सेना का आधुनिकीकरण सब से अहम मुद्दा

सेना प्रमुख जनरल वी. के. सिंह का रहस्योद्घाटन और देश की सुरक्षा व्यवस्था में खामियों के बारे में व्यक्त राय से कुल सुरक्षा व्यवस्था के बारे में ही गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। जन. सिंह 31 मई को निवृत्त हो रहे हैं और निवृत्ति के अंतिम दिनों में 14 करोड़ रु. की रिश्वत की पेशकश के बारे में उनके रहस्योद्घाटन से देश को गहरा सदमा पहुंचा है। इसी के साथ उन्होंने प्रधान मंत्री को पत्र लिखकर सुरक्षा व्यवस्था में खामियां उजागर की हैं। जन. सिंह का यह व्यवहार फौजी अनुशासन के विपरीत हो सकता है, लेकिन यह जरूर है कि इससे देश की एक बड़ी और गौरवशाली व्यवस्था में फिलहाल क्या चल रहा है यह स्पष्ट होता है।

रिश्वत की पेशकश के मामले की अब सीबीआई से जांच की जा रही है। सच सामने आने की उम्मीद है, लेकिन रिश्वत की पेशकश करने वाले अधिकारी का नाम ही रक्षा मंत्री एंटनी ने संसद में बता दिया है। उस अधिकारी की पार्श्वभूमि देखते हुए प्रथम दृष्ट्या ऐसा लगता है कि आरोप में कुछ तथ्य है। लेकिन निवृत्ति के ऐन समय पर सेना प्रमुख ने अपनी जन्मतिथि के बारे में अदालत तक पहुंचने का जो काम किया उससे उनके बर्तावों के बारे में कुल मिलाकर आशंका व्यक्त की जा रही है। इस संदर्भ में यह ध्यान रखना जरूरी है कि दोनों बातें पूरी तरह स्वतंत्र हैं।

फौजी वाहनों की खरीदी में दोयम दर्जे के वाहनों का चयन करने के लिए 14 करोड़ रु. की पेशकश की जाने का जन. सिंह का आरोप है और मामला खुलने के पूर्व यह बात उन्होंने रक्षा मंत्री को बताई थी। रक्षा मंत्री ने भी इसे माना है। जन. सिंह ने एक वक्तव्य के जरिए इस विषय में बहस आरंभ की और इससे संसद और टीवी चैनलों को आरोप‡प्रत्यारोप का मसाला मिल गया।
देश की विविध सीमाओं पर जो अधिकारी और जवान तैनात हैं उन्होंने ये खबरें जब पढ़ी या देखी तब उनके मन में क्या प्रतिक्रियाएं उभरी होंगी? जवानों के मन में यह प्रश्न उभर सकता है या नहीं कि यदि उनके पास जो शस्त्रास्त्र या सुरक्षा साधन हैं वे दोयम दर्जे के हैं तो किस बात के लिए प्राण की बाजी लगा दें? भारतीय सेना के बारे में हर भारतीय के मन में भारी सम्मान है। रिश्वत की पेशकश का जिन पर आरोप है उन लेफिटनेंट जनरल तेजिंदर सिंह का नाम कुछ अखबारों ने प्रकाशित किया और कुछ चैनलों ने उनसे भेंटवार्ताएं भी जारी कीं। तेजिंदर सिंह वे ही व्यक्ति हैं जिन्होंने मुंबई के आदर्श सोसायटी मामले में ‘अनापत्ति प्रमाणपत्र’ जारी किया था।

पिछले आठ वर्षों से एंटनी हमारे रक्षा मंत्री हैं। उनके कार्यकाल में सेना का आधुनिकीकरण पूरी तरह रुक‡सा गया है। विदेशों से हथियार खरीदने की हमारी प्रक्रिया अत्यंत क्लिष्ट, अत्यंत कठिन, पुरानी और समयखाऊ है। इसी कारण सेना के लिए रखे 50 हजार करोड़ रु. के प्रावधान का हम इस्तेमाल नहीं कर सके। इस रक्षा सामग्री खरीदी नीति में हम पिछले पांच साल में पांच बार परिवर्तन कर चुके हैं। सुरक्षा क्षेत्र में दाम प्रति वर्ष 15 से 20 प्रतिशत बढ़ते हैं। इस तरह पांच साल का विलम्ब हो जाए तो कीमतें दुगुनी हो जाती हैं।

