राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सिंधी समाज

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जब भारत पर विभाजन की बिजली गिरी, तब सिंध प्रांत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य का आरंभ हुए केवल 9 साल ही बीते थे; लेकिन इतने कम समय में भी संघ ने वहां के सारे हिंदुओं के मन-मस्तिष्क में अपार लोकप्रियता प्राप्त कर ली थी। 7 अगस्त 1947 को प्ाू. श्री गुरुजी सिंध गए थे। उस समय वहां के हालात ठीक नहीं थे। वहां के हिंदुओं के मन में एक तरह का खौफ था और वे भारत में आना चाहते थे। उनका पाकिस्तान से भारत में स्थानांतरण बिना किसी असुविधा के हो, इस उद्देश्य से श्री गुरुजी ने वहां के सारे संघ स्वयंसेवकों को निर्देश दिया था कि अपने प्राणों की आहुति देकर भी वहां के हिंदू समाज की रक्षा करें। साथ ही स्वबंधुओं को भारत में वापस लाने के हर संभव प्रयास करने के लिए सभी का मनोबल भी ब़ढाया था। उस समय श्रीगुरुजी की सभाओं में लाखों की भी़ड जमा होती थी। उन्हें बहुत अधिक प्रतिसाद मिल रहा था।

सिंध प्रांत से सिंधी और पंजाबी बंधुओं को सुरक्षित भारत पहुंचाने के लिए संघ के स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों की बाजी तक लगा दी। इतना ही नहीं, जो बंधु पाकिस्तान में सब कुछ छो़डकर निर्वासित होकर यहां आए थे, उनके राहत एवं प्ाुनर्वास के लिए संघ ने यथासंभव प्रयास किए। संघ और सिंधी समाज के बीच जो नाता बन गया है उसे देखकर उन संबंधों का प्ाुनः स्मरण करना सर्वथा उचित लगता है।
केवल उन नौ सालों की कालावधि में संघ कार्य का विस्तार 54 प्रचारकों ने किया था। समाज के लिए कार्य करने हेतु अपने सुखी जीवन, काम-धंधा और करिअर से मुंह मो़डकर इतनी संख्या में निकलने वाले लोग देखकर मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना कितनी प्रबल थी, इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। इनमें से कई महान कार्यकर्ता विभाजन के बाद मुंबई में आ गए और पाकिस्तान से यहां आए निर्वासित बंधुओं के प्ाुनर्वास के लिए अथक परिश्रम करने में लग गए। अपने परिवार की जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए संघ कार्य को भी आगे ब़ढाने में उन लोगों ने योगदान दिया। मुंबई में स्थापित भारतीय सिंधु सभा और स्वामी विवेकानंद एज्ाूकेशन सोसायटी इनमें से ही कुछ स्वयंसेवकों के प्रयास का सुंदर नतीजा है।

संघ ने हमेशा चारित्र्य निर्माण पर ही बल दिया है और राष्ट्रीयता एवं देश प्रेम की भावना को विभिन्न उपक्रमों के माध्यम से समूचे भारतवासियों के मन में ब़ढावा देना संघ का कार्य ही है। संघ का सब से महत्वप्ाूर्ण उपक्रम होता है शाखा। हर दिन एक घंटे के लिए सब बंधु एकत्रित होकर कुछ कार्यक्रम करें, इसी को संघ शाखा कहा जाता है। यहां सारे स्वयंसेवक साथ मिलकर खेलते हैं, कसरत करते हैं और अनुशासन भी सीखते हैं। शाखा में देशभक्तिप्ाूर्ण गीतों का गायन होता है और समाज से जु़डी समस्याओं पर गंभीर चिंतन भी किया जाता है। शाखा के अंत में अपने देश को समृद्ध और वैभव के परमोच्च शिखर पर ले जाने हेतु कार्य करने का बल और आत्मविश्वास सभी में निर्माण हो, इस हेतु परमेश्वर से प्रार्थना की जाती है। संघ शाखा के माध्यम से जो संस्कार और सीख मिली थी उसकी विभाजन की विभीषिका के दौरान कसौटी हुई।

सिंध में संघ कार्य को अच्छा आकार दिलाने में श्री राजपाल प्ाुरी जी का बहुत ब़डा योगदान रहा है। प्रचारक के नाते काम करते हुए उन्होंने कार्य के नए कीर्तिमान स्थापित किए। सन 1939 में उन्होंने कराची से कार्य आरंभ किया और फुर्तीले नौजवानों का ब़डा गुट ख़डा किया जिसे देखकर इस बात की हिंदू समाज में ब़डी चर्चा होने लगी और प्रशंसा भी! प्रारंभिक काल में केवल गांधी, नेहरू और पटेल के बारे में ही ऐसी चर्चा होती दीखाई देती थी।

