रक्षा तैयारियों में कहां हैं हम?

पिछले पांच सालोंमें ऐसा दिखाई दे रहा है कि हमारे रक्षा मंत्री सेना को आबंटित बजट प्रावधान की रकम का पूर्ण उपयोग करने में विफल रहे हैं; क्योंकि विदेशों से शस्त्र खरीदने की भारत की प्रक्रिया अत्यंत जटिल, लंबी और पुरानी है। इस पद्धति को आसान करना होगा।

फिलहाल हमारा रक्षा खर्च देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 2.5% से भी कम है। वास्तव में वह 3% अपेक्षित है। भारत के पड़ोसी स्पर्धक देश‡ पाकिस्तान व चीन का रक्षा खर्च क्रमशः उनके जीडीपी के 3.5% से 4.3% है। भारत को चीन और पाकिस्तान की चुनौती का सामना करना है। सन 2001 से यद्यपि वार्षिक रक्षा बजट में कमोबेश में वृध्दि हो ही रही है, लेकिन वास्तव में प्रत्यक्ष खर्च कम ही हुआ है। साधन‡सामग्री की वर्तमान में उपलब्धता और आवश्यकता में कोई 25% की खाई बनी हुई है। भारत का रक्षा खर्च इस वर्ष के बजट में 203,672 करोड़ रु. है, जबकि चीन का रक्षा खर्च 106.4 अरब डॉलर हो गया है। पाकिस्तान ने भी अपने रक्षा खर्च में भारी वृद्धि की है।
भारत में सब से बड़ी दिक्कत सरकारी लाालफीताशाही है। इससे सेना के आधुनिकीकरण पर विपरीत परिणाम हो रहा है। भारतीय सेना का वर्णन ‘दूसरे दर्जेके साधनों के साथ लड़नेवाली पहले दर्जे की सेना’ के रूप में होता है। भारत की अख्तरबंद फौज को एक हजार ‘टी 90 एस’ किस्म के टैंकों की आवश्यकता है। वायुसेना के पास वर्तमान सामग्री को बदलकर नयी खरीदने की आवश्यकता है। वायुसेना के लिये 126 बहुउद्देशीय युद्धक विमान खरीदे जाने है। नौसेना के लिए युद्ध नौकाओं का निर्माण अत्यंत क्लिष्ट और समयखाऊ कार्य है। अत: भविष्य का अनुमान लगाकर समय से पहले ही युद्ध नौका निर्माण का काम आरंभ करना होता है। यह सब पूंजीगत खर्च कहलाता है।

सब से बड़ी दिक्कत यह है कि पूंजीगत खर्चों के लिए जो प्रावधान किए जाते हैं उनका पूरी तरह उपयोग भी नहीं किया जाता। सन 2004‡2005 और 2008‡2009 के दौरान 4 से 15 प्रतिशत की रकम शेष रह गयी थी। रक्षा सामानों की समय पर खरीद में सेना लगातार विफल रही है। रक्षा सामानों की खरीददारी में हुए भ्रष्टाचार, उससे संबंधित आरोप‡प्रत्यारोप, खरीददारी की ज्यादा समय चलनेवाली प्रक्रिया इत्यादि के कारण रक्षा सामग्री की सही समय पर खरीदी नहींहोती और इसका खामियाजा सेना को भुगतना पड़ता है।

पिछले लगभग दस वर्षों में सेना के लिये कोई भी महत्वपूर्ण खरीदी नहीं हुई है। कारगिल के बाद तोपें नहीं खरीदी गईं। टैंक, युद्धक विमान इत्यादि वस्तुओं की बहुत आवश्यकता है। वायु सेना के आधुनिकीकरण के लिए 126 विमानों की खरीदी का निर्णय किया गया है। रक्षा खर्च में हुई वृद्धि का बड़ा हिस्सा इसमें जाएगा। विदेशी मुद्राओं के मुकाबले रुपये के घटते मूल्य के कारण रुपए के रूप में हमें अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी। इसलिए 17 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कम लगती है। चीन और पाकिस्तान की रक्षा तैयारियों को देखते हुए हमें भी दीर्घकालीन विचार करना होगा और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को तेज करना होगा। थल सेना को भी सैनिकों के यातायात के लिये हेलिकाप्टर, आधुनिक तकनीकी और आधुनिक रक्षा सामग्री का समावेश करना होगा। थल सेना हमेशा से ही भारतीय सेना का शक्तिशाली भाग रहा है। सबसे महत्वपूर्ण होने के बावजूद भी थल सेना के पास जो शस्त्र हैं वे दूसरे दर्जे के हैं। सरकार के अव्यवस्थित कार्यों के कारण अभी भी कई पुराने शस्त्रों का ही उपयोग किया जा रहा है।