रक्षा मंत्री को पद का भार सौंपने के बाद प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने एक बार मजाक में कहा था कि ‘वित्त मंत्री अब खुश होंगे, क्योंकि रक्षा मंत्री एक भी पैसा खर्च करने वाले नहीं हैं। वित्त मंत्रालय अब काफी पैसा बचा लेगा।’ पिछले आठ वर्षों में एक भी करार पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। थोड़े बहुत हथियार खरीदे भी गए लेकिन वे सरकार से सरकार के स्तर पर हैं। विदेशी सरकारों से खरीदे गए हथियार बहुत महंगे पड़ते हैं। ईमानदारी की यह कितनी बड़ी कीमत है!

देश की सुरक्षा का इतिहास देखें तो पता चलेगा कि भारत हथियारों के बारे में रूस पर बड़ी मात्रा में निर्भर है। लेकिन रूस के साथ होने वाले करार महंगे और समयखाऊ होते हैं। दूसरी ओर अमेरिका भी भारत में सुरक्षा के बारे में पहल करने को उत्सुक है। इसी बीच सुरक्षा विषयक व्यवहारों में घोटालों, आरोपों के कारण भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया कूर्म गति से चल रही है। पिछले पांच वर्षों में यह दिखाई दिया कि रक्षा मंत्री आबंटित राशि का पूरी तरह उपयोग करने में असमर्थ रहे हैं। इसका कारण यह है कि विदेशों से हथियार खरीदी करने की हमारी कार्यप्रणाली अत्यंत कठिन, जटिल, दीर्घ समय लेने वाली और पुरानी पड़ चुकी है। इस प्रणाली को सरल बनाने की आवश्यकता है। फौज के आधुनिकीकरण के लिए बजट में जीडीपी के तीन प्रतिशत रकम का प्रावधान जरूरी लगता है।

चूंकि हमारा आधुनिकीकरण अभी रुका हुआ है इसलिए यदि लड़ाई छिड़ती है तो हमें पुराने हथियारों से ही काम लेना होगा। इस बारे में रक्षा मंत्री, रक्षा मंत्रालय और सरकार से कौन जवाब मांगेगा? क्या करदाताओं का यह धन भ्रष्ट राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों के लिए है, देश की रक्षा के लिए नहीं है? वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था इस खतरे को अनदेखा कर अपने वोटबैंक सुरक्षित रखने में लगी हुई है। यह एक बार मान भी लिया फिर भी जिन पर अमल की जिम्मेदारी है उन नौकरशाहों का क्या हो?
हथियारों और अन्य रक्षा सामग्री की खरीदी में होने वाली अनियमितताएं नई नहीं हैं। 1980 के दशक में राजीव गांधी के काल में बहुचर्चित बोफोर्स तोप घोटाले की चर्चा अब थम गई है। लेकिन इसके पूर्व या बाद में भी इस तरह के घोटाले होते रहे हैं। रक्षा मंत्री का पदभार सम्हालने के बाद एंटनी ने रक्षा सामग्री की खरीदी में पारदर्शिता लाने का बड़े पैमाने पर प्रयास किया। अपनी स्वच्छ छवि बनाए रखने के प्रयास में एंटनी सौदों को मंजूरी देने में काफी विलम्ब लगातें हैं और फलस्वरूप जवानों तक आधुनिक हथियार पहुंचने में देरी होती है, यह आरोप सेना के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी भी करते रहे हैं। जन. सिंह ने प्रधान मंत्री को भेजे पत्र में इसी मुद्दे का जिक्र किया है। आधुनिक युध्द के लिए जरूरी हथियारों की कमी के कारण सेना कमजोर हो रही है और कुल मिलाकर सेना की वर्तमान स्थिति खराब है, यह बात भी जन. सिंह ने उठाई है।

