अनिश्चित भविष्य की ओर किसान आंदोलन

कसानों के नाम पर चल रहे तथाकथित आंदोलन ने मोदी सरकार और भारत की समस्या तो बढ़ा ही दी है। एक छोटा सा फोड़ा आज नासूर बन गया। लेकिन देरसबेर इसकी शल्यक्रिया तो करनी ही होगी। हम अनवरत काल तक राजधानी दिल्ली की आंशिक ही सही घेरेबंदी को जारी रहने नहीं दे सकते। वैसे इस आंदोलन का भविष्य अब केवल जारी रहने तक ही सीमित है।

यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि कृषि कानूनों के विरोध में चल रहा आंदोलन अत्यंत ही गंभीर और चिंताजनक स्थिति में पहुंच गया है। 26 जनवरी गणतंत्र दिवस परेड के बाद 6 फरवरी को चक्का जाम का दूसरा शक्ति प्रदर्शन हो चुका है। इसके साथ आंदोलनकारियों की ओर से अगले एक महीने के कई कार्यक्रम दे दिए गए हैं जिनमें रेल रोको से लेकर राजस्थान में टोल वसूली बाधित करना शामिल है।

जाहिर है, लाल किला सहित समूची दिल्ली की हिंसा के बावजूद आंदोलनकारी हर हाल में इसे लंबा खीचने पर उतारु हैं। तभी तो जगह-जगह महापंचायतें हो रही हैं। भारत से बाहर रह रहे अलगाववादियों, भारत विरोधियों द्वारा इस आंदोलन का दुरुपयोग कर अपना हित साधने की साजिश भी सप्रमाण सामने आ चुकी है। इसमें पूरे देश के अंदर यह प्रश्न सबके मन में उठ रहा है कि आखिर इस आंदोलन का अब क्या होगा? सरकार क्या करेगी? आंदोलनकारी क्या करेंगे? यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर इन्हें करना क्या चाहिए?

भारत में विपक्ष की भूमिका पर कोई टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है। विपक्ष को तो केवल मौका चाहिए। जहां नरेन्द्र मोदी सरकार विरोधी जमावड़ा होगा वहां सही-गलत का विचार करने की आवश्यकता नहीं है। गाजीपुर बॉर्डर पर जाने वाले नेताओं को पूरा देश देख रहा है। संसद का सत्र होने के कारण स्वाभाविक ही इसकी प्रति गूंज सुनाई देनी थी। आंदोलन आरंभ होने के समय से ही साफ था कि विपक्ष कृषि कानूनों के प्रावधानों पर बात करने की बजाय इसका हर संभव राजनीतिक उपयोग करेगा। विपक्ष ने अपनी राजनीति की दृष्टि से सरकार को घेरने, जनता की नजर में उसकी छवि खराब करने के रूप में इसे लिया है और उनकी पूरी भूमिका इसी के इर्द-गिर्द है। संसद के दोनों सदनों में प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए काफी कुछ कहा लेकिन जब विवेक से विचार किया जाए तभी तो इसका असर होता।

हालांकि यह आश्चर्य का विषय है कि ऐसे कानून, जिनकी मांग लंबे समय से की जा रही थी वे इस तरह विरोध और राजनीति का शिकार हो जाए। आरंभ में जब पंजाब से इसके विरोध में आंदोलन आरंभ हुआ तो किसी को कल्पना नहीं रही होगी कि यह इस सीमा तक पहुंच जाएगा कि इसकी गूंज विदेशों में भी सुनाई पड़ेगी। ठीक है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने सिर से बला टालने के लिए आंदोलन को दिल्ली तक भेजने और उसमें सहयोग करने की रणनीति अपनाई। कहा जा सकता है कि इस समय वे इसमें सफल हैं। हालांकि आगे भी ऐसी ही स्थिति रहेगी कोई नहीं कह सकता, पर तत्काल तो राजधानी में सिरदर्द की स्थिति कायम है। अकाली दल के सामने वोट बैंक खोने का जोखिम था। धीरे-धीरे स्थिति यह बनी कि देश में जितने भी छोटे – बड़े किसान संगठन चल रहे हैं उनको लगा कि अगर इसमें हमने शिरकत नहीं की तो हमारे संगठन का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। इस कारण बहुत सारे छोटे बड़े संगठन भी इसमें शामिल हो गए। इनमें वे संगठन भी हैं जिन्होंने आरंभ में कानूनों का समर्थन किया था। नरेंद्र मोदी, भाजपा व संघ विरोधी समूहों के लंबे समय से निष्क्रिय बैठे एक्टिविस्टों को भी अवसर और मंच मिल गया। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो किसी आंदोलन, धरना-प्रदर्शन में नहीं दिखे या सक्रिय नहीं रहे तो फिर उनके पास कोई काम ही नहीं होगा। इन सब के संपर्क में विदेशों में रहने वाले भी मोदी सरकार को बदनाम करने का एक महत्वपूर्ण अवसर मानकर सक्रिय हो गए। यहां से उनका सतत संवाद बना रहा। ऐसा ना होता तो हम कुछ देशों में आंदोलन के समर्थन में विरोध प्रदर्शन तथा वहां के सांसदों के बयान, अपनी सरकारों से, भारत सरकार से इस पर बात करने की मांग आदि घटनाएं नहीं देख पाते। अब तो पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन जैसे संगठन की वेबसाइट से आंदोलन को लेकर पूरी कार्ययोजना तक सामने आ गई है। यह डरावानी है और हर भारतीय को इसके खिलाफ खड़ा होना चाहिए, पर कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन करने वालों की परेशानियों पर बल तक नहीं पड़ रहे।

