हर युग में सावित्री अत्याधुनिक रहेगी

पुराआख्यानो ं में स्त्री-सत्ता के अनेक शिखर-सन्दर्भ हैं । आज अपसंस्कृति, बाजारवाद, भूमण्डलीकरण, नारी मुक्ति आन्दोलन और स्त्री-विमर्श के वितंडावाद में हमारा आदर्श छूटता चला जा रहा है। प्रगतिशीलता की दौड़ में भविष्य की चिन्ता तो है, मगर प्रेरणा देने में समर्थ अतीत अगर उपेक्षित होता है तो वर्तमान को विश्व शृंखला होने से कोई नहीं रोक सकता।

लोक और परम्परा को अंतरंगता में समाहित करने वाली लब्ध प्रतिष्ठित कथाकार मृदुला सिन्हा की सर्जनात्मकता के आयाम बड़े और उदात्त हैं। उनका लेखन सकारात्मकता को जीवन के परिप्रेक्ष्य में नयी भंगिमाओं के साथ प्रस्थापित करता है। विशेष रू प से घर-परिवार, संस्कार-संस्कृति, व्यक्ति-समाज, जीवन-सौन्दर्य प्यार-करुणा जैसे विषयों को। जीवन की सहज गति और चित्त की निर्मलता बनी रहे, स्त्री-पुरुष की युगलबन्दी हरियाली और ताजगी के राग प्रसारित करती रहे, समृद्ध परम्परा और संस्कृति की विरासत सम्भाले पी़िढयां आदर्श के प्रतिमान स्थापित करती रहे, अपनी-अपनी सत्ता में जीते हुए सब एक-दूसरे की शक्ति को उजागर करते हुए व्यापक सन्दर्भों में उसका सदुपयोग करते रहें- इन्हीं महत्त्वपूर्ण भावों को सहेजकर लोक संवेद्य प्रसंगों को अपने लेखन और चिन्तन में मृदुला सिन्हा विस्तार देती हैं। सीता पुनि बोली, घरवास, ज्यों मेंहदी को रंग, नयी देवयानी, अतिशय, उपन्यास शृंखलाओं में प्रस्तुत विजयिनी उपन्यास भाषा की संप्रेषणीयता और विषय की लोकप्रियता के साथ पाठक को तदाकृत कर लेने की अकूत क्षमता से भरा हुआ है।

