—ताकि हम श्याम ची आई को समझ सकें


‘श्याम ची आई’ को जानते हैं आप? मराठी के इन शब्दों का अर्थ है श्याम की मां। वैसे यह एक किताब का नाम है, जिसे साने गुरुजी ने लिखा था। यह एक मां की कहानी है। जो अपने बेटे को पढ़ाने-लिखाने के लिए जीवन की ढेर सारी विपत्तियों को झेलती है। देखा जाये तो यह हर मां की कहानी हो सकती है। साने गुरु जी ने इसे सन् 1935 में लिखा था और पता नहीं यह कहानी की विशेषता है या लेखन की, पिछले सत्तर-पच्चहर सालों में इसकी लोकप्रियता में कोई कभी नहीं आयी है। पुस्तक के अनुवाद भी हो चुके हैंं और नाट्य-संस्करण भी निकल चुके हैं। पिछले दिनों इस नाटक के अंग्रेजी में भी खेला गया। मराठी में तो पिछले पांच सालों में इस नाटक की पांच सौं से अधिक प्रस्तुतियां हो चुकी हैं। मराठी में क्लासिक का दर्जा पाचनु नामक पुस्तक का अनूदित होना या नाट्य रूपांतरण होना कोई बड़ी खबर नहीं है। खबर तो यह तब बनती अगर यह सब नहीं होता। फिर भी, अंग्रेजी में इसकी नाट्य-प्रस्तुति खबर के लायक समझी गयी, यह बात एक से अधिक कारणों से महत्वपूर्ण है।

नाटक को अंग्रेजी में अनूदित करने वाले राहुल मनोहर का कहना है, ‘‘हमें लगा कि इस पुस्तक की वैश्विक अपील भाषा के कारण सीमित नहीं रहनी चाहिए। दूसरे, बहुत से मराठी भाषी बच्चे मराठी पुस्तकें नहीं पढ़ते अपना मराठी नाटक नहीं देखते’’ इसलिए इसका अंग्रेजी नाट्य-रूपांतरण करना पड़ा। पुस्तक अथवा विषय की वैश्विक पहुंच या अपील की सीमा वाली बात तो समझ आती है। अच्छी भी ये यह बात। हमारी भाषाओं की श्रेष्ठ रचनाएं विश्व की अन्यन्य भाषाओं में प्रकाशित हों, यह साहित्य और समाज दोनों के लिए अच्छी बात हो लेकिन ‘मराठी भाषी बच्चे मराठी की पुस्तकें नहीं पढ़ते’ यह बात चिंता करने का एक विषय होनी चाहिए और चिंता इस बात की भी होनी चाहिए कि मराठी भाषी बच्चों को मराठी की एक क्लासिक पुस्तक से परिचित करवाने के लिए अंग्रेजी का सहारा लेने की स्थिति क्यों उत्पन्न हो गयी? दुर्भाग्य से मराठी का यह सच देश की लगभग सभी भाषाओं का सच बनता जा रहा है। पिछले कुछ सालों में जिस तरह देश में अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा है, उससे देश की भाषाओं पर एक खतरा मंडराने लगा है और त्रासदी यह भी है कि इस खतरे को या तो समझा नहीं जा रहा अथवा देखकर भी अनदेखा किया जा रहा है। यह दोनों ही खाते हमारी चिंता का विषय होनी चाहिए।

एक भाषा के रूप में अंग्रेजी के विरोध का कोई कारण नहीं है और अंग्रेजी के विपुल साहित्य को देखते हुए भी इस भाषा को पढ़ना-जानना उचित ही कहा जा सकता हो लेकिन जब मराठी भाषी बच्चों को ‘श्याम ची आई’ पढ़ाने-समझाने के लिए अंग्रेजी भाषा का सहारा लेने की आवश्यकता लगने लगे तो इस स्थिति को सामान्य नहीं कहा जा सकता और आसानी से समझ में भी नहीं आती यह बात। समझ में तो यह भी नहीं आता कि मराठी भाषी राज्य की राजधानी मुंबई में मराठी की पैरोकार शिवसेना द्वारा संचालित महानगरपालिका के स्कूलों में मराठी माध्यम से पढ़ने वालों की संख्या क्यों कम होती जा रही हैं। पिछले बीस सालों में मनपा द्वारा संचालित स्कूलों में मराठी माध्यम के 36 स्कूल बंद हुए हैंं और कारण पर्याप्त संख्या में विद्यार्थियों का न होना। अकेले सन 2008-2009 में मनपा ने 15 मराठी माध्यम के स्कूल बंद किये थे। आंकडे यह भी बताते हैं कि सन 2004-2005 में मुंबई महानगरपालिका के लगभग 450 मराठी माध्यम के स्कूलों में 177538विद्यार्थी पढ़ते थे। 2009-10 में इन स्कूलों की संख्या घटकर 413हो गई और इसमें पढ़ने वाले छात्रोंं की संख्या 107413 हो गई। मराठी माध्यम

