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*****अशोक पत्की*******

‘‘मिले सुर मेरा तुम्हारा … ’’ के बाद हमने ‘‘बने सरगम हर तरफ से गूंजे बनकर। ’’ जिंगल बनाया। ‘‘मिले सुर .. ’’ पांच -छह सेकंड का था, लेकिन ‘‘बने सरगम … ’’ १५ -२० सेकंड का। रामनारायण जी, हरिप्रसाद चौरसिया, अमजद अली खान, पंडित रविशंकर जी, पंडित भीमसेन जोशी, पंडित शिवकुमार शर्मा, जाकिर हुसैन जैसे बड़े -बड़े कलाकारों के साथ शास्त्रीय नृत्य के कलाकार भी थे। पर जो बात ‘‘मिले सुर … ’’ में थी वह बात इसमें नहीं आ पाई।

 क रात को वैद्यनाथन का फोन आया। वैद्यनाथन का फोन आता है तो मैं समझ जाता हूं कि उनके पास कोई नया जिंगल आया है। वही हुआ भी। उन्होंने कहा ‘‘अशोक कागज पेंसिल लो और एक या जिंगल लिख लो। ’’ मैंने कागज पेंसिल ली, उन्होंने कहना प्रारंभ किया ‘‘मलिक साहब का जिंगल है और इसमें बहुत सारी भाषाएं आने वाली हैं … एक ही जिंगल में। ’’ मैंने पूछा ‘‘वह कैसे ’’ उन्होंने कहा ‘‘तुम लिख तो लो, ’’ मैं लिखने लगा। जिंगल के शब्द थे ‘‘मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा … ’’ मैंने पूछा ‘‘आगे ? ’’ तो उन्होंने कहा, ‘‘अभी इतना ही है, इसकी दो तीन धुनें उन्हें सुनानी हैं। इसका बेस क्लासिकल होना चाहिए। ’’ मैंने कहा ‘‘ओ के कब तक सुनाना है ? ’’ उन्होंने कहा ‘‘कल शाम को मीटिंग है, उसमें दो तीन धुनें सुनानी हैं। कल पांच बजे वेस्टर्न आउटडोर स्टूडियो में पहुंच जाना। ’’

मेरे स्वभाव के अनुसार हाथ में शब्द आते ही तर्ज की प्रक्रिया श्ाुरू हो जाती है। मैैंने एक तर्ज यमन राग में, दूसरी भीमपलास में तथा तीसरी भैरवी में (जो अब टी .वी . पर सुनाई देती है ) तैयार की। दूसरे दिन सबने तीनों तर्ज सुनीं। सबको भैरवी की तर्ज पसंद आई। मैं मन ही मन कह उठा, ‘‘वाह ! क्या बात है। ’’ फिर यह भी तय हुआ कि उसकी विभिन्न भाषाओं में स्क्रिप्ट लिखी जाए। सबको हिंदी की जिंगल भेज दी गई। कुछ दिन बाद वैद्यनाथन का फिर फोन आया कि सभी भाषाओं की स्क्रिप्ट तैयार है, अमुक दिन वेस्टर्न स्टूडियो में रेकॉर्डिंग करनी है।

प्रोड्यूसर मलिक स्वयं गंीत के अच्छे जानकार थे। उनकी आवाज भी सुरीली थी। वे अकेले ही पंडित भीमसेन जोशी से मिलने गए। उन्होंने पंडित जी को तर्ज सुनाई। पंडित जी ने अपने तरीके से उस तर्ज को ठीक किया। मुझे या वैद्यनाथन को पंडित जी को सिखाने की तकलीफ नहीं उठानी पड़ी। सुबह दस बजे रेकॉर्डिंग के समय मैं पहुंचा तो मुझे यह देखकर सुखद आश् चर्य हुआ कि पंडित जी तबला वादक नाना मुले व दो तम्बूरा वालों के साथ कारपेट पर ही बैठकर रियाज कर रहे हैं। मैंने मलिक से पूछा कि पंडित जी को तर्ज की जानकारी कैसे मिली ? तब मलिक ने बताया कि उसने पंडित जी को टेप से तर्ज सुनाई थी। फिर पंडित जी ने अपने तरीके से तर्ज तैयार की।

पंडित जी को ४५ सेकंड का समय दिया गया था। उनसे हमने कहा, ‘‘जैसे ही हम आपको हाथ से संकेत करें वैसे ही आपको गाना प्रारंभ करना है। ’’ पर मजेदार बात यह हुई जैसे ही हम पंडित जी को हाथ से इशारा करते तो पंडित जी तम्बूरे वाले को हाथ से इशारा करते फिर गाना श्ाुरू होता। इस प्रकिया में समय बढ़ जाता। हम दुबारा पंडित जी को कहते कि हाथ का इशारा मिलते ही गाना है, पर पंडित जी फिर वही दुहराते। वे भी अपनी जगह सही थे, बिना सुर मिलाए कैसे गाते ? मैंने रेकार्डिस्ट दमन सूद को बताया कि पंडित जी को अपने तरीके से गाने दो, जहां से श्ाुरू करना है वहां से टेप काटकर टाइमिंग सेट कर लेंगे। जब टेक ओ के हुआ तब सब लोग बहुत प्रसन्न हो गए। पंडित जी की सधी हुई आवाज, खूबसूरत तर्ज और नाना मुले का तबला … एक दुर्लभ संयोग था।

