सिंध को कौन बचाएगा?

सिंधी हिंदुओं ने सबसे पहले इस्लाम का आक्रमण झेला। मुस्लमान आक्रमणकारियों को सिंध के हिन्दूे 400 वर्षों तक हराते रहे।
कुछ बौद्ध भक्तों ने इस्लामिक आक्रमणकारियों का साथ दिया और उसके फलस्वरूप सिंध के हिन्दुओं की हार हुई।

राजा दाहीर सिंध के आखरी राजा रहे और 1947 के बाद सिंधियों की जमीन भी छीन गयी। सिंधी समाज, एक वीर और सम्पन्न समाज रातोंरात शरणार्थी बन गया।

1947 के विस्थापन के बाद अनेक कष्टों को झेल कर आज अपनी पहली लड़ाई-सम्पन्नता की लड़ाई- जीत गए हैं।
अब वक्त आ गया है कि वह अपनी दूसरी लड़ाई की तैयारी शुरूे करें। दूसरी लड़ाई अर्थात अपने पूर्वजों की भूमि वापस लेने की लड़ाई।
मेरा मानना है कि आज की सिंधी पीढ़ी को शायद अपना गौरवशाली एवं बलशाली इतिहास ज्ञात भी नहीं होगा। मेरा सिंधी समाज से विनम्र निवेदन है किी वह राजा दाहीर की दो बेटियों द्वारा मुसलमान आक्रमणकारियोें से बदला लेने के इतिहास को अवश्य पढ़ें।
सिंधियों को यह समझना होगा कि जो समाज अपना इतिहास नहीं समझता उसका भविष्य भी नहीं होता। ऐसा समाज सिर्फ मजाक का विषय बन कर रह जाता है।

इसका उदाहरण है आईरिश समाज, जो आज भी अंग्रेजोें से अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहा है। आईरिश समाज हर प्रकार के मजाक का विषय बन चुका है। बृहद् समाज सिंधियों के गौरवशाली और बलशाली इतिहास को भूल गया है; क्योंकि सिंधी समाज भी अपने गौरवशाली और बलशाली इतिहास को भूल गया है।

आईरिश समाज की तरह कभी यहूदी भी मजाक का विषय थे। जैसे जैसे यहूदी अपना अधिकार इजरायल पर बढ़ाते गए, ये मजाक धीरे-धीरे कम होते गये।

मेरा इतना ही कहना है कि भारत का वह हिस्सा जो भारतीयों की गलती की वजह से भारत से अलग हो गया उसे वापस लेने में सिंधी समाज को नेतृत्व करें।

यहूदी समाज भी कभी इजरायल से पूर्ण रूप से इजरायल से विस्थापित हो गया था; परंतु धीरे-धीरे आज इजरायल पर उनका राज्य है।
सिंधी समाज न सम्पन्नता, न ज्ञान में विश्व में किसी से पीेछे हैं, जरूरत है तो सिंधी समाज को पहल करने की।
अगर सिंधी समाज ऐसा नहीं करता है तो पारसी समाज की तरह नष्ट हानेे लगेगा। डी. एन. ए. अखबार में 24 फरवरी 2010 को सिंधी समाज पर छपा लेख इसका एक उदाहरण है।

लेख के अनुसार पिछले दो वर्षों में 7000 सिंधियों ने हिन्दू धर्म छोड़कर, ईसाई धर्म को अपना लिया। यह संख्या पूरे भारत, या पूरे किसी राज्य की नहीें परंतु सिर्फ उल्हासनगर की है। इसमें अगर गहराई से देखें तो पता चलता है कि धर्म परिवर्तन करने वाले सभी की उम्र 40 साल से कम थी।

40 साल से कम उम्र की पीढ़ी को न शरणार्थी जीवन की जानकारी होगी न उससे जुड़े विषयों की। ऐसा तभी होता है जब युवा वर्ग को अपने समाज पर गौरव नहीं होता। ऐसे में युवा अपने धर्म को छोड़ देना बेहतर समझता है।

आज का सिंधी समाज एक सशक्त समाज है, जिसका इतिहास स्वतंत्र भारत में अत्यंत ही गौरवशाली है, जिस पर हर भारतीय को गर्व है और हर भारतीय सिंधु नदी में डुबकी लगाने को बेकरार है। निकट भविष्य में यह चाहत भी साकार होगी। प्रश्न यह है कि क्या यह सिंधी समाज के नेतृत्व में होगा?
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