जुगाड़ – एक कलाविष्कार

इस दुनिया में सब से बड़ा आविष्कार कौनसा यह पूछें तो ‘पहिये-चक्के’ से लेकर रॉकेट तक कितने सारे उत्तर हमें मिलते हैं। फिर भी वैश्विक स्तर के वरिष्ठ वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, विचारवान आदि एक चीज को सब से अधिक पसंद करते हैं और वह है रबड़। अपनी भूलों को मिटाने का सबसे कठिन काम बड़ी आसानी से करनेवाले रबड़ के कारण मानवी भूलों को सुधार करना संभव हुआ है। वैसे तो कितनी सारी भूलों को छिपाया भी गया। मराठी में ‘ध’ का ‘मा’ करना बिल्कुल आसान हुआ। सन 1770 में इस रबड़ का आविष्कार हुआ।

लेकिन इस रबड़ को सभालना कहीं मुश्किल ही था। कई बार वह गायब हो जाता या ठीक समय पर हाथ ही न लगता। फिलाडेल्फिया प्रांत के ‘हायमन लीपमन’ ने इस समस्या के समाधान के लिए एक बढ़िया तरकीब निकाली। सन 1858 में पेन्सिल के पिछले सिरे पर एक पतले पत्तर के सहारे उसने रबड़ को उस पेन्सिल में ‘फिक्स’ कर दिया। उस समय उसे सउका पेटेंट भी मिला था, परंतु इसमें किसी प्रकार का नया आविष्कार न होकर सिर्फ दो चीजों को ‘जोडना’ याने जुगाड़ होने से उसका स्वामित्व बना न रहा।

‘इनोवेशन’ सही माने में क्या होगा? वह एक शास्त्र है या कला है? आवश्यक प्रशिक्षण पाने पर कोई भी गाड़ी चला सकता है या संगणक का प्रयोग कर सकता है। वैसे ही कुछ प्रशिक्षण पाने से क्या किसी का इनोवेटर बनना संभव होगा? न्यूटन के पहले बहुत सारे लोगों ने पेड़ से सेब नीचे गिरता देखा था। वैसे तो खुद न्यूटन ने भी उस समय के पहले कई बार सेब को नीचे गिरते देखा होगा, परंतु गुरूत्वाकर्षण का आविष्कार जब उसने किया, तब उसके मन में कुछ दूसरे ही विचार थे। इसके माने यही कि आविष्कार करना यह शारीरिक क्रिया न होकर वह पूर्णतया मानसिक/ वैचारिक प्रक्रिया ही होती है। आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है, वैसे ही समस्याएं (िीेलश्रशाी) इनोवेशन की जननी है और समस्याएं आ जाने पर उससे पार पाने के लिए वैसी कृति करना यह एक कला होती है इसमें कोई संदेह नहीं। इसके माने यही कि इनोवेशन एक कला है। विश्वविख्यात कलाकार लिओनार्दो द विंची एक इनोवेटर था। 15 वीं सदी का यह महान कलाकार ने ‘मोनालिसा’ नामक अपने चित्र द्वारा तो ख्याति प्राप्त की है। साथ ही अपनी कल्पनाशक्ति की सहायता से सभी ओर प्रयुक्त की जा रही ‘बॉलबेअरिंग’, ‘पैराशूट’ से लेकर सीधे मशीनगन, बख्तरबंद गाड़ी तक की अनगिनत संकल्पनाएं संकल्प चित्रों के माध्यम से द विंची ने सभी के समक्ष रखीं। शरीर की अंदरुनी रचनाओं का अध्ययन कर उसने संभाव्य यंत्रमानव की संकल्पना भी बताई थी। कल्पनाशक्ति की उचित दिशा मिलने पर ही उसमें से कलाकृति निर्माण होती है।