कथाकार समय से संपृक्त हो जाती है। चरित्र को आत्मसात करती है। परिवेश उनके आस-पास प्रतिध्वनित होने लगता है। सावित्री-सत्यवान के समय को मृदुला सिन्हा तल्लीनता से जीती हैं, तभी तो कथा के सारे तत्व जीवन्तता के साथ संवादरत होते हैं। सटीक शब्द चयन और सन्दर्भ संवेदित भाषा की चिन्ता ब़डे रचनाकार की विशिष्टता होती है। मृदुला सिन्हा उपयुक्त शब्दों के प्रयोग के लिए अलग से हिंदी परिद़ृश्य पर समाद़ृत होती है। शब्दों के पीछे आस्था और ईमानदारी की ताकत होती है, उसी का प्रभाव अन्तर्मन पर प़डता है। आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया यह उपन्यास एक ब़डी लेखिका की संवेदना, सजगता तथा कथ्य संरचना को भी उजागर करता है। सावित्री को लोकोपवाद झेलना प़डता है। किसी सन्दर्भ के सत्य की तह तक गये बिना ही लोग बे सिर पैर की बातें करते हैं। किसी की निष्ठा, आस्था, दुरुता और चरित्र-शक्ति को नहीं जान-समझ कर लोग अपने स्वभावनुकूल ऐसी बातें ग़ढ लेते हैं, जिनमें निन्दा ज्यादा होती है। सीता की तरह सावित्री को भी सतीत्व की परीक्षा देनी प़डी। उसे भी स्वयं को निश्कलंक और सती साबित करना था। कथाकार उसके संवाद के माध्यम से गोपन अतीत सन्दर्भ विशेष को प्रस्तुत करती हैं। भाषा सजग लेखिका सावित्री के कथन के माध्यम से सत्य संपादन के लिए शब्द चिन्ता करती हैं- ‘मेरी चिन्ता यही है कि मैं उस प्रसंग को विश्वसनीय बनाने के लिए किन शब्दों का प्रयोग करूं गी।… आप वाणी की देवी से प्रार्थना करें वे मेरी जीहृा पर विराजमान हो जाएं। मैं जो कहूं उसे मृत्युलोक के रहने वाले लोग सत्य मानें, बस।‘ कथाकार की लेखनी से उपयुक्त शब्द धारा-प्रवाह सहजता के साथ निस्तृत हुए हैं। संघटना में डूबे बिना यह सामर्थ्य नहीं आ सकती है। वाणी सिद्ध, शब्द सजग, समय सचेत ब़डी लेखिका हैं मृदुला सिन्हा। – ‘बोलने के पूर्व अपने शब्दों को मन की टकसाल पर ढालना चाहिए। जो शब्द वहां खरे उतरें, वही बाहर आयें। शब्द बह्म हैं। इन्हें बर्बाद नहीं करना चाहिए। ‘मर्यादा में रहने वाली तथा स्वतंत्र आत्मिक उदात्त सत्ता की स्वामिनी सावित्री स्त्री अस्मिता की विराट पहचान है, आदर्श भी। उसके व्यक्तित्व में कोई संकुचन नहीं, फैलाव है। पुरुष सतात्मक समाज में स्त्री-शक्ति अपने ओज और ग्ाुण विशेष से हर काल में अपनी महत्ता स्थापित करती रही हैं। ब़डे व्यक्तित्व से जु़डी अनेक किंवदन्तियां और भ्रान्तियां होती हैं। स्त्री को ज्यादा ही झेलना प़डता है। सावित्री के लोकाक्षेप को कथाकार ने तर्कपूर्णऔर समीचीन उत्तर से निर्द्वन्द्व किया है। युगानुरूप समाजोपयोगी तथा सांस्कृतिक प्रसंगों को प्रभावशाली ढंग से आकार दिया है। ‘बेटी बचाओ सृष्टि बचाओ‘‘ जैसे नारों पर भारी प़डने वाली यह औपन्यासिक कृति लोकविश्रुत जन-सांस्कृतिक परिद़ृश्य की सुप्रसिद्ध गाथा के माध्यम से बेटी के मान-सम्मान और गौरव को आत्मविश्वासी और पूर्ण मानवी ढंग से रूपायित और व्याख्यायित करती है। कथा शैली रोचक, आकर्षक और विमुग्धकारिणी है। ‘बेटी की सुगंध ही भिन्न होती है, मन को मोहने वाली’ – यह महज सामान्य वाक्य नहीं, आस्था की दीप्ति है। कथन भर नहीं, मर्म की अकथ संस्कृति है। सृजन, संवेदना, प्यार और प्रकृति की साक्षात विग्रह होती है स्त्री। धरती की तरह जीवनधार और सर्वसहा तथा कल्याणकारिणी, निरन्तर सृजन यात्रा करती हरियाली और प्राण सहेजती। आज पुरुषों को पीछे छो़डने की जिद और होड़ में स्त्री अपनी प्रकृति सहजता से छो़डती जा रही है। चकाचौंध में दिग्भ्रमित हो मर्यादा संस्कृति की सुगंध से विलग हो रही है। स्वर्णाभूषणों तथा अन्य रत्नाभूषणों से कृत्रिम शृंगार-सुसज्जित हो वह अभिमान से इठला रही है, जबकि उसके नैसर्गिक सौन्दर्य को दैदीप्यमान करने के लिए प्रकृति रंग-बिरंगे फूलों को उपहार लिए तत्परता से सदा ख़डी है। उपन्यास में सौन्दर्य और आनन्द का सात्विक भाव निरूपित है। विस्मृति के गर्त में डूब रही स्त्री-शक्ति को संचेतना की तीव ऊर्जा से झंकृत करती यह कृति अराजक समय में नितान्त अनिवार्य कथाक्षेप है।

