जम्मू-कश्मीर समस्या तथा संयुक्त राष्ट्र संघ

यह प्रश्न आज भी विवादास्पद है कि भारत सरकार जम्मू-कश्मीर पर 1947 में पाकिस्तान के आक्रमण के प्रश्न को संयुक्त राष्ट्र संघ में लेकर क्यों गयी? इसके माध्यम से सरकार क्या प्राप्त करना चाहती थी और इस पूरे प्रकरण में संयुक्त राष्ट्र संघ भारत की क्या सहायता कर सकता था? आम तौर पर किसी तीसरे मध्यस्थ के पास कोई भी देश तब जाता है, जब उसे लगता है कि वह अपने बलबूते आक्रमणकारी शत्र्ाु को हटा नहीं सकता। ऐसी विवशता की स्थिति में कमजोर देश किसी तीसरे देश से सहायता मांगता है या फिर न्याय के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के पास शिकायत दर्ज करवाता है। लेकिन 1947‡48 के आक्रमण के समय क्या भारत की स्थिति ऐसी थी? 22 अक्तूबर 1947 को जम्मू कश्मीर पर पाकिस्तान का कबायलियों के माध्यम से आक्रमण शुरू हुआ और 27 अक्तूबर को भारतीय सेना श्रीनगर पहुंच गयी थी। उससे पहले भी राज्य के सेना बल ने, खासकर सेना के मुखिया राजेन्द्र सिंह ने अतुलनीय बलिदान देकर पाकिस्तानी सेना के दिश-निर्देशों में आगे बढ़ रहे कबायलियों की गति को मद्धम कर दिया था। भारतीय सेना ने जल्दी ही पूरी कश्मीर घाटी को शत्र्ाु के कब्जे से मुक्त करवा लिया था। लद्दाख की ओर बढ़ रही टुकड़ियों को भी भारतीय सेना ने रोक दिया था। जम्मू के क्षेत्रों को पाकिस्तान के कब्जे से खाली करवाया जा रहा था। ऐसी स्थिति में संयुक्त राष्ट्र संघ में शिकायत करने की क्या जरूरत थी और उससे किस उद्देश्य की पूर्ति होने वाली थी और सबसे बढ़कर संयुक्त राष्ट्र संघ भारत की क्या सहायता कर सकता था?

मोतीलाल सीतलवाड़ ने अपनी आत्मकथा में इसके सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी दी है। सीतलवाड़ भारत का पक्ष प्रस्तुत करने के लिए लेक सक्सैस गये थे। उनका कहना है कि सरदार पटेल चाहते थे कि पूरी रियासत को आक्रमणकारियों से खाली करवा लिया जाये। लेकिन दूसरा ग्रुप इसके लिए तैयार नहीं था। दूसरे ग्रुप का यहां अर्थ पंडित नेहरू से ही है। भारतीय सेना का मत भी पूरे राज्य को आक्रमणकारियों से खाली करवाने का ही था। लेकिन यह सारी बहस राज्य को आक्रमणकारियों से कब और कैसे खाली करवाना है, इसको लेकर ही चल रही थी और इसमें मतभेद होना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं थीं। परन्तु असली प्रश्न यह है कि इसमें संयुक्त राष्ट्र संघ में जाने की बात कहां से आयी और यह किसकी साजिश थी? सीतलवाड़ ने इसका संकेत भी अपनी आत्मकथा में दिया है। उनके अनुसार यह सुझाव लॉर्ड माउंटबेटन ने दिया था। माउंटबेटन भारत के अन्तिम वायसराय और पहले गवर्नर जनरल थे। यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि माउंटबेटन पहले दिन से ही जम्मू कश्मीर के पाकिस्तान में जाने के पक्ष में थे। रियासत के भविष्य को लेकर महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरु श्रीनगर जाकर महाराजा को मिलना चाहते थे। लेकिन मांउंटबेटन ने अत्यन्त ही चालाकी से उन्हें जाने से रोका और 18 जून 1947 को स्वयं श्रीनगर पहुंच गये। वे वहां पांच दिन रहे और उन्होंने महाराजा को पाकिस्तान में शामिल होने के लिए मनाने की पूरी कोशिश की। यहां तक कि माउंटबेटन बहुत ही होशियारी से सरदार पटेल से यह आश्वासन भी ले गये थे कि यदि महाराजा पाकिस्तान में शामिल हो जाते हैं तो भारत आपत्ति नहीं करेगा। माउंटबेटन महाराजा को यह आश्वासन भी बताते रहे। लेकिन महाराजा हरि सिंह ने