मां का दूध और दूध का बैंक

मां के दूध को अमृत की संज्ञा दी गई है। अमृत! जिसे पीकर इंसान अजरामर हो जाता है। मां के दूध में वे सभी कारक मौजूद होते हैं, जो बच्चों को सभी पौष्टिक तत्व प्रदान करते हैं जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। मां के दूध में अमीनो एसिड होता है। साथ ही शिशु के मस्तिष्क के विकास के लिए आवश्यक ओमेगा-3 एसिड और कोलेस्ट्रॉल भी होता है। बच्चे की कार्य शक्ति बढ़ाने के लिए लेक्टोज और गैलेक्टोज नामक शक्कर भी इसमें समाहित होती है। विटामिन ए, डी, ई, सी और छार भी आवश्यक मात्रा में होते हैं। मां का दूध पीने वाले बच्चे को पानी पीने की आवश्यकता नहीं होती। इन सबके साथ ही मां अपने बच्चे को एक और महत्वपूर्ण चीज देती है और वह है एलर्जी और जंतु संसर्ग से सुरक्षा। बच्चे के जन्म के बाद जो पहला गाढ़ा पीला द्रव निकलता है उसे कोलेस्ट्रॉम कहा जाता है। इसमें सफेद (पेशी) कोशिकाएं अत्यधिक होती हैं, साथ ही आईजीए नामक तत्व होता है। इसकी एक तह बच्चे की आंत पर चढ़ने से बच्चे का पेट अपने आप साफ हो जाता है। यह आंतों को विकसित और परिपक्व होने में मदद करता है। ये संरक्षक तत्व मां अपने बच्चे को अगले 3 से 6 महीने तक देती रहती है।

ब्रेस्ट कॉल

जन्म के तुरंत बाद बच्चे को मां के पास लाया जाता है। मां की त्वचा का स्पर्श होते ही बच्चा कोलोस्ट्रोम लेने की कोशिश करने लगता है। बच्चे की जीभ और होठों का स्पर्श होते ही मां का दूध अपने आप आने लगता है।

दूध पिलाते समय सावधानियां

शुरुआती दिनों में एक-डेढ़ चम्मच दूध पीने वाला बच्चा कुछ ही दिनों में 30 से 60 एमएल दूध पीने लगता है। दूध का पहला भाग पतला, प्यास बुझाने वाला (फोर मिल्क) होता है। इसके बाद ऊष्मा युक्त, स्निग्ध और भूख मिटाने वाला होता है। बच्चे को दूध पीना सुखकारक और सुलभ होने के लिए मां को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। नैसर्गिक क्रियाओं से मुक्त होकर पानी पीएं। पीठ और कमर को आधार देने के लिए तकिया लगाएं। अगर कुर्सी पर बैठी हों तो पैरों के नीचे छोटा स्टूल या पी़ढा रखें। गोद में तकिया रखें और बच्चे को अपने शरीर से सटा कर रखें, इसके लिए विशेष ‘नर्सिंग पिलो’ भी बाजार में उपलब्ध है। दूध पिलाने के बाद बच्चे को कंधे से सटाकर सीधा करें और उसकी पीठ पर हाथ फेरें, जिससे उसे डकार आ जाए। ऐसा करने से बच्चे का दूध पच जाता है और वह उल्टी नहीं करता। कभी-कभी दूध पीते हुए बच्चा सो जाता है। ऐसे में उसे जगाएं और फिर दूध पिलाएं। अगर बच्चा सो जाए तो बच्चे के मुंह में उंगली डालकर उसका मुंह खोलें और उसे खुद से अलग करें, अगर ऐसा नहीं किया तो मां को तकलीफ हो सकती है। नवजात शिशु दिन में 8 से 12 बार दूध पी सकता है। इसकी कालावधि 30 से 40 मिनट होती है। अत: मां को शिशु को दूध पिलाने के अतिरिक्त स्वयं के खान-पान और आराम पर भी ध्यान देना चाहिए।

इस समय में सबसे अधिक आवश्यकता होती है संयम की। मां और बच्चा दोनों ही नए होने के कारण शुरू मेें कुछ परेशानियां होती हैं, परंतु धीरे-धीरे सब ठीक होने लगता है। हमारे यहां मां के दूध की मात्रा में वृद्धि के लिए उसके आहार में शतावरी, मेथी, खसखस आदि को शामिल किया जाता है।

धीरे-धीरे मां और बच्चा दोनों को ही दुग्धपान कराने और करने की आदत हो जाती है और उसके फायदे भी दिखाई देने लगते हैं। मां के संदर्भ में अच्छी बात यह है कि रोज कम से कम 500 कैलोरीज जलने के कारण गर्भावस्था में बढ़ा हुआ वजन तीव्र गति से कम होने लगता है। गर्भाशय पुराने आकार में आ जाता है। नैसर्गिक रूप से संतति नियमन होता है। भविष्य में स्तन तथा ओवेरी कैंसर या आस्टियोपायरेसिस (हड्डियां कमजोर होने) का खतरा नहीं होता। इस सभी से अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस नजदीकी के कारण मां और बच्चे में एक अटूट बंधन का निर्माण होता है।

मां के दूध के कारण बच्चे का वजन अच्छी तरह बढ़ता है। अपचन की शिकायत नहीं होती। एलर्जी, दमा, कान या छाती में जंतु संसर्ग का खतरा नहीं होता, इन बच्चों की बुद्धि भी तीक्ष्ण होती है। भविष्य में स्थूलता, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय विकार के रोग होने की गुंजाइश बहुत कम होती है।