इस समय परिस्थितियों के कारण जो राकेश टिकैत अपना संगठन और अपना अस्तित्व बचाने के लिए आंदोलन में शामिल हुए थे वे इसके सर्वप्रमुख नेता बन चुके हैं। हालांकि राकेश टिकैत का मोदी विरोधी समूह नेताओं, दलों से लेना-देना नहीं रहा है; लेकिन आंदोलन ने उन सब को उनके साथ जोड़ दिया है। यह परिस्थिति पहले नहीं थी। टिकैत कह रहे हैं कि आंदोलन लंबा चलेगा। जब तक कानून वापसी नहीं तब तक घर वापसी नहीं। दूसरी ओर सरकार का पुराना स्टैंड है कि हम बातचीत कर सकते हैं, जिन-जिन प्रावधानों पर समस्याएं हैं उन पर स्पष्टीकरण दे सकते हैं, आवश्यकता के अनुसार उनमें संशोधन कर सकते हैं लेकिन कानून वापस नहीं कर सकते। प्रधानमंत्री ने विपक्षी नेताओं के साथ बैठक में कहा कि कृषि मंत्री का दिया हुआ प्रस्ताव अभी तक कायम है और मैं तो एक कॉल दूर हूं। यह परिस्थितियों को फिर से अनुकूल बनाने की एक सही कोशिश थी। प्रधानमंत्री ने संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए आंदोलनकारियों से आंदोलन वापस लेने की अपील की। उन्होंने यहां तक कहा कि ऐसा कौनसा कानून है जिसमेें संशोधन और बदलाव नहीं होता। हम कॉमा और फुलस्टॉप पर अड़े हुए नहीं हैं। उन्होंने कृषि और किसानों की दशा में सुधार के लिए किए गए सरकारी कार्यों का उल्लेख करते हुए बताया कि कानून उन्हीं कार्यों का एक कदम है। इसे लागू होने दीजिए, प्रभाव देखिए। इन बातों का असर तभी होता जब आंदोलनकारी और विपक्ष दोनों सही परिप्रेक्ष्य में विचार करने की मानसिकता में होते। इसमें प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अब आगे क्या?

वस्तुतः आंदोलन जिस अवस्था में पहुंच गया है, जो परिस्थितियां कायम हुईं हैं और जिस तरह के तत्व इसके निर्धारकों में प्रवेश कर गए हैं उनको मिलाकर विचार करें तो निष्कर्ष यही आएगा कि अब इसका यकायक अंत होना पहले से भी ज्यादा कठिन हो गया है। 26 जनवरी को जिस तरह से दिल्ली में ट्रैक्टर परेड के नाम पर हिंसा व दंगे हुए, कानूनों को अपने हाथ में लिया गया, उससे पूरे आंदोलन की छवि ज्यादा खराब हुई थी। देश में गुस्सा और आक्रोश का वातावरण था। वास्तविक किसान संगठनों और नेताओं के अंदर पश्चाताप था। आम भारतीयों की प्रतिक्रिया का उन पर असर था। कई संगठन पीछे हटे भी। यहां तक संसद के घेराव का घोषित कार्यक्रम तक वापस ले लिया गया। वह समय था जब आंदोलन समाप्त हो जाता। सारी परिस्थितियां संकेत दे रही थीं कि अनेक संगठन अब इस आंदोलन से अपने को अलग कर लेंगे। राकेश टिकैत ने भी मीडिया को बयान दे दिया था कि जाते-जाते मैं आप सबको बाइट देकर जाऊंगा। जो सूचना है, प्रशासन के साथ लगभग बात बन गई थी। वे सम्मानजनक विदाई चाहते थे। लेकिन पता नहीं क्या हुआ पूरी परिस्थितियां उलट गईं।