के स्कूलों के अलावा तमिल, तेलुगू, उर्दू, गुजराती माध्यम के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या भी लगातार कम हो रही हैं। ज्यादा से ज्यादा बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों मेंं जाना चाह रहे हैं। हां, हिंदी माध्यम के स्कूलों में भी विद्यार्थियों की संख्या में कुछ वृद्धि है। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने की ललक में वृद्धि के बारे में सोचा जाना जरूरी है।

अंग्रेजी का ज्ञान प्राप्त करने और अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने मेंं अंतर हैं। अंग्रेजी एक भाषा मात्र नहीं रही, यह एक सभ्यता, एक संस्कृति की वाहक भी बनती जा रही है। दूसरे, अंग्रेजी के साथ एक अभिजात्य भी जुड़ता जा रहा है। एक स्टेटस सिंबल, कथित उच्च वर्ग का प्रतीक भी बन चुकी है अंग्रेजी। कुछ अर्सो पहले तक निजी क्षेत्र में ही अंग्रेजी माध्यम के स्कूल पनप रहे थे, अब बिहार और गुजरात जैसे राज्यों में भी, ग्रामीण क्षेत्रों तक में, पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाई जा रही है। क्या यह जरूरी हैं? क्या इसका कोई विपरीत असर हमारी सोच, हमारी जीवन-शैली पर तो नहीं पड़ रहा? इन और ऐसे कई सवालों को उत्तर तलाशने की जरूरत महसूस किया जाना आज जरूरी हो गया है।

साने गुरुजी की क्लासिक कृषि का अनुवाद यदि विदेशों में होता तो समझ में आता कि विदेशी भी उस कृति का महत्व समझ रहे हैं। देश की अन्यन्य भाषाओं में यदि मराठी की इस पुस्तक का अनुवाद होता, तब भी समझ में आता कि देश की एक महत्वपूर्ण पुस्तक देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच रही है। लेकिन मराठी भाषी बच्चों को ‘श्याम ची आई’ से परिचित कराने के लिए, उन्हें इसका महत्व समझाने के लिए यदि अंग्रेजी का सहारा लेने की आवश्यकता महसूस की जा रही है तो यह हमारे नीति निर्धारकों, राजनेताओं और समाज के नेतृत्व के लिए चिंतनीय विषय होना चाहिए। चिंता का विषय होना चाहिए। कल्पना कीजिए गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की रचनाओं को समझाने के लिए बंगाल को अंग्रेजी का सहारा लेना पड़े, अथवा संत-कवि थिरुवेल्लुवर की शिक्षा तमिल बच्चों तक पहुंचाने के लिए अंग्रेजी माध्यम चुनना पड़े या फिर गुजरातियों को नरही भगत की रचनाओं का आस्वाद लेने के लिए अंग्रेजी सीखनी पड़े या पंजाब मेेंं नानक की वाणी अंग्रेजी में पढ़ना विवशता बन जाये तो स्थिति कैसी होगी? क्या नाम देंगे आप इस स्थिति को?

मैं दुहराना चाहता हूं, इस बात को कि सवाल अंग्रेजी के समर्थन या विरोध का नहीं है। वैसे भी, अंग्रेजी सीखने से भला किसी को क्या शिकायत हो सकती है? और क्यों होनी चाहिए शिकायत? शिकायत तो इस बात से है कि अंग्रेजी के नए मोह में हम अपनी भाषाओं को भूलते जा रहे हैं या फिर जाने-अनजाने उनकी गरिमा, उनके महत्व को नकार रहे हैं। अपने आप में यह एक सांस्कृतिक संकट है, जिसकी ओर हमारा ध्यान ही नहीं जा रहा। मम्मी-पापा भी उतने ही प्यारे शब्द हैं, जितने आई-बाबा या माता-पिता। लेकिन जब आई या मां का मतलब समझाने के लिए मम्मी शब्द की आवश्यकता पड़नी लगे तो इसका एक अर्थ अपनी जड़ों से कटना भी होता है। मुझे भय है जिन मराठी बच्चों को ‘श्याम ची आई’ का अर्थ और महत्व समझाने के लिए उसे अंग्रेजी के अनुवाद करने की आवश्यकता महसूस हो रही हैं, वे बच्चे कहीं न कहीं अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं। जरूरत खाद-पानी देकर उन जड़ों को मजबूत बनाने की हैं, उस मिट्टी से जोड़ने की है, जिसमें जड़ें स्थित हैं।

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