भारत-अमेरिका: नैचरल पार्टनर

निष्पक्ष चुनाव मजबूत लोकतंत्र की आधारभूत आवश्यकता और पहला पायदान होते हैं। पिछले महीने में अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए और भारत के बिहार राज्य में मुख्यमंत्री पद के लिए चुनाव हुए थे। दोनों ही चुनाव भारत की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण थे।

अमेरिका का भारत की विदेश नीति, अर्थ नीति और व्यापार पर सीधा असर पडता है, अत: यह आवश्यक था कि अमेरिका का नवनिर्वाचित राष्ट्रपति भारत की ओर सकारात्मक दृष्टि रखनेवाला हो। डोनाल्ड ट्रंप के भारत से सम्बंध हमेशा ही अच्छे रहे हैं। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने उन सम्बंधों को बरकरार रखने और विस्तारित करने में अहम भूमिका निभाई थी। इसलिए भारत में मोदी के विरोधक ट्रम्प के हारने की खुशी मना रहे थे परंतु शायद वे यह भूल रहे थे कि जो बाइडेन तो भारत के पक्षधर तब से रहे हैं, जब वे बराक ओबामा की सरकार में उपराष्ट्रपति थे। उनका हमेशा से यह दृष्टिकोण रहा है कि न्यूक्लियर डील्स और सामरिक सम्बंधों को मजबूत बनाने के लिए अमेरिका और भारत को एक साथ आना ही चाहिए। भारत को ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ का दर्जा दिलाने में भी जो बाइडेन की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। उस समय भारत में मोदी सरकार नहीं थी, फिर भी जो बाइडेन भारत के लिए सकारात्मक रवैया रखते थे। अब तो भारत प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में और भी अधिक सशक्त राष्ट्र के रूप में उभर रहा है।

अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के निवासियों की अमेरिका के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका है, यह बात जो बाइडेन अच्छी तरह समझते हैं। वे सीनेट में विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष भी रहे हैं अत: वे इस बात को भी समझते हैं कि चीन के अधिपत्य और विस्तारवादी नीति पर लगाम कसने के लिए भारत का एशिया में शक्तिशाली बनना और बने रहना बहुत आवश्यक है।

भारत की जनसंख्या अधिक होने के कारण अमेरिका के लिए भारत एक बहुत बडा बाजार भी है। कोरोना के कारण सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था डगमगा गई है, अमेरिका भी इसका अपवाद नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप ने भले ही भारत की तरह लॉकडाउन घोषित नहीं किया था परंतु अमेरिका के व्यापार चक्र को भी झटका जरूर लगा था। ऐसे में भारत जैसे इतने बडे बाजार को खोना अमेरिका के लिए भी सही निर्णय साबित नहीं होगा। भारत के साथ स्वस्थ सम्बंध बनाना अमेरिका के लिए भी अब उतना ही आवश्यक है। इन सारी परिस्थितियों का आंकलन करने पर ये कयास तो लगाए ही जा सकते हैं कि जो बाइडेन भारत के लिए अनुकूल ही साबित होंगे और अमेरिका-भारत के सम्बंध पूर्ववत बने रहेंगे। जहां तक प्रधान मंत्री मोदी की मित्रता का प्रश्न है तो उनके सम्बंध बराक ओबामा से भी अच्छे थे और डोनाल्ड ट्रम्प से भी, तो जो बाइडेन के साथ भी मोदी के सम्बंध अच्छे होना लाजमी ही है। अत: अब भारत में मोदी विरोधकों को कोई और बहाने ढूंढ़ने होंगे। हालांकि ये बहाने ईवीएम वाले नहीं हो सकते जो कि हमेशा की तरह बिहार चुनाव हारने के बाद बनाए गए थे।

बिहार में नितीश सरकार का पुन: सत्ता आना में कई सवालों के जवाब दे गया। एक बार पुन: यह साबित हो गया कि जनता की  उत्तर प्रदेश और लोकसभा के चुनावों से लगी जातीयता को दूर रखने की आदत बिहार में भी बनी रही। जनता न तो 10लाख नौकरियों के बहकावे में आई न ही ‘एंटी इंकम्बेंसी’ का बुखार चढ़ा। यहां तक कि वरिष्ठ नेता रामविलास पासवान की मृत्यु से सहानुभूति की लहर भी नहीं दौडी। राजग गठबंधन के विकास और बिहार को बेहतर राज्य बनाने के मुद्दे पर ही जनता ने अपनी मुहर लगाई और एक बार फिर नितीश बाबू के हाथ सत्ता की डोर थमा दी। भाजपा ने भी नितीश कुमार को ही मुख्य मंत्री बनाने के अपने वादे को निभाया, जबकि सीटें भाजपा की अधिक थीं। हालांकि भाजपा ने अपना उपमुख्यमंत्री बदल दिया।

चुनाव जीतकर फिर से सत्ता में आई नितीश सरकार के सामने अब चुनाव में किए गए विकास के वादों को पूर्ण करने की बडी जिम्मेदारी है। बिहार से बडी संख्या में देश के विभिन्न राज्यों में मजदूर मजदूरी के लिए बाहर जाते हैं। कोरोना के कारण ये मजदूर बिहार वापिस आ गए हैं। इन्हें बिहार में ही रोजगार दिलाने के लिए एक विस्तृत कार्य योजना तैयार करनी होगी। साथ ही विजय के मुख्य आधार बने युवाओं के लिए भी विभिन्न स्तरों पर रोजगार निर्माण करने होंगे। बिहार अभी भी साक्षरता और उद्योगों की दृष्टि से पिछडा राज्य माना जाता है। बिहार की इस छवि को बदलने का दारोमदार भी बतौर मुख्य मंत्री नितीश कुमार पर होगा।

यह भी देखना काफी दिलचस्प होगा कि नितीश कुमार सूबे में शराबबंदी के अपने फैसले पर कितना अमल रख पाते हैं। यह बात किसी छिपी नहीं है कि जब सरकार वैध रूप से शराब बेचनी बंद कर देती है तो वही शराब अवैध रूप से अधिक दामों पर बेची जाती है। वैध रूप से शराब बेचने पर सरकार को जो सीधी कमाई होती है वह शराबबंदी से बंद हो जाएगी जिसका सीधा असर सरकार की आय पर पडेगा। वहीं दूसरी ओर अवैध रूप से शराब बिक्री के कारण अन्य अपराधों में भी बढ़ोत्तरी होने की आशंका बढ़ जाएगी। नितीश सरकार के लिए ये दुधारी तलवार की तरह होगा। एक तो सरकार को शराब विक्री से मिलने वाली आय की भरपाई कहीं ओर से करनी होगी और दूसरी ओर अवैध शराब विक्री और अपराधों पर नियंत्रण भी रखना होगा।

जनता से फैसले को नितीश सरकार किस तरह सही ठहराएगी यह तो भविष्य में पता चलेगा ही, परंतु जनता को भी अब केवल विकास, सुशासन और सुव्यवस्था जैसे मुद्दों पर ही अपना मत देने की आदत को कायम रखना होगा। कुछ ही महीनों में प. बंगाल में भी चुनाव होने वाले हैं। प. बंगाल की अपने अलग चुनावी मुद्दे हैं। परंतु राज्य का सही मायनों में विकास ही मतदाताओं के विचारों का प्रमुख केंद्र बिंदु होगा तो ही वहां सही सरकार आ सकेगी।

 

 

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