उपन्यास में पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का कुशल मिश्रण है। दांपत्य जीवन की सुद़ॄढता के अमृत तत्व हैं। प्रेम की सार्वभौम शक्ति है। एकल परिवार की फै शन परस्त स्वार्थपूर्ण धरणा के विरुद्ध संयुक्त परिवार की परस्पर प्रेम संपृक्त साझा संस्कृति और सत्ता है। परिवार की एकसूत्रता के लिए उदारतापूर्ण व्यवहार और प्रेमाचरण की अनिवार्यता चाहिए ही। इसके लिए पी़िढयों के बीच संवाद जरूरी है। पति-पत्नी के बीच का विश्वास बना रहे, यह तभी सम्भव है जब व्यवहारगत पारदर्शिता बनी रहेगी। पति-पत्नी के अन्तरवेग और भावावेश को स्वाभाविक रूप से विश्वास के परिवेश में कथाकार ने प्रकट किया है। परिवार कभी टूटे नहीं, इसके लिए बुजुर्ग की अनुभव सिद्ध पहल जारी रहे, ऐसा वातावरण बनाए रखने के लिए कथाकार ने जोर दिया है। वयोवृद्ध सावित्री-सत्यवान अपने संततियों से निरन्तर संवादरत रहते हैं। ब़डी पारिवारिक संख्या के बीच भी सामंजस्य बनाये रखने में उनकी महती भूमिका है। चार पी़िढयां एक साथ मिल-बैठकर अपने कुल पर गौरवान्वित होती हैं- यह अतुलनीय सुख है। इसका स्वाद कथानक के माध्यम से पाठक करता है और साझेपन का आनन्द अनुभूत करता है। पूरे परिवार को एक सूत्र में बांधे रखने का दायित्व निर्वहन बुजुर्ग सावित्री-सत्यवान कुशलता से करते हैं। उनके बीच संवाद-संस्कृति विकसित करना और बनाये रखना उनका सहज कर्त्तव्य है। विराट प्रकृति के साथ पारिवारिक जीवन की संयुक्ति का आत्मीय दर्शन सावित्री की पौत्री सुराणा सहज संवाद में उजागर करती है- ‘पितामही! हमारे पितामह को हमसे अधिक पे़ड-पौधों, फूल-पत्तियों से लगाव है।…सात यशस्वी राजाओं के पिता हैं हमारे पितामह। तीन सुपुत्रियां भी किसी न किसी राजा की रानियां। नब्बे नाती-पोते, परपोते-परपोतियां हैं; पर हमारे पितामह को हमसे अधिक वन में उगे पे़ड-पौधों की सुरक्षा और उनके फलों का ध्यान रहता है। उन्होंने हमें भी यही सिखाया है कि हम पे़ड-पौधों से बातें करते रहें। उनकी सेवा करें।‘‘ आज विश्व के समक्ष पर्यावरण को बचाए रखने की चुनौती है। लेखिका ने प्रस्तुत उपन्यास में पर्यावरण के पक्ष में विषद चर्चाएं की हैं। स्त्री-पुरुष के टकराव में प्रकृति-विरुद्ध आचरण की भूमिका होती है। दोनों को प्रकृति का सम्मान करते हुए उसके अनुकूल आचरण करना प़डेगा तभी प्रेम निर्वाह और परस्पर सामंजस्य सम्भव है।

‘विजयिनी‘ सावित्री है और प्रकृति भी। भाव संपदा की ज़ड है प्रेमानुभूति। इस उपन्यास का फलक विराट है। परिवार और समाज के लिए आचार संहिता है तो राष्ट्र और शासक के लिए नीतिशास्त्र। मनुष्य के लिए आध्यात्मिक ऊं चाई का शिखर है। स्त्री के लिए गृहस्थ सुख-सामंजस्य की कुंजी है तो पुरुष के लिए जीवन आनन्द का खजाना। जीवन-मृत्यु के बीच चेतना-यात्रा निर्भयता के साथ करते सावित्री-सत्यवान अपने होने को विस्तृत अर्थ देते हैं। उपन्यास में देश भ्रमण, दान का अधिकार, चरित्र-निरीक्षण, पारिवारिक-सुख, आदर्श राजतंत्रात्मक प्रणाली, राजा कर्त्तव्य, पिता का समभाव, वनवासी जीवन, बुजुर्गों के प्रति कर्त्तव्य और दायित्व, मनोविज्ञान, दर्शन, योग, प्रकृति, आध्यात्म, सहजीवन, जीवन-यथार्थ जैसे अनेक विषयों को जनतांत्रिक भाषा में प्रस्तुत किया गया है। बहुत सहजता और सरलता से कहानी आगे ब़ढती जाती है। द़ृश्यों तक का क्या, संवाद तक का चित्रांकन अद्भुत और अति सुन्दर है। मृदुला सिन्हा की मनीषा में ॠषि-प्रज्ञा का तेज है तभी तो ॠजुता में संश्लिष्टता को उजागर करने की अकूत क्षमता है उनमें।