अब बारी थी कश्मीरी भाषा की। कश्मीरी भाषा का सुपरवायजर ही लेखक था और गायक भी। मलिक का इस बात का बड़ा आग्रह था कि मीटर बदल गया तो कोई बात नहीं ; पर सुनते समय यह महसूस होना चाहिए कि ‘‘मिले सुर … ’’ की ओरिजनल लय सुन रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि दीपचंदी, घाघरा, खेमटा, खेहरवा ऐसे विभिन्न मीटर में भाषा की विविधता को सजाने के बावजूद सुनने में एकलयता ही महसूस होती। कश्मीरी भाषा में रेकॉर्डिंग करते समय यह ध्यान में आया कि कश्मीर के मूल बाजे ‘‘संतूर ’’ की व्यवस्था नहीं है। काफी प्रयत्नों के बाद भी संतूर बजाने वाला मिल नहीं पाया। हमारे साइड -र् हीदम प्लेयर दीपक बोरकर के पास हार्प था। बोरकर ने सुझाव दिया कि इस पर संतूर इफेक्ट उत्पन्न किया जा सकता है। सभी तार भैरवी में लगे होने के कारण हाथ या स्ट्राइकर कहीं भी पड़ेगा तो भी वही लय सुनाई देगी।

फिर मैंने तथा धीरज ने दो पेंसिल मंगाई व जो सुर संभव था उसे बजाया। इसका इफेक्ट बहुत शानदार आया। यही फाइनल हुआ। गायक कश्मीरी होने कारण गायन में भाषा की मौलिकता का खास रंग भी था। इसके बाद कविता कृष्णमूर्ति व पंकज मिश्रा की आवाज में बंगाली भाषा में बनाना था। मलिक ने बताया कि इसमें र् हीदम वगैरह नहीं रखना। हमने पूछा ‘‘क्यों ? ’’ तो मलिक ने कहा, बंगाली जरा सुस्त होते हैं। उनका हर काम शाही अंदाज में होता है। इसीलिए जब बंगाली पोर्शन श्ाूट भी किया या तो लोगों को ट्रेन से उतरते समय स्लो मोशन में दिखाया गया। मैं सोच रहा था कि मलिक के पेपर वर्क में हर बात की कितनी गहरी समझ दिखाई देती है। यह आवश्यक भी है। इसका अनुभव हमें प्रत्येक भाषा के प्रयोग के समय आया। वे प्रत्येक भाषा का अलग -अलग टाइमिंग बताते, किसी का ६ सेकंड, किसी का ७ सेकंड किसी का ९ सेकंड। मैं और कविता उनसे झगडते, ‘‘एक दो सेकंड से क्या फर्क पड़ेगा ? ’’ मलिक कहता ‘‘आपको कोई फर्क नहीं पड़ता पर मुझे पड़ेगा। ’’‘‘ठीक है भाई, हम कोशिश करते हैं, ’’ कह कर हम अपने काम में लग जाते।

इसका पंजाबी भाषा का भाग स्वयं मलिक की बहन सुषमा ने गाया। मस्त खनक आवाज के साथ उसके कण्ठ में बसी पंजाबी भाषा की नजाकत अलग ही रंग बिखेर रही थी। मराठी में ‘‘तुमच्या आमच्या जुळता तारा ’’ इस पंक्ति की तर्ज लगाते तक सुषमा ने दूसरी पंक्ति भी कह डाली। यह देखकर मैं बोला ‘‘अरे वाह ! अब तो तू कम्पोजर भी बन गई। ’’ सब लोग हंसने लगे। इस पर सुषमा थोड़ी सकुचा गई।

मैंने कहा, ‘‘सचमुच बहुत अच्छा है। इसे ऐसा ही रखेंगे। ’’ इसमें माधव पवार ने ढोलकी का ऐसा कुछ ठेका लाया कि मराठी लावणी की ठसक साफ महसूस हो रही थी। तमिल, तेलगु, मलयालम, कन्नड में गाने के लिए सुपरवायजर के रूप में उन भाषाओं के जानकार रखे गए थे। रघ्ाु व किराविला इन दो गायकों के साथ ए .पी . शर्मा सहित उन भाषाओं में महारत रखने वाले अन्य कलाकार भी थे।

 

 

 

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