पाकिस्तान से दो हाथ करने के लिए भारतीय सैनिकों को मेन बैटल टैंक अर्थात एमबीटी पर निर्भर रहना होता है। इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण 1950 टी‡72 अजेया एमबीटी व 1657 टी‡90एस भीष्म एमबीटी टैंकों का समावेश है। तकनीकी दिक्कतों की पुनरावृत्ति, विलंब और लगातार बढ़नेवाली कीमतों के कारण सन 2009 में 58.5 टन किस्म के केवल 124 अर्जुन टैंक ही बनाए जा सके। पिछले 36 सालों से इसका निर्माण किया जा रहा है। इसे स्वदेश निर्मित टैंक बताया जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि इसका 60 फीसदी भाग विदेशी बनावट का है। यह टैंक सेना की कसौटियों पर खरा नहीं उतरा।

‘अर्जुन’ के उत्पादन में लगनेवाले वक्त के कारण आखिरकार भारत ने टी‡90 एस प्रयोग करने का निर्णय लिया। इसके लिये रूस के साथ लेन‡देन का करार भी हो गया। इसके अनुसार नवंबर 2007 में कुल 347 की मांग दर्ज की गयी और उसके बाद एक हजार लायसेन्स बुल्ट वाहनों की मांग की गयी है जिनकी पूर्ति 2020 में की जायेगी।

भारतीय तोपखाने को भी आधुनिक बनाने की अत्यधिक आवश्यकता है। 80 के दशक के मध्य में 155 मि. मी. वाली 400 तोपों की खरीद ही भारत की सबसे नवीतम खरीदारी है। भारत ने दक्षिण अफ्रिका के साथ 120 पहियों वाले और 180 स्वचालित तोपों का सौदा किया था। परंतु जैसे ही इसमें घोटाले की जानकारी मिली इस सौदे को रद्द कर दिया गया। क्रॉप्स और आर्मी डिफेन्स के शस्त्र भी पुराने पड़ चुके हैं। उन्हें कालबाह्य करार दिया गया है जिन्हें बदलने की जरूरत है।

भारतीय सेना को ऐसे युद्ध टैंकों की आवश्यकता है जो पाकिस्तान के टी‡80 और अल‡खलीद जैसी एमबीटी टैंकों का सामना कर सके। भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्था (डी आर डी ओ) तीसरी पीढ़ी की टैंक विरोधी मिसाइलें विकसित करने में आज तक सफल नहीं हुई है। इस परियोजना को बीस साल हो चुके हैं। थल सेना ने 443 नाग मिसाइलों की मांग की है परंतु अभी भी उनकी अंतिम जांच बाकी है।
हिंदुस्थान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने सन 1984 में ध्रुव एडवांस हेलिकाप्टर नामक बहुआयामी हेलीकाप्टर का विकास शुरू किया। फिलहाल ये हेलिकाप्टर भारतीय तट रक्षक दल, थल सेना, नौ सेना और वायु सेना को सेवाएं दे रहे हैं। साथ ही 159 हेलिकाप्टरों का आदेश भी एचएएल को दिया गया है। यह सौदा कोई 3.56 करोड़ अमेरिकी डॉलर का है। जिनमें से 105 थल सेना को और बाकी के वायु सेना को दिये जायेंगे। यह मांग 2014 तक पूरी की जायेगी। कालबाह्य हो रहे चीता और चेतक नामक हेलिकाप्टरों का स्थान लेने के लिये भारत ने जुलाई 2008 में 750 लाख अमेरिकी डॉलर की विकास परियोजना शुरू की है। इस परियोजना के अंतर्गत 197 नये हेलिकाप्टर प्राप्त होंगे।
युद्ध की स्थिति में देश की रक्षा की प्रथम जिम्मेदारी वायु सेना पर होती है। अगर उस समय वायु सेना का वार खाली गया तो पूरे युद्ध का स्वरूप ही बदल जाता है। इस दृष्टि से जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो मिग किस्म के युद्धक विमानों के कलपुर्जें मिलने बंद हो गये और भारतीय वायु सेना की प्रहार क्षमता घट गई। परिणाम स्वरूप अस्सी के दशक में भारत की वायु सेना की मारक क्षमता जो 40 स्क्वाड्रन तक पहुंच गयी थी, अब केवल 29 तक ही रह गयी है। इनमें भी मिग के कुछ स्क्वाड्रन शामिल होने से वास्तविक संख्या और कम माननी पड़ेगी। इसके अलावा मिग‡29 अथवा मिराज‡2000 विमानों का आधुनिकीकरण भी सरकार की लालफीताशाही में अटका हुआ है। इससे उनकी कार्यक्षमता भी खतरे में पड़ गई है।