कुछ अन्य परिस्थितियों को भी देखिए। पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन या पीजेएफ और खालिस्तानी शक्तियों द्वारा इसका दुरुपयोग करके विदेशों से सरकार और वर्तमान भारत की छवि को बदनाम करने की साजिश भरी कार्य योजनाएं सामने आई हैं। ग्रेटा थनबर्ग, रिहाना, मियां खलीफा जैसों के ट्वीट से भी साबित हो रहा है। पीजेएफ के सह संस्थापक कनाडाई मो धालीवाल और मियां खलीफा के वीडियो से दिख रहा है कि ये किस तरह सक्रिय हैं। वास्तव में ये शक्तियां पूरी ताकत से अपनी कोशिशों को अंजाम देने में लगी हैं। इन सबको मिलाकर विचार करें तो आंदोलन से निपटने के मामले में सरकार के सामने चार बड़ी चुनौतियां हैं। जो शक्तियां अपने निहित स्वार्थों के कारण इस आंदोलन का सम्पूर्ण अपहरण करना चाहती हैं वे अपराध के विरूद्ध की जा रही मान्य तथा कानून के तहत उचित कार्रवाई को भी बड़ा मुद्दा बनाने की हरकत कर रही हैं। इसे किसानों पर जुल्म कहा जा रहा है। देश और देश के बाहर यह स्वर खूब सुनाई दे रहा है। चूंकि विश्व के ज्यादातर प्रमुख देशों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और सरकार का इतना प्रभाव है कि कोई सरकार विरोध करने नहीं आ रही है। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन टुडो ने अवश्य आरंभ में मूर्खतापूर्ण वक्तव्य दिया लेकिन अब उन्हें शांत होना पड़ा है। लेकिन ब्रिटेन से लेकर, अमेरिका, कनाडा आदि अनेक देशों में विरोधी शक्तियां पूरा जोर लगा रहीं हैं। ब्रिटेन में तो सिख सांसदों और नेताओं के कारण सांसदों के एक बड़े समूह ने सरकार से ही हस्तक्षेप की मांग कर दी। यह अलग बात है कि ब्रिटिश सरकार ने भारत से अच्छे संबंध होने तथा भविष्य में यह संबंध और गहराने का हवाला देकर इसमें किसी तरह सक्रिय होने से इन्कार कर दिया किंतु मोदी सरकार और भारत की समस्या तो बढ़ी ही है। इस नाते कहा जा सकता है कि एक छोटा सा फोड़ा आज नासूर बन गया।

शाहीनबाग से हम तुलना कर सकते हैं। उसमें मोदी विरोधी हर तरह के नकारात्मक तत्वोें का जमावड़ा इस आंदोलन में समाहित है। नागरिकता संशोधन कानून और कृषि कानूनों के चरित्र में अंतर है किंतु अन्य पहलुओं में शाहीनबाग का मामला अलग था। उसमें एक संप्रदाय विशेष के लोगों को भड़काने के साथ छंटे हुए मोदी और भाजपा विरोधी थे। उसके खिलाफ जगह-जगह लोग सड़कों पर उतर रहे थे। अभी तो यह प्रचार हो रहा है कि भैया यह कानून किसानों के विरुद्ध है, पूंजीपतियों के पक्ष में है, पूंजीपति हमारी जमीन ले लेंगे, न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म हो जाएगा आदि-आदि। जिन लोगों ने इस कानून को नहीं पढ़ा है उन किसान परिवारों के अंदर जो गलतफहमियां पैदा होंगी, उनको दूर करने के लिए काफी यत्न करने होंगे। इन चुनौतियों का एक साथ सामना करते हुए आंदोलन को खत्म कराना कितना कठिन है यह बताने की आवश्यकता नहीं किंतु कराना तो होगा। अनवरत काल तक हम मुख्य राजपथों को जाम कर राजधानी की आंशिक ही सही घेरेबंदी को जारी रहने नहीं दे सकते। वैसे इस आंदोलन का भविष्य अब केवल जारी रहने तक ही सीमित है। सरकार कृषि कानूनों को वापस नहीं लेगी। इस बीच उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति भी सुनवाई कर रही है। उसकी रिपोर्ट के बाद न्यायालय का भी फैसला आएगा। उससे भी एक संदेश जाएगा। यदि न्यायालय ने कानून में थोड़े बहुत संशोधन या इसमें कुछ और प्रावधान जोड़ने का फैसला देते हुए इसे सही ठहरा दिया तो आंदोलन का सैद्धांतिक आधार और कमजोर हो जाएगा। उस समय आंदोलनकारी क्या स्टैंड लेंगे यह देखना होगा। निश्चय ही इसकी तैयारी हो रही होगी किंतु तब सरकार के लिए कार्रवाई करना थोड़ा आसान हो जाएगा।

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