सेना प्रमुख जैसे शीर्ष अधिकारी व्दारा लिखा पत्र मीडिया के पास कैसे पहुंचा यह मुद्दा अवश्य है, परंतु इससे पत्र में उल्लेखित मुद्दों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। ये मुद्दे देश की रक्षा व्यवस्था से जुड़े हैं। ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका (ब्रिक्स) का सम्मेलन हाल में दिल्ली में हुआ। चीन पाकिस्तान की सहायता से भारत की रक्षा को चुनौती देने की कारगुजारियां करते रहता है। कश्मीर में तैनात फौजी अधिकारी उसकी रिपोर्टें सरकार को भेजते रहते हैं। चीन के अधिकारी बड़ी संख्या में पाकिस्तान में दिखाई देते हैं, यह भारतीय सेना की चिंता का विषय है। ऐसे समय भारतीय सेना की कमजोरियों को उजागर करने वाली बातें मीडिया में उजागर हो यह दुर्भाग्यपूर्ण है। इस बात का भी ध्यान हमने नहीं रखा कि चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ इस परिषद के लिए जिस दिन नई दिल्ली पहुंचते हैं और उसी दिन इन खामियों की बातें खुलती हैं। यह राष्ट्रीय शर्म की बात है। हमारी सेना की खामियां पाकिस्तान और चीन जानना चाहता है और ‘सब से तेज गति से’ यह उन तक पहुंचाते हैं हमारे चैनल, जिस पर हमें लज्जित होना चाहिए।

ये खबरें बाहर आने से सेना की जो खामियां दुनिया के सामने आईं हैं उन्हें दूर करने के लिए केंद्र सरकार को तुरंत कदम उठाने चाहिए और दुनिया को यह भी बताया जाना चाहिए कि ये खामियां दूर कर दी गई हैं। इसे पूरा करने के लिए किसी प्रकार की दिक्कत न आने दें। सरकार यदि अन्य किसी काम में खर्च कटौती करनी हों तो करें, लेकिन सेना के आधुनिकीकरण में आने वाली खामियां प्राथमिकता से दूर करें। रक्षा मंत्री की स्वच्छ छवि की कसरत और प्रधान मंत्री की निष्क्रियता से यह मामला बढ़ा है। एंटनी अपनी छवि को सम्हालने के लिए संन्यास ले लें यही बेहतर है।

सेना प्रमुख का पत्र

* देश पर हमला हुआ तो दुश्मन का मुकाबला करने की सेना की
वर्तमान स्थिति नहीं है।

* टैंकों के लिए जरूरी अस्त्र खत्म होते आ रहे हैं।

* तोपखाने में फयूज ही नहीं है।

* अल्ट्रालाइट होवित्जर खरीदी प्रक्रिया कानूनी उलझन में फंसी है।

* हवाई सुरक्षा के 97 फीसदी उपकरण बिगड़े हुए हैं। कभी हवाई
हमला हुआ तो बचने की संभावना कम हो गई है।

* पैदल सेना के पास हथियारों का अभाव है। रात में लड़ने की क्षमता
नहीं है।

* युध्द में जरूरी पैराशूट नहीं है।

* विशेष सुरक्षा बल के पास हथियारों का अभाव है।

* सेना की निगरानी व्प्यवस्था में कमी। यूएवी व निगरानी राडार नहीं
है।

* टैंकविरोधी मिसाइलों की उत्पादन क्षमता व उपलब्धता कम है।

* लम्बी दूरी तक मार करने वाली तोपों की कमी।

* सेना के पास दूसरे विश्वयुध्द के जमाने के उपकरण हैं। हवाई सुरक्षा
उपकरण तीस साल पुराने हैं। इस व्यवस्था की रीढ़ समझी जाने
वाली एल 70 एयर गन 44 साल पुरानी है। स्वचलित ‘चिल्का’
34 साल से सेवा में है। ‘ट्विन’ नामक दुहरी तोप 31 साल
से है।

* बुलेटप्रूफ जैकेट खराब क्वालिटी के हैं। 15 वर्ष पुराने हैं। वजन
भी 10 किलो है। इस कारण भारी मात्रा में जवान हताहत हुए हैं।

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