पैसा और पेड़

कहावत तो पुरानी और सर्वविदित है कि ‘‘पैसे पेड़ पर नहीं लगते,’’ परन्तु आजकल यह महत्वपूर्ण कथन बनकर विशेष चर्चा में है। जब कोई मामूली सी बात किसी बड़े व्यक्ति के मुखारविंद से निस्सृत होती है, तो खास अहमियत अख्तियार कर लेती है। ठीक वैसे ही जैसे पारस का स्पर्श पाकर मामूली लोहा चमकदार महंगे सोने में बदल जाता है। प्रधानमंत्री के मुख से निकली यह कहावत भी अब महत्वपूर्ण, उल्लेखनीय उक्ति (कोटेशन) बन गयी हैं।

पेड़ और पैसे का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है। हमारी हिंदी में पैसा और पेड़ दोनों दो-अक्षरी शब्द हैं, साथ ही दोनों के आरंभ में पकार है। भोपाली आदमी तो पैसे को पेसा बोलता हैं। यदि आप पुराने भोपाल की गलियों से गुजरेंगे, तो अक्सर यह या ऐसा ही वाक्य सुनाई दे जाएगा- ‘खाँ, एसा करो कि पेले के पेसें दे दो’, तात्पर्य यह कि भोपाली बोली में तो पेड़ और पैसा, दोनों का आरंभ ‘पे’ से होता है। अर्थात दोनों शब्द सहोदर हैं। इनमें गहरा लगाव होना ही चाहिए, और है।

इस निकट सम्बन्ध के कारण ही पैसा और पेड़ अन्योयाश्रित हैं- एक-दूसरे पर निर्भर। यदि जंगली वृक्षों को, जो प्राकृतिकरूप से उत्पन्न होते हैं, छोड दें तो मनचाहे फलदार वृक्षों को उगाने, उनके बगीचे लगाने में पैसा खर्च होता है। बदले में उनसे उत्पन्न चीजें बेचकर पैसा कमाया जाता है। पैसा लगाकर ज्यादा पैसा पैदा किया जाता है, तभी तो कहा गया है कि पैसा पैसे को खींचता है। जिस पैसे से पैसा पैदा किया जाए, उसे ‘पूँजी’ कहते हैं। पूँजी भी पेड़ और पैसे का सजातीय, दो अक्षरी, पकारारंभी शब्द है। ‘पति’ भी इसी कुल का है, इसलिए ‘पूँजी’ और ‘पति’ में खूब पटती है। दोनों आसानी से दिल मिलकर ‘पूँजीपति’ बनाते हैं। पूँजीवादी अर्थशास्त्र में अतिरिक्त पैसा उपलब्ध कराने के लिए पूँजीपतियों का पनपना परम आवश्यक है। इस तथ्य को विपक्ष नहीं समझता, तो दोष सरकारी नीति का नहीं, विपक्ष की नासमझी का है। विडम्बना यह है कि सरकार के सहयोगी और समर्थक कुछ अज्ञानी लोग भी इस गूढ़ बात को नहीं समझ पा रहे हैं। सरकार चाहती है, ईश्वर उन्हें सदबुद्धि दे।

वैसे बिना किसी लागत (पूँजी) के भी पैसे होते हैं- जंगली वृक्षों से लकड़ी, शहद, लाख आदि वनोपज बेचकर या बिकवाकर यकीन न हो, तो महकमा जंगलात के किसी कर्ता-धर्ता की गहन पड़ताल कर लीजिए। पेड़ों से पैसा झड़ने की बात सहीं लगने लगेगी। हाँ, इसके लिए परिश्रम करना पड़ता है। वनस्पतिजन्य वृक्षों के अलावा ऐसे गैर वानस्पतिक वृक्ष भी इस महान देश में हैं, जिनसे पैसा पैदा किया जाता है। मेरे एक परिचित कहा करते थे- ‘भाई साहब, लोग गलत कहते हैं कि पैसा पेड़ों पर नहीं लगता, जो उन्हें हिलाकर झड़ा लिया जाए। लेकिन ऐसे पेड़ हैं जिनसे पैसा झड़ सकता है, बस उन्हें चतुराई से हिलाकर झड़ाने वाला होना चाहिए।’ सौभाग्य से आज हमारे यहाँ ऐसे चतुर लोगों की कोई कमी नहीं है। इसलिए ऐसे वृक्षों से पैसा धड़ाधड़ झड़ रहा है और झड़ाने वाले अरबपति होते जा रहे हैं।

प्राकृतिक वन जैसे जैसे कम हो रहे हैं, वैसे वैसे इस दूसरे प्रकार के पैसा- झडाऊ जंगल चारों तरफ बहुलता से उग आये हैं, जिनमें भाँति भाँति के पैसा उगाऊ वृक्ष सुशोभित हो रहे हैं। दुर्भावनावश कुछ सिर फिरे लोग इसे भ्रष्टाचार का जंगल कहते हैं। इसमें लगे धन दायक वृक्षों के नाम हैं- रिश्वत, हेराफेरी, गवन, घपला, घोटाला, ठगी, लूट-खसोट आदि आदि। इस वैज्ञानिक युग में नई-नई जेनेटिक तकनीक के सहारे उन्नत प्रकार के अधिक उत्पादक वृक्ष विकसित हो रहेें है। यह नव-अन्वेशित वृक्ष पैसे की बम्पर फसल देते हैं- इतनी की भंडारण की समस्या खड़ी हो जाती है। इसलिए सयाने लोग स्विट्जरलैंड के सुरक्षित भंडारगृहों का उपयोग करते हैं।

हमारी संस्कृति में पैसा और पेड़ हमेशा से वंदनीय, पूज्यनीय रहे हैं। यह बात और है कि अब प्राकृतिक वृक्षों और शुभ-लाभ वाले पैसे की स्थान इस नई प्रजाति के वृक्षों और उनसे झड रहे पैसे ने ले लिया है। तो आइए, हम भी आधुनिक बनें और सब मिलकर इनके ही आगे नतमस्तक हो, इन्हें सादर प्रणाम करें।

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