सिंध प्रांत में संघ कार्य का आरंभ करने हेतु संघ संस्थापक प.प्ाू. डॉ. के. ब. हेडगेवार जी ने श्री के. डी. जोशी को 1937 में सियालकोट भेजा था। श्री जोशी ने वहां जाकर एक महाविद्यालय में प्रवेश लिया था। उनकी प्ाुरी जी से वहीं मुलाकात हुई और जोशी जी ने उनको संघ की शाखा से जो़ड दिया। आगे संघ प्रचारक बनकर प्ाुरी जी हैदराबाद-सिंध में कार्य ब़ढाने निकल प़डे। संघ प्रचारक बनने की प्रेरणा उनको श्री नारायण प्ाुराणिक जी से मिली थी और वे पहले कराची गए, जहां सन 1938 में प्ाू. डॉक्टर जी ने श्री भिशीकर जी को एम.ए. का अध्ययन करने हेतु भेजा था। भिशीकर, वासुदेव मत्ता, जोगलेकर और जयंतीलाल व्यास ने मिलकर वहां संघ शाखा की शुरुआत की थी।
उस समय कराची में करीब 25000 महाराष्ट्रीयन, पंजाबी और गुजराती लोगों का निवास था। यहां संघ का कार्य सुदॄढ रूप से विकसित करने हेतु और संघ का सिंध के हरेक कोने में विस्तार करने हेतु प्ाुरी जी अपने फुर्तीले नौजवान प्रचारकों को लेकर जुट गए और विभाजन तक वहां पर संघ कार्य अच्छे तरीके से और बेेखौफ चला था। अपनी ईमानदारी और आकर्षक व्यक्तित्व के कारण प्ाुरी जी कर्मठ कांग्रेसी नेताओं को भी संघ के समर्थक बना देते थे।

इन समर्पित कार्यकर्ताओं में स्व. झमटमल वाधवानी, हशु आडवानी, मनसारमानी, के. आर. मलकानी, वासुदेव वालेचा आदि का समावेश होता है तथा लालकृष्ण आडवानी, हरि आत्माराम, मोहन मोटवानी जैसे कई लोग तो आज भी सक्रिय हैं।

वैसे सिंध तो मुस्लिम बहुल प्रांत था इसलिए वहां हिंदुओं के साथ बुरा सलूक किया जाता था और उन्हें अपमानित भी किया जाता था, मगर जैसे-जैसे संघ कार्य का विस्तार होने लगा और समाज संगठित होने लगा वैसे-वैसे हिंदुओं में आत्मविश्वास जागृत हो गया और अन्याय-अत्याचार के खिलाफ वे मुंहतो़ड जवाब देने में समर्थ हो गए। हिंदू समाज अपना जीवन सुख से जीने लगा था। उस समय सिंधी समाज भारत के सब से समृद्ध समाजों में से एक के रूप में जाना जाता था। व्यापार-उद्योग, सरकारी नौकरी और भूमि पर इस समाज का ही अधिकार था।
प्ाू. श्री गुरुजी जब अखिल भारतीय प्रवास पर निकलते थे तब नियमित रूप से सिंध प्रांत में संघ कार्य विस्तार हेतु आया करते थे। उनका सिंध में सन 1943, 1945, 1946 और अंतिम 1947 में भारतीय स्वतंत्रता की औपाचारिक घोषणा होकर विभाजन लागू होने के केवल एक सप्ताह प्ाूर्व प्रवास हुआ था। बालासाहब आपटे जैसे ज्येष्ठ कार्यकर्ताओं का भी सिंध में प्रवास हुआ है।

प्ाू. श्री गुरुजी की कराची में 5 अगस्त 1947 को जो सभा हुई वह सचमुच ऐतिहासिक थी। उस समय सिंध में सिंधी समाज की जनसंख्या 13 लाख थी और उसमें से 3 लाख लोग तो कराची में ही रहते थे। इस सभा में एक लाख लोग आए थे। प्ाूजनीय दादा वासवानी जी भी इस सभा में पधारे थे। प्ाू. गुरुजी की दूसरी सभा हैदराबाद-सिंध में 7 अगस्त 1947 को हुई। वहां सिंधी समाज की जनसंख्या 60,000 थी और इस सभा में करीब 30,000 लोग उपस्थित थे; इसलिए प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से संघ से जिसका संबंध नहीं हुआ होगा, ऐसा सिंधी मनुष्य प्ाुरानी पी़ढी में अपवाद स्वरूप ही पाया जाता था।

जैसे-जैसे स्वाधीनता और विभाजन का दिन करीब आने लगा वैसे -वैसे सिंध के लोग भारत में स्थानांतरित होने लगे थे। लेकिन करीब 1 लाख हिंदू अभी भी कराची में ही थे। मार्च 1947 में कराची रिलीफ फंड का गठन हुआ और मई 1947 तक पांच लाख की निधि एकत्रित हो गई थी। श्री राजपाल प्ाुरी और खेमचंद मनसुखानी की अगुवाई में यह निधि संकलित किया गया था। श्री विजय कुमार तेजवानी ने जी-जान लगाकर काम किया था। पंजाब के मुख्यमंत्री भीमसेन सच्चर को यह निधि सौंपा गया। अपना सब कुछ छो़डकर भारत में आने वाले बेघर लोगों की सहायता के लिए जे. बी. मंगाराम और किशनचंद चेलाराम ने धन का प्रावधान किया था।

