गंगा भारतीय समाज को सही मायनों में आध्यात्मिक और आर्थिक आधार भी देती है।

पिछले हजारों वर्षों से भारतीय समाज को पवित्र करने वाली ‘गंगा नदी’ प्रदूषित कैसे हो गई?
गंगा नदी का उद्गम अत्यंत पवित्र और शुद्ध जल के रूप में हुआ परंतु यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमने उसे अशुद्ध कर दिया है। गंगा ने अपनी यात्रा शुद्ध ग्लेशियर से शुरू की और आज कानपुर शहर ने उसे सबसे अधिक प्रदूषित किया है। गंगा दो प्रकार के प्रदूषण का सामना कर रही है। मानव निर्मित और दूसरा राजनीति निर्मित। पहले कौन से कारणों की ओर गौर किया जाये यह सोचना आवश्यक है। अभी जो गंगा का प्रदूषित स्वरूप है उसके कारण किसी से भी छिपे नहीं हैं। वे कारण सभी के सामने स्पष्ट हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड में लगभग ७५० से अधिक कारखाने हैं। इन कारखानों से कचरे का उचित निस्तारण हुए बिना ही उसे गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है। इसके साथ ही बढती हुई जनसंख्या के कारण भी भारी मात्रा में मल, कचरा आदि भी गंगा में छोड़ा जाता है। धार्मिक विधियों, कर्मकांडों के कारण मृत देह भी गंगा के पानी में बहा दिए जाते हैं। इन सभी के कारण गंगा का पानी कचरे का भंडार बन गया है। निरंतर रूप से रासायनिक और मानव निर्मित कचरे के प्रवाह के कारण गंगा के प्रदूषण स्तर में बढोत्तरी हो रही है। पानी कितना प्रदूषित है इसे नापने के लिए उसमें बीओडी (बायोलजिकल ऑक्सिजन डिमांड) नापा जाता है। एक लीटर पानी में १० मिलिग्राम होना आदर्श स्थिति मानी जाती है। परंतु कानपुर परिसर में यह मात्रा १ लीटर पानी में ५,४४,९८० किलो तक ज्ञात हुआ है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि गंगा कितनी प्रदूषित है। यह प्रदूषण की भीषणता की पराकाष्ठा है। इसके परिणाम भी मानव को ही भोगने पड़ रहे हैं।
आप पिछले १० सालों से जल शुद्धिकरण के क्षेत्र में कार्यरत हैं। आपकी संस्था तथा उसके कार्य के बारे में जानकारी प्रदान करें।
एसएफसी एनवायरमेंटल टेक्नॉलजी प्रा.लि. सन २००५ से जल शुद्धिकरण के क्षेत्र में अपना योगदान दे रही है। हमारी कंपनी सीटेक जैसे आधुनिक तंत्रज्ञान से दूषित जलशुद्धिकरण के लिए कार्यरत है। पानी का केवल संरक्षण करके ही नहीं वरन उसके पुनर्प्रयोग से पानी की समस्या सुलझाई जा सकती है। इसी आधार पर हमारी कंपनी पिछले दस सालों से काम कर रही है। सी-टेक जैसे आधुनिक तंत्रज्ञान के कारण हमारी कंपनी उद्योग तथा समाजसेवा इन दोनों भावनाओं के साथ कार्य कर रही है। इसलिए कंपनी को अत्यधिक लोकप्रियता भी मिल रही है। यह तकनीक बड़े प्रकल्पों के लिए भी उपयुक्त है। वाशी, नेरूल, ऐरोली, खारघर में लगाए गए हमारे प्रकल्पों को आदर्श माना जाता है। अनेक देशों से लोग इन प्रकल्पों को देखने के लिए आते हैं। अमेरिका ने भी इस तकनीक को अपने यहां लाने का आग्रह किया है। वाशी ऐरोली प्रकल्प को प्रधान मंत्री पुरस्कार प्राप्त हुआ है। नेरूल प्रकल्प को महाराष्ट्र का ‘वसुंधरा पुरस्कार’ मिला है। पूरे देश में हमने लगभग ३०० प्रकल्पों पर अपनी सेवाएं प्रदान की हैं। गोवा, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, जम्मू और कश्मीर आदि राज्यों ने सीटेक का स्वीकार किया है।
आज एसएफसी का कार्य दुनियाभर के २२ देशों में चल रहा है। मेक्सिको, चीली, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कोरिया, चीन, वियतनाम,मलेशिया, इंग्लैंड, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, पोलैंड, सऊदी अरब इत्यादि में एसएफसी के प्रकल्प कार्यान्वित हैं।
इसके साथ ही ओरेक्स नामक तकनीक की सहायता से कचरे का निर्मूलन करने का कार्य भी हमारी कंपनी के द्वारा किया जाता है। कचरे का मूल्य है। वह भी एक प्रकार का धन है। इसका ध्यान रखते हुए कचरे का विभाजन करके उसका पुनर्प्रयोग या निर्मूलन किया जाता है। इस प्रकार पर्यावरण की रक्षा में हमारी कंपनी योगदान दे रही है।