पाकिस्तान में शामिल होने से इंकार कर दिया। यहां तक कि अन्तिम दिन तो महाराजा ने माउंटबेटन से मिलने से ही इंकार कर दिया। तब तक मांउंटबेटन वायसराय ही थे। उन्हेंमिलने से इंकार करने की हिम्मत महाराजा ही कर सकते थे। पन्द्रह अक्तूबर 1947 को मेहरचंद महाजन जम्मू-कश्मीर के प्रधानमन्त्री बने। उन्हें भी माउंटबेटन ने यही कहा कि कश्मीर पाकिस्तान को जाना चाहिए। लेकिन माउंटबेटन के दुर्भाग्य से जम्मू-कश्मीर भारत में मिल गया था। उसे प्राप्त करने के लिए पाकिस्तान ने रियासत पर हमला कर दिया था। भारत की सेना रियासत को इस कब्जे से मुक्त करवा रही थी। ऐसी परिस्थिति में माउंटबेटन ने संयुक्त राष्ट्र संघ में जाने की चाल चली। क्योंकि माउंटबेटन अच्छी तरह जानते थे कि अब संयुक्त राष्ट्र ही इस मसले को उलझा सकता है, अन्यथा भारतीय सेना सारी रियासत को पाकिस्तान से खाली करवा कर ही दम लेगी।

सबसे बड़ी बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र को बने भी अभी तीन साल ही हुए थे। अत: यह संस्था किस प्रकार काम करेगी, इसका कोई रिकॉर्ड हमारे पास नहीं था। मोटे तौर पर यह स्पष्ट होने लग गया था कि संयुक्त राष्ट्र संघ अन्तरराष्ट्रीय राजनीति का एक नया आसन बन गया था, जिस पर बैठकर विभिन्न देश अपने अपने राष्ट्रीय हितों के लिए शतरंज की बाजी खेलते थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जो जबर्दस्त शीत युद्ध शुरू हुआ था, उसमें अमेरिका व रूस के दो खेमे स्पष्ट ही स्थापित हो गये थे। संयुक्त राष्ट्र में निर्णय गुण-दोष के आधार पर नहीं, बल्कि हर देश की अपनी कूटनीति के हिसाब से होते थे। यदि संयुक्त राष्ट्र कोई न्यायालय होता, तब भी जम्मू-कश्मीर के प्रश्न को किसी सीमा तक वहां ले जाने की बात समझ में आ सकती थी। लेकिन संयुक्त राष्ट्र तो शुद्ध रूप से एक राजनैतिक संस्था थी। इसलिए इस प्रकार का संवेदनशील मामला किसी बाहरी राजनैतिक संस्था के पास ले जाने की जरूरत क्या थी? सीतलवड़ के ही शब्दों में, ‘‘सरकार समझती थी कि सुरक्षा परिषद किसी न्यायालय की तरह कार्य करेगी, जिसमें प्रमाण के आधार पर किसी केस में निर्णय दिया जाएगा। लेकिन मैंने उनको बताया कि सुरक्षा परिषद शुद्ध रूप से राजनीति के आधार पर निर्णय करती है और किसी पक्ष का गुण-दोष न देख कर राजनैतिक हितों के हिसाब से ही मध्यस्थता करती है।’’ इसका एक संकेत तो स्पष्ट है कि सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली के बारे में नेहरू अन्धेरे में थे। लेकिन इसके बाबजूद वे मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जा रहे थे। संयुक्त राष्ट्र में ले जाने वाली शिकायत एन. गोपालस्वामी आयंगर ने तैयार की थी। आयंगर एक सुलझे हुए प्रशासक थे। उन्होंने ब्रिटिश सरकार में मद्रास सिविल सर्विस से अपना कार्य शुरू किया था और वहां जिलाधीश या उपायुक्त के पद तक पहुंचे थे। 1935 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सी.आई.ई. की उपाधि से और दो वर्ष बाद ही सी.एस.आई. की उपाधि से अलंकृत किया था। 