दिल्ली की नौटंकी

दिल्ली में 48 दिनों की नौटंकी खत्म हो गई। केजरीवाल ने अपनी ही सरकार पर ‘झाडू’ चला दिया। यह कोई आश्यचर्यजनक या अनपेक्षित नहीं है। ‘आप’ की सरकार जब बनी तभी उसकी मौत की उलटी गिनती शुरू हो गई थी। केजरीवाल भी जानते थे कि कांग्रेस के आठ विधायकों की बैसाखी ज्यादा दिन नहीं चलेगी। जिन्हें ताउम्र गालियां दीं उनके समर्थन से सरकार बनाना भी नागवार ही था। फिर भी उन्होंने इसलिए सरकार बनाई कि वे राजनीतिक चक्रव्यूह में फंस गए थे। स्थिति ऐसी थी कि सरकार बनाए तो मुश्किल, न बनाए तो मुश्किल। सरकार न बनाए तो जिम्मेदारी से भागने का आरोप लगता और ‘आप’ के भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता। लेकिन सरकार बनाए तो पलायन का रास्ता बनाना आसान था और दोष भी अन्य पर मढ़ा जा सकता था। आगामी 2014 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए यही रास्ता बेहतर था। जनलोकपाल विधेयक के बहाने यही राजनीतिक चाल खेली गई।

केजरीवाल की सरकार अपने आश्वासनों के बोझ तले ही दबकर वैसे भी छटपटा रही थी। ‘आप’ ने चुनाव पूर्व अपने घोषणापत्र में ऐसे-ऐसे वादे किए थे कि जिन्हें पूरा करना संभव नहीं था। सपने बांटना अलग चीज है और सपने पूरे करना अलग। मुफ्त पानी, सस्ती बिजली, लोगों को घर, अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी नौकरी आदि लोक-लुभावन नारों का ‘आप’ ने इस्तेमाल किया। शायद इसलिए कि उन्हें भी उम्मीद नहीं थी कि मतदाता वाकई उनकी झोली भर देंगे।

इस यकायक लाभ से केजरीवाल एण्ड कम्पनी बौरा गए। शुरू में तो उनकी समझ में ही नहीं आए कि क्या करें या क्या न करें। कानून मंत्री बनते ही सोमनाथ भारती ने खुद छापे डालने शुरू कर दिए। महिला व शिशु कल्याण मंत्री बनते ही राखी बिड़ला ने अस्पतालों में जाकर वहां के प्रशासन व डॉक्टरों को निर्देश देना शुरू कर दिया। इससे शासन और प्रदर्शन का अंतर ही मिटने लगा। सरकार ही सड़क पर आकर बैठने लगी। मंत्री सड़क पर बैठे बैठे शिकायतें सुनने लगे। भीड़ के कारण इस पहले ही दरबार के तीन तेरह बज गए। सड़क पर बैठे मंत्री बगल की इमारत में दूसरी मंजिल पर पहुंच गए और वहां से लोगों को सम्बोधित करने लगे। यह केजरीवाल सरकार का पहला ‘पलायन’ था। नौटंकी का पहला अंक था।

मुफ्त पानी को लेकर भी ऐसा ही गड़बड़झाला हुआ। पहली ही बैठक में केजरीवाल को कहना पड़ा कि ‘मेरे पास कोई जादुई छड़ी नहीं है।’ मुफ्त पानी की बात पानी की तरह ही बहकर रह गई। उसे व्यवहार में लाना संभव नहीं हुआ। सस्ती बिजली की बात भी ऐसे ही है। दर आधे कर दिए गए। मतलब यह कि आधी राशि जनता देगी और शेष सब्सिड़ी के जरिए दी जाएगी। इससे राज्य के कोष पर भारी बोझ पड़ने वाला था। बिजली कम्पनियों ने दर तो आधे कर दिए, अब सब्सिड़ी के लिए तगादा शुरू कर दिया। यह रकम राज्य सरकार अदा नहीं कर पाई इसलिए बिजली कम्पनियों के हिसाब-किताब की कैग के जरिए जांच का हौवा खड़ा किया गया। यह नौटंकी का और पलायन का दूसरा अंक था। अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी करने के मुद्दे पर भी ऐसा ही हुआ। जब पाया कि सब को स्थायी करना संभव नहीं है तो लिखित परीक्षा व साक्षात्कार का स्वांग रचा गया।

जिम्मेदारी से पलायन का यह तीसरा अंक है। लोगों को मकान मुहैया करने की नौटंकी का अगला अंक होना ही थी कि सरकार ही चल बसी। सरकार मजाक बनकर रह गई। लगता है, दिल्ली दिलवालों की नहीं रही, दिल्लगी करने वालों की हो गई।
जिस जनलोकपाल विधेयक का बहाना बनाकर केजरीवाल ने इस्तीफा दिया वह भी गौर करने लायक है। ऐसा कोई विधेयक पेश करना असंवैधानिक था, क्योंकि इसी विषय पर लोकपाल विधेयक संसद पारित कर चुकी है और राष्ट्रपति की मंजूरी भी प्राप्त हो चुकी है। ऐसे में कोई राज्य दूसरा विधेयक पेश नहीं कर सकता। उपराज्यपाल ने वैसी सूचना भी दे दी थी। इसके बावजूद विधेयक पेश करना संविधान के साथ खिलवाड़ करना था। इसलिए भाजपा और कांग्रेस ने एक स्वर से इसका विरोध किया और विधेयक पेश नहीं हो सका। इससे केजरीवाल को दोनों की आलोचना करने और सरकार का इस्तीफा देने का मौका मिल गया। इसे अब अगले चुनाव में भुनाने की कोशिश की जाएगी।

लोकसभा चुनावों की केेजरीवाल की पहली सूची इसीका संकेत है। इस सूची को देखें तो लगता है कि मेधा पाटकर जैसे सामाजिक जीवन के आंदोलनकारी नेता भी ‘आप’ के उम्मीदवार बन गए हैं। जो राजनीति से दूरियां रखने की बात करते थे वे भी ‘आप’ के साथ राजनीति में आ रहे हैं। इनमें कई ऐसे नेता हैं जो आंदोलन करते- करते थक गए हैं, कुछेक के आंदोलन ही खत्म हो गए हैं और अपने पुनर्वसन की चिंता उन्हें सता रही है। चुनाव के जरिए पुनर्वसन का जरिया उन्हें मिला है। इसमें वे कितने सफल होंगे यह तो समय ही बताएगा, लेकिन यह एक बड़ा परिवर्तन है, जो अगले चुनाव में भारी उलटफेर को इंगित करता है। कांग्रेस हो, ‘आप’ हो या कथित तीसरा मोर्चा हो- सभी मोदी को रोकने के लिए लामबंद होते दिखाई दे रहे हैं। मतदाताओं की भावनाओं के साथ खेल भी खेले जा सकते हैं। इसलिए सभी को आंखों में अंजन डालकर सतर्क रहना चाहिए। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि केंद्र में मजबूत सरकार आए, पंगु सरकार नहीं। हमें इन अवसरवादियों पर नजर रखनी चाहिए और वोटों के जरिए उन्हें उनका स्थान दिखा देना चाहिए।
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