नरेंद्र मोदी सरकार ने गंगा शुद्धिकरण योजना का प्रारंभ किया है। उस बारे में आपका मत स्पष्ट करें।
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधान मंत्री पद ग्रहण करने के पूर्व ही गंगा शुद्धिकरण का विचार जनता के समक्ष रखा था। प्रधान मंत्री का पद ग्रहण करने से ठीक पूर्व भी उन्होंने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत गंगा आरती करके की थी। गंगा शुद्धिकरण के लिए एजेंडा तैयार किया। उस पर अमल करने के लिए जल संपदा और पर्यावरण मंत्रालय को इस ओर ध्यान देने की 

जिम्मेदारी दी गई है। अत्यंत कम समय में ही अपने कार्य का प्रारंभ करने वाले नरेन्द्र मोदी शायद पहले प्रधान मंत्री होंगे। गंगा शुद्धिकरण का प्रकल्प चलाते समय अनेक नए विषय सामने आ रहे हैं। सन २०२० तक गंगा को प्रदूषण मुक्त करना का सरकार का लक्ष्य है। यह एक बडी चुनौती है। इस प्रकल्प के लिए फिलहाल २०३७ करोड़ रुपयों का खर्च अपेक्षित है। इसमें गंगा के पानी में जल यातायात शुरू करने, गंगा के तटों पर बसे शहरों का विकास, घाटों को व्यवस्थित करना, शौचालय निर्माण, रासायनिक कारखानों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों का विचार, गंगा ज्ञान केंद्र, गंगा विश्वविद्यालय, शुरू करना, गंगा को धार्मिक पर्यटन के रूप में बढावा देने इत्यादि सभी का इस योजना में समावेश है। यह सभी अर्थों में व्यापक विचार वाली तथा परिणामकारक योजना है। परंतु यह कोई जादू की छड़ी नहीं है कि आज विचार किया और कल वह पूर्ण हो गया। समाज को ऐसी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। २५०० किमी की गंगा को शुद्ध करने के लिए आवश्यक समय दिया जाना चाहिए।

पिछले ३० वर्षों में गंगा शुद्धिकरण की योजना क्यों सफल नहीं हो पाई?
सन १९८५ से गंगा शुद्धिकरण की योजना विविध सरकारों के माध्यम से बनाई जा रही है। इसमें सफलता क्यों नहीं मिली इसका विचार करें तो कुछ बातें सामने दिखाई देतीे हैं। सन १९८५ में गंगा नदी के किनारे बसे हुए औद्योगिक क्षेत्रों से जो प्रदूषित पानी, रासायनिक पानी, कचरा आदि गंगा नदी में छोड़ा जाता है, उसमें निरंतर बढोत्तरी हो रही है। औद्योगिक क्षेत्रों के बढ़ने के साथ साथ ही प्रदूषण भी बढ़ रहा है। प्रदूषित पानी को गंगा में प्रवाहित करने से पहले उस पर रासायनिक प्रक्रिया करना आवश्यक होता है। इसी मुख्य समस्या का अभी तक गंभीरता से विचार नहीं किया गया। इस तरह से प्रक्रिया रहित कचरा गंगा के पानी में प्रवाहित करने के कारण बड़े पैमाने पर प्रदूषण हो रहा है। प्रदूषित पानी पर रासायनिक प्रक्रिया करने के लिए अत्याधुनिक तकनीक की आवश्यकता है। इस प्रकार की अत्याधुनिक तकनीक सीटेक हमारी कंपनी के पास है। इसका उपयोग दुनिया के विविध प्रकल्पों पर किया जा सकता है।

नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा घोषित ‘गंगा स्वच्छता अभियान’ में जल और घनकचरे के शुद्धिकरण के संबंध में आपकी तकनीक का उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है?
हमारी संस्था की यह विशेषता है कि हमने आज तक देश विदेश में लगभग ३०० प्रकल्पों पर हमारी कंपनी ने योगदान दिया है। हमारे पास तकनीकी कौशल्य है। भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने प्रारंभिक कामों के दौरान ही समाज को पर्यावरण रक्षा के संबंध में विचार करने की दृष्टि प्रदान की है तथा संतोषजनक बात यह है कि समाज में इस संदर्भ में जागृति भी आ रही है।
मेरे मन में सदैव यह विचार आता है कि मेरे पास पर्यावरण की रक्षा करने के लिए उपयुक्त तकनीकी ज्ञान है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की ‘गंगा शुद्धिकरण योजना’ पर्यावरण का जतन करने वाली योजना है। अत: इस योजना में सहभाग देने की मेरी इच्छा है। इस संदर्भ में मैंने अनेक लोगों से चर्चा भी की है। सरकार के पर्यावरण से संबंधित विवधि उपक्रमों में तथा ‘गंगा शुद्धिकरण योजना’ में सहयोग करने की मेरी योजना है। मैं मानता हूं कि अगर मेरे पास उपलब्ध तकनीक का उपयोग आज देश के सामने जो समस्याएं हैं उनका निराकरण करने में हुआ तो इससे बड़ा राष्ट्र कार्य कोई नहीं होगा। हमारी तकनीक का राष्ट्रीय स्तर पर उपयोग हो तथा उससे राष्ट्रहित हो यही मेरी अपेक्षा है। इस काम के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अगर अवसर प्रदान किया तो मैं अवश्य ही यह कार्य तत्परता से करूंगा।

प्रतिनिधी

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