1941 में अंग्रेज सरकार ने उन्हें नाईटहुड की उपाधि से विभूषित किया था। जिस समय अंग्रेज सरकार ने 1930‡31 में महाराजा हरि सिंह के विरुद्ध मुस्लिम साम्प्रदायिकता को उभार कर दंगे करवाये थे और शेख अब्दुल्ला का नेतृत्व स्थापित किया था, उसके बाद महाराजा ने अंग्रेज सरकार के दबाव में ब्रिटिश अधिकारी कोलविन को राज्य का प्रधानमन्त्री नियुक्त किया था। लेकिन जब अंग्रेज सरकार महाराजा से गिलगित लीज पर लेने में कामयाब हो गयी तो कोलविन का काम खत्म हो गया और वह वापस चला गया तो महाराजा ने गोपालास्वामी आयंगर को नया प्रधानमन्त्री बनाया था। रियासत के भारत में विलय के बाद, नेहरू ने जम्मू-कश्मीर का प्रश्न सरदार पटेल के रियासती मन्त्रालय से छीनकर अपने पास ले लिया तो गोपालस्वामी आयंगर को ही बिना विभाग का मन्त्री बना कर कश्मीर का मामला देखने के लिए कहा था । इन्ही आयंगर साहब ने सीतलवाड़ के अनुसार संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की शिकायत तैयार की थी।
लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है। आखिर शिकायत की ही क्यों गयी। यदि पाकिस्तान को जम्मू कश्मीर राज्य के भारत में अधिमिलन पर आपत्ति थी तो शिकायत पाकिस्तान करता। उसने तो शिकायत की नही, भारत, जिसको इसकी कोई जरूरत नहीं थी, वह लेक स्कसैस की ओर क्यों भागा? इसको समझने के लिए बीच के एक और घटनाक्रम को समझना बेहतर होगा। जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान का आक्रमण 22 अक्तूबर 1947 को हुआ। 26 अक्तूबर को रियासत का भारत में विलय हो गया। महाराजा हरि सिंह ने भारत से हथियारों की मांग अक्तूबर के शुरू से ही की हुई थी। सरकार ने हथियार भेजने का निर्णय ले लिया था। परन्तु सेना के सेनापति व अन्य प्रमुख अधिकारी अभी दोनों ओर अंग्रेज ही थे। उन्होंने जम्मू-कश्मीर को हथियार जाने नहीं दिये। लार्ड माउंटबेटन इस बात को जानते थे। वे जानते थे कि महाराजा की सेना का मुस्लिम हिस्सा पाकिस्तानी आक्रमणकारियों से मिल चुका है। शेष सेना पाकिस्तानी आक्रमणकारियों का मुकाबला भला क्या कर पाएगी। क्योंकि माउंटबेटन का मत था, कि मुसलमान हर दृष्टि से हिंदुओं से बहादुर योद्धा हैं। शायद वे सोच रहे थे कि पाकिस्तान के ये ब्रेवर फाईटर्स, भारतीय सेना के पहुंचने से पहले‡पहले ही सारी रियासत पर कब्जा कर लेंगे और बाद में बर्फबारी के कारण भारतीय सेना का घाटी में पहुंच पाना ही सम्भव नहीं होगा। इस प्रकार जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान को मिल जाएगा। लेकिन माउंटबेटन के दुर्भाग्य से 26 अक्तूबर की रक्षा परिषद की बैठक में, जिसकी अध्यक्षता वे खुद कर रहे थे, यह भेद खुल गया और सरदार पटेल की योजना से भारतीय सेना श्रीनगर पहुंच गयी और उसने घाटी को आक्रमणकारियोें से खाली भी करवाना शुरू कर दिया। अब इसे रोकने का एक ही उपाय हो सकता था कि किसी भी तरह मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में पहुंचा दिया जाये, नहीं तो सारी रियासत भारत के पास आ जाएगी।

माउंटबेटन ने नेहरू को मामला संयुक्त राष्ट्र में ले जाने की सलाह दी। सरदार पटेल जानते थे कि माउंटबेटन नेहरू को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने के लिए मना रहे हैं। सरदार पटेल इसके पक्ष में नही थें। सीतलवाड़ के अनुसार माउंटबेटन तो चाहते थे कि भारत और पाकिस्तान दोनों मिल कर संयुक्त राष्ट्र को निवेदन करें। इसका अर्थ होता कि भारत ने रियासत के भारत में अधिमिलन को ही अस्वीकार कर दिया है। भारत इसके लिए तैयार नहीं हुआ। इसकी बजाय भारत ने एक जनवरी 1948 को स्वयं ही संयुक्त राष्ट्र में शिकायत लगायी। नेहरू को शायद संयुक्त राष्ट्र की न्यायप्रियता में विश्वास था। वे विश्व शान्ति के लिए स्थापित इस नयी संस्था की साख बढ़ाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने माउंटबेटन की सलाह स्वीकार कर ली। भारत ने संयुक्त राष्ट्र से प्रार्थना की कि पाकिस्तान आक्रान्ता है, उसे भारतीय क्षेत्र से घुसपैठियों को निकाल बाहर करने के लिए कहा जाये। पाकिस्तान से यह भी कहा जाये कि वह कबायलियों को रियासत पर आक्रमण करने के लिए अपने क्षेत्र का उपयोग न करने दे।