सन 2001 में वायुसेना प्रमुख ने सुरक्षा की दृष्टि से 126 अत्याधुनिक युद्धक विमानों की आवश्यकता निरूपित की थी। केवल यही नहीं, उन्होंने हमारी जरूरतों को पूरी करने वाले और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध ऐसे विमानों की सूची भी सरकार को दी थी। यह सौदा कोई डेढ़ लाख करोड़ का था। पिछले दस सालों से सरकार ने इस पर कोई निर्णय ही नहीं किया।

हमारे पड़ोसी पाकिस्तान और चीन परमाणु अस्त्रों से लैस हैं। उनका मुकाबला करने के लिये भारत के पास अभी 200‡250परमाणु अस्त्र हैं। जमीन से वार करने वाली तीन प्रकार की अग्नि मिसाइलें अभी सेवा में हैं। अग्नि‡एक 700 से 800 किलोमीटर तक मार करने वाली कम अंतर की बैलेस्टिक मिसाइल है। अग्नि‡दो 2500 किलोमीटर की परिधि वाली मध्यम अंतर की और अग्नि‡तीन 3500 किलोमीटर तक पहुंचेवाले बैलेस्टिक मिसाइल हैं। तीसरे स्तर की अग्नि‡पांच अंतर उपमहाद्वीप बैलेस्टिक मिसाइल का विकास किया जा रहा है।

राजनैतिक नेतृत्व में इच्छाशक्ति का अभाव, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सफाई देने की बाध्यता, पश्चिमी देशों की प्रोद्यौगिकी हस्तांतरण पर पाबंदियां, स्वतंत्र निरीक्षण, वरिष्ठ स्तर के वैज्ञानिकों का राजनीतिकरण और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों के निजीकरण के कारण भारत को परमाणु अस्त्र विरोधी उपकरणों के निर्माण में लम्बे अर्से तक मशक्कत करनी पडी। परमाणु क्रांति के इतिहास में यह पहली घटना है। चीन, पाकिस्तान, इजराइल और इंग्लैंड जैसी किसी भी बाहरी परमाणु तकनीक का सहारा न लेते हुए भारत को सब कुछ स्वयं ही विकसित करना है।

भारत का रक्षा इतिहास देखें तो पता चलेगा कि हम हथियारों के लिये बड़े पैमाने पर रूस पर निर्भर है। हालांकि रूस के साथ किया गया प्रत्येक करार बहुत समय लेनेवाला और खर्चीला है। अमेरिका के साथ भी रक्षा सौदे के लिये भारत काफी उत्साहित नजर आ रहा है। पिछले पांच सालोंमें ऐसा दिखाई दे रहा है कि हमारे रक्षा मंत्री सेना को आबंटित बजट प्रावधान की रकम का पूर्ण उपयोग करने में विफल रहे हैं; क्योंकि विदेशों से शस्त्र खरीदने की भारत की प्रक्रिया अत्यंत जटिल, लंबी और पुरानी है। इस पद्धति को आसान करना होगा।
भारत के पाकिस्तान के साथ 1947, 1965, 1971 और 1999 में कारगिल युद्ध जैसे चार युद्ध और 1962 में चीन के साथ एक युद्ध हुआ है। ये युद्ध पारम्पारिक युद्ध रहे हैं। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा कोई युद्ध अगले 10‡15 वर्षों में हो सकता है। लेकिन इसका सामना करने की पूरी तैयारी नहीं हुई है। पूर्व सेना प्रमुख वी. के. सिंह ने इसका संकेत कर कमजोर राजनीतिक नेतृत्व और सुस्त नौकरशाही की आंखों में अंजन डालने का काम किया है। सेना के आधुनिकीकरण और रक्षा सामग्री की कमी दूर करने के लिए कम से कम 150 बिलियन डॉलर की जरूरत होगी। इसकी ठीक से योजना बनाई गई तो ये खामियां अगले 10‡15 वर्षों में दूर की जा सकती हैं। इस तरह के युद्ध में काम आने वाले पृथ्वी, ब्रह्मोस, अग्नि‡12 जैसी मिसाइलें सुसज्ज हैं। लेकिन त्रिशुल, नाग जैसी मिसाइलें फौज को तुरंत मिलनी चाहिए। यह काम असल में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का है, लेकिन उनकी सुस्ती के कारण मीडिया को इसमें जागृति लाने का काम करना चाहिए।