कथा शिल्प आकर्षक है। आख्यान-प्रवाह हर संध्या की विश्रान्ति के बाद भी विछिन्न नहीं होता है। एक तारतम्य, लय, और अटूट शृंखला बनी रहती है जबकि पूरी रात और पूरे दिन का गैप होता है। कथाकार औत्सुक्य और सम्मोहन के ऐसे प़डाव पर कथा को विराम देती हैं, जहां से सुनने की जिज्ञासा और बलवती हो जाती है। सावित्री की अतीत कथा के श्रोता-पात्र ही नहीं उपन्यास के सजग पाठक भी शीघ्रतिशीघ्र सावित्री के लोक-शंका-समाधान-कथानक के उत्कर्ष तक पहुंचने की बेचैनी से भर जाते हैं। जिस अबाध गति से कथा आगे ब़ढती है उसे एक ही बैठक में पाठक प़ढ जाने की चाहना करे, तो आश्चर्य नहीं। वैसे भी हर संध्या के आख्यान के बाद विराम लेकर दूसरी संध्या या दूसरी बैठक में प़ढने की सुविधा कथाकार देती है, कोई क्रम भंग हीं होता है। ऐसा शिल्प, भाषा, किस्सागोई, सरलता, सादगी, संवेदना और आत्मलीनता के कारण सम्भव हुआ है। छोटे-छोटे वाक्यों में ब़डी गम्भीर और इतिहास-सत्ता को दिग्दर्शित करने की कोशिश प्रशंसनीय और स्तुत्य नहीं, अनुकरणीय भी है।

उपन्यास में मर्म को भिगों देने वाले कई प्रसंग और स्थल हैं। रोचक कथा-प्रवाह के बीच-बीच में अनेक सूक्तियां हैं। दर्शन की गम्भीर बातें हैं, जीवन-सौन्दर्य का उजास है, आत्मा का पवित्र राग है। व्यवहारिकता और अलौकिकता का अति सुन्दर और मजबूत सेतुबन्ध निर्मित करती कथाकार सकारात्मकता और आध्यात्मिकता का सौरभ युक्त दिव्य वातावरण कहीं से भी सावित्री में संकीर्णता, रू़िढ और विवेकहीनता नहीं है। वह निर्णय-क्षमता और आत्मश्विास से भरी है। आज हमारी बेटियों के समक्ष विषम स्थितियां है। इसके लिए परिवार-समाज-रहन-सहन कितना दोषी है – विचार करना प़डेगा। उन कारणों की प़डताल करनी प़डेगी, जिससे बेटे-बेटियों के प्रति द़ृृष्टि भिन्नता है। बेटियों के लिए सहज-स्वाभाविक विकास का मार्ग प्रशस्त और निष्कंटक करना प़डेगा, साथ ही उनके मानसिक गठन के उपयुक्त विचार-संहिता और संस्कार-संस्कृति का परिवेश भी देना प़डेगा। सावित्री की अमर कथा नवीन-आवरण और युगीन-सन्दर्भ में प्रस्तुत करके मृदुला सिन्हा ने एक बहुमूल्य और कालजयी कृति दी है। सावित्री में प्रगतिशीलता है, मगर उसकी आधार भूमि समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। कथाकार का यह मत और प्रतिपादन कि सभी युगों में सावित्री अत्याधुनिक ही रहेंगी- सर्वथा स्वीकृत और मान्य है।

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