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ की निष्पक्षता और न्यायप्रियता पर विश्वास किया। लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने भारत के इस विश्वास के साथ विश्वासघात किया। सुरक्षा परिषद मानों इस शिकायत का इंतजार ही कर रही थी। सुरक्षा परिषद ने, पाकिस्तान को आक्रमणकारियों की सहायता करने से रोकने हेतु बाध्य करने की बजाय जम्मू-कश्मीर में, विलय को लेकर लोगों की राय कैसे और कब जानी जाये, इस पर सारा ध्यान केन्द्रित कर दिया। भारत, लोगों की राय जानने के तरीके समझने के लिए लेक स्कसैस नहीं गया था। लोगों की राय कब और कैसे जानी जाये यह विषय केन्द्र और राज्य सरकार के बीच था, क्योंकि रियासत का वैधानिक रीति से भारत में अधिमिलन हो गया था। राज्य के दोनों मुख्य राजनैतिक दल, शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में नेशनल कान्फ्रेंस और पंडित प्रेमनाथ डोगरा के नेतृत्व में प्रजा परिषद, लोगों की राय जानने के मामले में संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप का विरोध कर रहे थे। लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने भारत की मूल शिकायत को दर किनार कर दिया और रियासत के भारत में विलय पर ही बहस करनी शुरू कर दी। दरअसल संयुक्त राष्ट्र द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शीत युद्ध का नया अखड़ा बन गया था। उस पर उस समय अमेरिकी‡ब्रिटिश धुरी का वर्चस्व था। इंग्लैण्ड के प्रतिनिधि ने तो संयुक्त राष्ट्र में स्पष्ट ही पाकिस्तान समर्थक रुख अख्तियार कर लिया था। उधर जम्मू-कश्मीर का प्रश्न संयुक्त राष्ट्र के हवाले करने के बाद माउंटबेटन जून 1948 को अपने देश वापस चले गये। वे अन्त तक इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में पहुंचा देने को अपनी उपलब्धि मानते रहे। लेकिन नेहरू संयुक्त राष्ट्र के पक्षपाती रवैये से बहुत निराश हुए। पाकिस्तान के आक्रमण या उस आक्रमण में सहायता के प्रश्न को संयुक्त राष्ट्र ने बहुत चालाकी से भारत-पाकिस्तान विवाद के प्रश्न में बदल दिया।

इन सब के बाबजूद, भारत संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका को स्वीकारने के लिए तैयार था। भारत का एक ही उद्देश्य था कि राज्य में शान्ति होनी चाहिए और पाकिस्तान द्वारा बल प्रयोग को रोका जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र ने भारत‡पाक संयुक्त राष्ट्र आयोग की स्थापना की, जिसके पांच सदस्य थे, भारत ने इसे भी स्वीकार किया। आयोग ने भारत और पाकिस्तान में आने के बाद मौके पर मुआयना किया। आयोग को पता चला कि मई 1948 से पाकिस्तान की सेना की तीन ब्रिगेड जम्मू कश्मीर में अनधिकृत रूप से विद्यमान है, जिसे पाकिस्तान ने सुरक्षा परिषद से छिपाए रखा था। आयोग ने 13 अगस्त 1948 को एक लम्बा प्रस्ताव पारित किया, जिसके तीन हिस्से थे। मोटे तौर पर इस प्रस्ताव के पहले हिस्से के अनुसार दोनों देशों को तुरन्त युद्ध विराम की घोषणा करनी थी और दूसरे हिस्से के मुताबिक पाकिस्तान को जम्म-कश्मीर से अपनी सेना और कबायलियों को वापस बुलाना था और तीसरे हिस्से के मुताबिक दोनों देशों को इस बात की घोषणा करनी थी कि राज्य का भविष्य लोगों की इच्छा से तय किया जाएगा