चौपाल की चहल-पहल और सूनापन

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मैं बुन्देलखण्ड के एक गांव की चौपाल हूं। यहां की स्थानीय बोली में चौपाल को ‘अथाई’ कहते हैं जो शायद ‘अस्थायी’ का अपभ्रंश है, क्योंकि यहां की चहल-पहल अस्थायी और अनियमित रहती है। यहां कुछ भी पहले से निश्चित नहीं होता। लोग अनायास एक

बरदाश्त की बरखास्तगी

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समाज जैसे जैसे सभ्य होता जा रहा है, उसमें कुछ जज्बात बड़ी तेजी से विकसित हो रहे हैं। इन्हीं में से एक है;बरदाश्त की बरख़ास्तगी यह बड़ी शुभ प्रवृत्ति है। बरदाश्त का जज्बा दब्बूपन की निशानी है, गुलामी का चिह्न ह

गले लग जा जालिम

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 मुझे इस विशेषांक के लिए होली पर व्यंग्य लिखने कोकहा गया तो मैं सोच में पड़ गया। होली तो स्वयं ही हास्य-व्यंग्य का महोत्सव है। व्यंग्य पर व्यंग्य तो कोई डबल व्यंग्यकार ही लिख सकता है, जो मैं नहीं हूं।

आर्थिक जगत के कृष्ण विवर

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अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि ब्रह्माण्ड में कुछ ऐसे तारे भी हैं जो अपने प्रकाश को बाहर नहीं निकलने देते, इसलिए शक्तिशाली दूरबीन से भी दिखायी नहीं पड़ते।

पैसा और पेड़

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कहावत तो पुरानी और सर्वविदित है कि ‘‘पैसे पेड़ पर नहीं लगते,’’ परन्तु आजकल यह महत्वपूर्ण कथन बनकर विशेष चर्चा में है। जब कोई मामूली सी बात किसी बड़े व्यक्ति के मुखारविंद से निस्सृत होती है, तो खास अहमियत अख्तियार कर लेती है।

पत्राचार और सहकारी गोंद

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लाला मनसुखदास ने आज आते ही ते से वक्तव्य झाड़ दिया। बोले- ‘सर’! आजकल पत्र लिख्खा बेवकूफी है। मैं उनसे सहगत होते हुए बोला ‘अब पत्र लिखता ही कौन है!’

पटकनी-पटखनी

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वैज्ञानिक उन्नति की अंधाधुंध दौड़ में आदमी प्रकृति को भी पटखनी देने की चुनौती दे रहा है। लेकिन प्रकृति भी कोई कम नहीं। कभी ज्वालामुखी, भूकंप, सुनामी तो कमी आंधी तूफान, बाढ़, सूखा, भयंकर गरमी और ठंड के जरिए आदमी जाति को पलटकर पटखनी देती है। इसलिए प्रकृति से पंगा नहीं लेने का। क्या?

अभूतपूर्व

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सुना है भारत सरकार फिल्म वालों से नाराज है। नाराजगी का कारण यह बताया जाता है कि गत वर्ष एक फिल्म में भारत की गरीबी को व्यापक रूप से दिखाया गया। सरकार को लगता है कि इससेे विदेशों में भारत की छवि खराब होती है। लेकिन मेरी समझ में यह असली कारण नहीं है-

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