भारत का चीन या पाकिस्तान से क्या परमाणु युद्ध होगा? इसका अनुमान लगाना संभव नहीं है। 1945 के बाद परमाणु बम का कहीं इस्तेमाल नहीं हुआ है। फिर भी, पाकिस्तान व चीन से मिलने वाली धमकियों के रक्षा के लिए भारत को परमाणु युद्ध के लिए तैयार रहना होगा। परमाणु युद्ध के लिए परमाणु बम और उसे छोड़ने के लिए बम के संवहन करने वाले वाहन दोनों की आवश्यकता है। आकाश परमाणु बम डालने के लिए सुखोई और मिराज जैसे विमान हमारे पास हैं। लेकिन, पनडुब्बी से मिसाइल के जरिए परमाणु बम छोड़ने की क्षमता हमारी नौसेना के पास नहीं है। उसे विकसित करने में समय लगेगा। जमीन से मिसाइल छोड़ने की क्षमता पृथ्वी व अग्नि में है। पृथ्वी की क्षमता 100 से 150 किमी है। चीन का सामना करने के लिए हमें लम्बी दूरी की मिसाइलों की आवश्यकता है। अग्नि‡5 का आरंभिक परीक्षण हो चुका है, लेकिन इसे सेना में शामिल करने में और 4‡5 साल का समय लगेगा। उम्मीद करनी चाहिए कि हमारे रक्षा वैज्ञानिक निर्धारित समय में यह काम पूरा करेंगे।

डीआरडीओ का कार्य है कम लागत पर देश में अत्याधुनिक शस्त्र तैयार करना। सन 1958 तक हमारे 70 प्रतिशत शस्त्र बाहर से आयात होते थे। 54 वर्षों के संशोधनों के पश्चात और पानी की तरह पैसा बहाने के बाद भी हम 70 प्रतिशत शस्त्र आज भी विदेशों से मंगाते हैं। इसका अर्थ यह है कि डीअरडीओ अपने काम में असफल हुआ है। अगर रामराव समिति द्वारा दिये गये सुझावों का पालन किया गया और थोडा प्रयत्न किया गया तो डीआरडीओ वैश्विक स्तर की प्रयोग संस्था बन सकती है।

चीन ने अपना रेल संजाल तिब्बत तक फैला लिया है और पेट्रोलियम पदार्थों के लिये पाइपलाइन भी बनवा ली है। इसके विपरीत भारत की रेल असम में सीमा से सैकड़ों किलोमीटर पीछे है। केवल घोषणाओं से सेना तैयार नहीं होती। सन 1972 में बांग्लादेश से युद्ध होने के 35 साल बाद भारत ने 2010 में सेना के दो नये डिविजन तैयार किये। परंतु इनके सैनिकों को अभी भी योग्य हथियार नहीं मिले हैं।
हमारी सेना अपने देश की सीमाओं की रक्षा करने में सक्षम है। सेना की अपेक्षा है कि हमारे राजनेता यह समझें कि युद्ध कैसे किया जाता है। हमारी सेना का मनोबल कितना ही ऊंचा क्यों न हो पर उसे सक्षम बनाने के लिये तीव्र राजनैतिक इच्छा की आवश्यकता होती है।

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