और दोनों देश आयोग से विचार-विमर्श करेंगे कि लोगों की इच्छा जानने की निष्पक्ष पद्धति क्या हो सकती है। जिस समय यह प्रस्ताव पारित हुआ उस समय भारत की सेना पाकिस्तान द्वारा बलपूर्वक कब्जा किये गए क्षेत्रों को खाली करवा रही थी और जल्दी ही सारा राज्य पाकिस्तानी सेना से मुक्त करवाया जा सकता था। भारत की सेना भी इस पक्ष में ही थी कि राज्य को आक्रमणकारियों से मुक्त करवा लेने के बाद ही बातचीत शुरू की जाये। लेकिन इसके बाबजूद भारत ने संयुक्त राष्ट्र पर विश्वास करते हुए प्रथम जनवरी 1949 के युद्ध विराम की घोषणा कर दी। उस समय रियासत का लगभग एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे मेंथा। भारत और पाकिस्तान ने उन सिद्धान्तों पर रजामन्दी भी व्यक्त कर दी, जिनके अनुसार राज्य में लोगों की इच्छा का निर्धारण किया जाएगा और इसकी विधिवत सूचना भी आयोग को दे दी। युद्ध विराम की घोषणा के बाद आयोग ने दूसरा प्रस्ताव 5 जनवरी 1949 को पारित किया, जिसमें दोनों देशों द्वारा आपसी सहमति के बिन्दुओं पर सन्तोष प्रकट किया गया। लेकिन आयोग का यह सन्तोष ज्यादा देर तक कायम नहीं रह सका, क्योंकि पाकिस्तान ने 13 अगस्त के प्रस्ताव के अनुरूप जम्मू-कश्मीर में बलपूर्वक कब्जा किये गए क्षेत्रों को खाली करने से इनकार कर दिया। जब तक पाकिस्तान आयोग के इस प्रस्ताव को क्रियान्वित नहीं करता, तब तक संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में लोगों की इच्छा जानने के तौर तरीकों पर बात करना व्यर्थ ही था। पाकिस्तान के इस रवैये के बाबजूद सुरक्षा परिषद ने पाकिस्तान पर कोई कार्यवाही नहीं की। न तो उसे आक्रान्ता घोषित किया और न ही उसकी सेना को भारत के इस हिस्से से बाहर निकालने के लिए कोई पग उठाया।

इसके विपरीत सुरक्षा परिषद ने भारत-पाक संयुक्त राष्ट्र आयोग को समाप्त कर उसके स्थान पर मध्यस्थता के लिए अपने एक सदस्यीय प्रतिनिधि नियुक्त करने शुरू कर दिये। डिक्सन, फ्रैंक ग्रहम और गुन्नार जारिंग इसी क्रम में नियुक्त हुए, लेकिन ताज्ज्ाुब है कि रियासत के कब्जाये क्षेत्र पाकिस्तान से खाली करवाने की ओर सुरक्षा परिषद ने या उसके प्रतिनिधियों ने कोई ध्यान नहीं दिया, जबकि इसी काम के लिए भारत लेक स्कसैस में गया था। अलबत्ता सुरक्षा परिषद ने एक काम अवश्य किया, जिसका उसे चार्टर की धारा 35 के अन्तर्गत कोई अधिकार नहीं था, उसने 30 मार्च 1951 को भारत-पाक संयुक्त राष्ट्र सेना निरीक्षण समूह की स्थापना कर दी, जिसके कार्यालय युद्ध विराम रेखा के दोनों ओर स्थापित किये जाने थे। इस समूह को युद्ध विराम रेखा की निगरानी करनी थी। जाहिर है संयुक्त राष्ट्र भारत की मूल शिकायत को दरकिनार कर, जम्मू-कश्मीर को ब्रिटिश‡अमेरिकी कूटनीति का अड्डा बनाने की कोशिश कर रहा था। पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र के इन प्रस्तावों के अनुरूप जम्मू कश्मीर के अधिक्रान्त क्षेत्र खाली नहीं कर रहा था और उधर अमेरिका ने पाकिस्तान को हथियारों की सप्लाई करना शुरू कर दिया तो नेहरू को भी कहना पड़ा कि अब संयुक्त राष्ट्र को लोगों की राय जानने के प्रश्न पर सलाह देने का नैतिक अधिकार भी नहीं रह गया है।