हरि आत्माराम समतानी जैसे कुछ स्वयंसेवकों ने राजस्थान, गांधीधाम, उल्हासनगर और अन्य भागों में निर्वासित बंधुओं के लिए मकान बनवाए थे। भारत में आए लोगों के श्री टेकचंद मिरप्ाुरी जी ने अजमेर जाकर हिंदू समिति की स्थापना की थी। विभाजन के प्ाूर्व ही कांग्रेसी नेता सिंध छो़डकर जा चुके थे। मगर वहां के स्वयंसेवक लोगों की सहायता करने हेतु आखिर तक डटे रहे। राष्ट्र सेविका समिति ही एकमात्र संगठन वहां बचा था, जोे इस दौरान सभी की सहायता करने में प्रयासरत था।

आत्मरक्षा हेतु कुछ बंदूकें और बम बनाने की सामग्री कराची के एक मकान में रखी गई थी, मगर दुर्भाग्यवश 9 सितंबर 1947 को वहां अचानक ब़डा विस्फोट हो गया। श्री प्रभु बबलानी नामक स्वयंसेवक की उसी स्थान पर मृत्यु हो गई। श्री वासुदेव गबा नामक स्वयंसेवक बुरी तरह से घायल हो गए और बाद में प्ाुलिस हिरासत में उनकी रहस्यमय ढंग से मौत हो गई। एक बी.ई. विद्यार्थी नंद बादलानी और गोविंद अजवानी को भी प्ाुलिस ने हिरासत में लिया। इसके बाद कई स्वयंसेवकों को भी प्ाुलिस ने हिरासत में लिया और उन सभी को बेहद यातनाएं दी गईं। उनमें से कुछ लोगों को एकांतवास में रखा गया। एक साल के बाद उन पर मुकदमे चलाए गए और उन्हें क़डी सजाएं सुनाई गईं तथा जुर्माना भी भरने को कहा गया। 1948 में कैदियों की अदला-बदली होने पर ही इन लोगों को कैद से आजादी नसीब हो सकी, क्योंकि जिन्ना का एक करीबी दोस्त भारतीय जेल में था। इस गुट को कानूनी मदद करने हेतु कुछ स्वयंसेवकों को कराची में पीछे रहना प़डा था। इन स्वयंसेवकों में सर्वश्री झमटमल वाधवानी, हशु अडवानी, आर. के. तुलसियानी, हरि आत्माराम, लछमन मताई, विजय कुमार तेजवानी और नारायण भावनानी का समावेश था। कुछ अन्य लोगों की मदद से इन लोगों ने पाकिस्तान में फंसे अन्य हिंदू बंधुओं की मदद की। ये लोग 1948 में ही भारत में सकुशल लौट पाए।

भारत में लौटने के बाद भी अपने समाज की सहायता के लिए इनमें से कई बंधुओं ने अथक परिश्रम शुरू रखे थे। कुछ स्वयंसेवक संघ प्रचारक बनकर और अन्य स्वयंसेवक अन्यान्य संगठनों में प्ाूर्ण कालीन कार्यकर्ता के रूप में काम करने लगे। राजपाल प्ाुरी, झमटमलजी, हरि आत्माराम, हशु अडवानी, मनसारमाणी, वालेचा जैसे कुछ प्ाुराने साथी मुंबई में आने के बाद साथ मिलकर अपनी अंतिम सांस तक कार्यरत रहे। कन्याकुमारी स्थित विवेकानंद शिला स्मारक के कार्य के पीछे प्ाुरी जी प्रेरणा प्ाुरुष के रूप में ख़डे थे।
केवल भारत में ही नहीं, बल्कि सिंधी समाज के लोग व्यवसाय हेतु विश्व के जिस किसी देश में गए, वहां भी अन्यान्य संगठनों के माध्यम से अपने समाज की सेवा हेतु कार्यरत रहे हैं।

संघ और सिंधी समाज में एक अटूट नाता बन गया है जो खून और स्वेद से सिंचित हुआ है। राष्ट्र निर्माण के कार्य में सिंधी बंधुओं ने अपने अपरिमित प्रयासों के माध्यम से योगदान दिया है। विभाजन के प्ाूर्व और विभाजन के बाद भी सरकार द्वारा उनकी ओर उचित ध्यान नहीं दिए जाने पर भी इस कार्य में वे कभी पीछे नहीं हटे और संकटों से घिर जाने के बाद भी कार्य में डटे रहे।

मातृभूमि के प्रति भारी स्नेह और समर्पण की भावना की यह परम्परा सिंधी समाज ने अपनी अगली पी़ढियों को भी विरासत में दी है।

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