लिओनार्दो ने तो ‘एरियल स्क्रू’ नामक यंत्र की संकल्पना स्पष्ट की, जो आज के ‘हेलिकॉप्टर’ की जननी है। इस यंत्र में संकल्पना यह थी कि चालक को साइकिल जैसे सिर्फ पैर चलाते रहे, जिससे उसके ऊपर की ओर का स्क्रू जैसा पंखा घूम कर वह यंत्र जमीन से ऊपर उठेगा।
आज के हवाई जहाज की संकल्पना बनानेवाले राईटभाई भी कलाकार थे। उड़नेवाले यंत्र की लगन से मानो वे पागल बने थे। कितनी ही असफलताओं के बावजूद भी उनका अपनी कल्पनाशक्ति पर प्रचंड विश्वास था और तभी जाकर वे सफल बन सके। उनके पूर्व की सभी संकल्पनाओं की खामियों- त्रुटियों पर गौर करके ही उन्होंने हवाई जहाज की यह नई संकल्पना बनाई। हवाई जहाज की उड़ान के लिए आवश्यक उड़ान-नियंत्रक से लेकर (फ्लाइट कंट्रोलर) हवाई जहाज को हवा में उड़ाने के लिए आवश्यक सक्षम गतिदायक (प्रॉपेलर) तक सभी पुर्जों की पूर्व तैयारी उन्होंने पहले से ही की थी। साइकिल का छोटासा कारखाना चलानेवाली इस जोड़ी ने सन 1903 में की पहली उड़ान तक के दस बरस इस अनुसंधान में बिताए थे।

आज का संगणक भी कहीं सिर्फ एक रात में बना नहीं। गणित की समस्याओं को सुलझाना यह संगणक के आविष्कार का मुख्य उद्देश्य था। केवल कठिन-जटिल गणित सुलझाना, प्रचंड पैमाने पर गिनती करने हेतु सैकड़ों बरस पहले बना हुआ गणकयंत्र (कैल्क्युलेटर), कितने ही लोगों की संकल्पनाओं के फलस्वरूप आज संगणक में परिवर्तित हुआ है। सन 1936 में कोनार्ड झुसे नामक गणितज्ञ ने पहला प्रोग्रामेबल संगणक बनाया। सन 1947 के ‘ट्रान्जिस्टर’ के आविष्कार के पूरे 10 वर्ष बाद ‘इन्टिग्रेटेड सर्किट’ याने ‘चीप्स’ बन पाई और उसके बाद ही संगणक का अन्य कामों हेतु प्रयोग बढ़ता गया। सन 1962 में पहला संगणकीय खेल तैयार हुआ, तो सन् 1964 में आविष्कृत ‘माऊस’ ने तो आगे बढ़ कर क्रांति ही कर दी। सन 1975 में ये संगणक जनसाधारण को बेचे जाने के लिए बनाए जाने लगे। 75 वर्ष पहले असंभव लगनेवाली ‘जेब में रखनेलायक संगणक’ यह चीज आज बिल्कुल साधारण सी बन गई है और यह संभव हुआ है बहुत से अनुसंधानकर्ताओं तथा उनके अनुसंधानों के प्रयासों के फलस्वरूप ही।

संगणक के नये संस्करण को देखकर तथा उसकी जानकारी और महिमा सुनकर हम तो दंग रह जाते हैं। आगामी दो बरसों में यह जेब में रखा जानेवाला संगणक पूर्णत: ‘हैंड्स फ्री’ बन रहा है। उसका पहला संस्करण विश्व बाजार में अवतीर्ण हुआ है। ‘गोल्डन आई’ याने ‘सुनहरी आंख’ इस नाम से विख्यात यह संगणक अपने सिर पर हेअर बैंड जैसा बांधा जा सकता है। उसका पर्दा अपनी आंखों के सामने होता है और कानों में हेडफोन तथा उसके नीचे मायक्रोफोन और तो और उस बैंड में प्रोसेसर। है न बढ़िया!

नवनिर्माण प्रकृति का ही एक गुण है। हर बरस सैकड़ों जाति-प्रजातियां जैसे लुप्त हो जाती हैं, वैसे ही बहुत सी जातियां नये सिरे से निर्माण भी होती चलती हैं चाहे वह केवल दियासलाई के सिरे की बूंद जितना गिरगिट हो अथवा जूते जैसा ही दिखनेवाला चूहों जैसे जानवरों को खानेवाला परोपजीवी पौधा हो। प्रकृति ही सबसे बड़ा नवनिर्माण है।

लगातार नया पाने हेतु लगन होना और उसमें हमेशा अतृप्त रहना यही मनुष्य की प्रगति का प्रमुख कारण होता है। इसीलिए हम सभी को ही अपनी सभी ओर होनेवाली घटनाओं का बारीकी से निरीक्षण करते हुए, उसमें अपनी ओर से उचित सुधार करने के प्रयास निरंतर करने चाहिए, क्योंकि श्रीराम का सेतुबंधन बनाने में छोटी सी गिलहरी का भी हिस्सा महत्वपूर्ण होता है।
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