आखिर भारत जम्मू-कश्मीर के लोगों को संयुक्त राष्ट्र की आपसी राजनीति के कारण, अनन्त काल तक लोकतान्त्रिक अधिकारों से वंचित तो नहीं रखा जा सकता था। लोगों की राय जानने के लिए और लोकतान्त्रिक संविधान की रचना करने के लिए, संघीय संविधान की धारा 370 के अनुसार राज्य में 15 अक्तूबर को वयस्क मताधिकार के आधार पर संविधान सभा का गठन किया गया। ताज्ज्ाुब है कि जो सुरक्षा परिषद लोगों की राय जानने को इतना महत्व दे रही थी, वही संविधान सभा के गठन का विरोध करने लगी। 1948 से लेकर 1971 तक संयुक्त राष्ट्र ने जम्म-कश्मीर पर 23 प्रस्ताव पारित किये। 1965 के भारत-पाक युद्ध के उपरान्त दोनों देशों में ताशकंद समझौता हुआ, जिसमें दोनों देशों ने आपसी सभी मसले द्विपक्षीय वार्ता से सुलझाने का संकल्प लिया। 1972 के शिमला समझौता और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी और नवाज शरीफ की लाहौर घोषणा के बाद तो संयुक्त राष्ट्र की भूमिका बिल्कुल समाप्त हो गयी। भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र से अपना सेना निरीक्षण समूह हटा लेने के लिये कहा, क्योंकि अब भारत-पाक में युद्ध विराम रेखा समाप्त हो गयी थी। यह समूह इसी रेखा के निरीक्षण के लिए नियुक्त किया गया था। शिमला समझौते के बाद दोनों देशों के बीच अब वास्तविक नियंत्रण रेखा स्थापित हो गयी थी। भारत सरकार ने इसके बाद इस समूह को कार्यालय और परिवहन सुविधा देना तो जारी रखा, लेकिन इससे संवाद स्थापित करना बन्द कर दिया। 1990 के बाद अमेरिका ने भी, लोगों की राय का पहाड़ा पढ़ना बन्द कर दिया। उसके बाद कहना शुरू कर दिया कि यह प्रश्न द्विपक्षीय बातचीत से ही सुलझाया जाना चाहिए। 2004 में संघ के महासचिव कौफी अन्नान ने दोनों देशों को अपना मसला अपासी बातचीत से सुलझाने के लिए कहा। अक्तूबर 2010 में संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने स्पष्ट कर दिया कि संघ जम्मू-कश्मीर के प्रश्न पर दखलंदाजी नहीं करेगा, जब तक दोनों देश यह मांग नहीं करते। कहा जाता है कि सरदार पटेल अपनी मृत्यु से पहले यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि क्या भारत संयुक्त राष्ट्र से अपनी शिकायत वापिस ले सकता है? कालान्तर में यह शिकायत पाकिस्तान द्वारा 13 अगस्त 1948 और 5 जनवरी 1949 के प्रस्तावों को न मानने और 1965 में रियासत पर कब्जा करने के लिए, एक बार फिर 1947 के तरीके को ही दोहराने के कारण स्वयं ही अप्रासंगिक हो गयी और मुर्च्छित अवस्था में चली गयी। संयुक्त राष्ट्र में अब इस शिकायत की स्थिति आर्काइव में पड़े दस्तावेज से ज्यादा नहीं है, इसे संयुक्त राष्ट्र भी जानता है और पाकिस्तान भी।

लेकिन संयुक्त राष्ट्र तक जाने के इस सारे काण्ड मे लार्ड माउंटबेटन की क्या भूमिका थी? माउंटबेटन को विश्वास था कि एक बार लेक सक्सैस पहुंच जाने पर लोगों की राय जानने का प्रश्न दिल्ली और श्रीनगर का आपसी प्रश्न न रह कर संयुक्त राष्ट्र के नियंत्रण में आ जाएगा। उसके बाद उनको विश्वास था कि जनमत में पाकिस्तान जीत जाएगा और राज्य पाकिस्तान में चला जाएगा। संयुक्त राष्ट्र ने तो जो कुछ किया, उनके विश्वास के अनुसार ही किया, लेकिन आगे उनके अपने ही शब्दों में, मैंने लियाकत अली खान (पाकिस्तान के उस समय के प्रधानमन्त्री) से कहा कि तुम कबायलियों को हटा लो तो लोगों की राय लेने के बाद कश्मीर पाकिस्तान को मिल ही जाएगा। लेकिन वह नहीं माना। उससे ऐसी मूर्खता की मुझे आशा नहीं थी। लोगों की राय जानने के बाद कश्मीर पाकिस्तान को मिलता या नहीं, यह विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन लार्ड माउंटबेटन यह विषय संयुक्त राष्ट्र में किस उद्देश्य से ले गये थे, यह अपने आप स्पष्ट हो जाता है।

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