स्तनपान मां व बच्चे के लिए कितना लाभप्रद है यह हम जान चुके हैं। परंतु कई कारणों से बच्चों को मां का दूध नहीं मिल पाता। इन बच्चों को भविष्य में होने वाली बीमारियों से बचाने के लिए और उनका समुचित विकास होने के दृष्टिकोण से ‘ह्यूमन मिल्क बैंक’ अर्थात ‘मां के दूध का बैंक’ की स्थापना की गई।

डॉ. अर्मिडा फर्नांडिस ने सन 1989 में इसकी स्थापना की। यह न केवल भारत की वरन एशिया की पहली ‘ह्यूमन मिल्क बैंक’ है। इस तरह के बैंक का विचार करना और योजना बनाकर उसका क्रियान्वयन करने के लिए डॉ. अर्मिडा को कई मुश्किलों का सामना प़डा था।

सन 1977-78 में उन्होंने लोकमान्य तिलक अस्पताल (शीव, मुंबई) के नवजात शिशु विभाग के प्रमुख और प्राध्यापक के रूप में नौकरी शुरू की। उन्होंने देखा कि 37 हफ्ते पूर्ण होने के पहले ही बच्चों का जन्म होता था। इन बच्चों की मृत्यु दर भी अधिक थी। इन बच्चों की किन कारणों से मृत्यु हो रही है, यही शोध का विषय था। इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अत्यल्प होने के कारण उन्हें बहुत जल्दी जंतु संसर्ग होता था। इन बच्चों की माताएं उन्हें जन्म देने के दौरान ही अपनी जान गंवा देती थीं या जिनका जन्म सिजेरियन पद्धति से होता था वे बेहोश होती थीं। इन परिस्थितियों में मां बच्चे को दूध नहीं पिला सकती थी।
गाय या भैंस के दूध में ये संरक्षक तत्व नहीं होते। बच्चे की आंतों की वृद्धि न होने के कारण उसे संसर्ग होने का खतरा होता था। अत: बाहर का दूध पिलाना बंद कर दिया गया। ऐसे समय में अगर उस बच्चे की मां न हो तो दूसरी मां को तैयार किया जाता था। हालांकि यह ज्ञात था कि किसी दूसरी मां का दूध बिना किसी रासायनिक क्रिया के बच्चे को पिलाना वैज्ञानिक दृष्टि से सही नहीं है। हर मां की शारीरिक क्षमता अलग होती है। परंतु इस नए प्रयोग से बच्चों की मृत्यु दर में काफी कमी आई। डॉ. अर्मिडा इस दिशा में प्रयास करने लगीं कि जिन बच्चों को जन्मत: अपनी मां का दूध नहीं मिलता, उन्हें माताओं का शुद्ध दूध कैसे प्राप्त हो।

सन 1986 में ‘सीनियर कॉमनवेल्थ फेलोशिप’ के द्वारा मिली छात्रवृत्ति के कारण डॉ. अर्मिडा लंदन गईं। वहां ऑक्सफोर्ड के ‘रेटलिक’ अस्पताल में उन्होंने एक छोटी ट्रॉली में बोतलों में सफेद रंग के द्रव को देखा। वहां की नर्स से पूछने पर उन्होंने डॉ. अर्मिडा को ‘मातृ दुग्ध बैंक’ के विषय में जानकारी दी। डॉ. अर्मिडा ने इस बैंक के विषय में संपूर्ण जानकारी हासिल की। मुख्यत: यह कि दूध को पाश्चाराइज्ड पद्धति से जमा करके रखा जाता है। मां का दूध प्राप्त न कर सकने वाले शिशुओं के लिए उन्हें इसी तरह के बैंक की आवश्यकता थी। इस तरह की बैंक को भारत में खोलने के निश्चय से वे भारत लौटीं।

भारत में इस प्रकार का बैंक न होने के कारण यह सभी के लिए नया था। अत: इस प्रकल्प को वास्तविकता में उतारने के लिए कई प्रश्न कई समस्याएं सामने थी। पहला और ब़डा प्रश्न था इस कार्य के लिए आर्थिक सहयोग कौन करेगा? तब कहीं से पता चला कि होटल इंडस्ट्री में नामांकित ताज ग्रुप इस तरह के प्रकल्पों को चलाने के लिए आर्थिक सहायता करता है। अत: डॉ. अर्मिडा ने ताज ग्रुप को इस प्रकल्प की सारी जानकारी और इसकी आवश्यकता से संबंधित विस्तृत पत्र लिखा। उन्हें योजना अच्छी लगी और उन्होंने आर्थिक सहयोग देने के लिए सहमती दर्शाई।

इसके बाद उन्होंने बृहन्मुंबई महानगरपालिका से 3 वर्ष के लिए जगह देने की मांग की। इस प्रकल्प में आवश्यक मशीनों का खर्च, नर्स का वेतन आदि ताज ग्रुप के जिम्मे था। टेक्निशियन का खर्च मशीनों को दान करने वाले दे रहे थे। डॉ. अर्मिडा को केवल जगह की आवश्यकता थी।

डॉ. अर्मिडा के अथक प्रयासों के परिणाम स्वरूप सन 1989 में यह प्रकल्प शुरू हुआ।
किसी भी शिशु को मां का दूध न मिलने के कारण वह कुपोषण का शिकार न हो, इस उद्देश्य से शुरू किए गए इस प्रकल्प को इस वर्ष 25 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इस प्रकल्प के कारण आज कई नवजात शिशु मृत्यु के मुख में जाने से बचाए जा सकते हैं।
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