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मणिपुर में प्रचार माध्यम तेजी से बढ़े हैं। अखबारों से लेकर स्मार्ट फोन तक सब कुछ आ गया है। लगता है अब तक ‘आउट आफ रीच’ रहने वाली यह दुनिया फुल रेंज में आ गई है। कम से कम अभी तो ऐसे ‘सिग्नल’ इस पहाड़ी क्षेत्र की हवा में निश्चित ही महसूस किए जा सकते हैं।

      भारत को प्रजातांत्रिक स्वरूप प्राप्त होने के  बाद स्वाभाविक रूप से समाचार पत्रों को प्रजातंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में देखा जा रहा है। समाचार पत्रों का स्वरुप प्रारम्भ से ऐसा नहीं था जैसा आज है। समय के साथ साथ यह विकसित होता गया। दुनिया का पहला समाचार पत्र १८०६ में प्रकाशित हुआ। उसके १५० वर्षों बाद भारत में पहला समाचार पत्र प्रकाशित हुआ। बालशास्त्री जाम्भेकर को समाचार पत्र जगत का जनक कहा जाता है। देश के पूर्वोत्तर राज्यों पर भारत का अधिकार तो सभी जताते हैं, पर वहां के निवासी हमारे अपने हैं ऐसा कितने लोग मानते हैं? इसीलिए देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा मणिपुर राज्य के प्रचार-संवाद माध्यम को समझाना अधिक महत्वपूर्ण है।

 समाचार पत्र

 हिजम इर्बोट सिंग ने सन १९२५ में ‘मैतेथी चानू’’ नामक पहला समाचार पत्र मणिपुर राज्य में प्रकाशित किया। ५-६ ज्वलंत प्रश्नों को उठाने वाले इस समाचार पत्र के सात वर्ष बाद गोकुलचंद्र ने ‘‘दैनिक मणिपुर’’ नाम से समाचार पत्र प्रकाशित किया। आस-पास के सात प्रातों तक यह समाचार पत्र प्रसारित होता था। सामाजिक तथा राजनीतिक मुद्दे, अंग्रेजों को हिला देने वाले लेख तथ स्वतंत्रता की चिंगारी भड़काने वाले विचारों को प्रकाशित करने वाला यह राष्ट्रवादी समाचार पत्र, ब्रिटिश सरकार द्वारा कुछ समय में ही बंद कर दिया गया। १९७२ में मणिपुर राज्य की स्थापना के समय जहां  समाचार पत्रों की संख्या केवल छः थी, वहां १९८२ के अंत तक २६ दैनिक तथा १३ साप्ताहिक समाचार पत्र प्रकाशित होने लगे। सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक विकास व सामाजिक परिवर्तन की दिशा में समाचार पत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे।

 राज्य में बढ़ती हिंसात्मक घटनाओं के साथ दिनोंदिन सामाजिक तथा प्रशासनिक समस्याएं बढने लगीं। इन हिंसक घटनाओं पर रोक लगाने के लिए केन्द्र सरकार ने सुरक्षा दलों को जो विशेषाधिकार दिए वे भी विवाद का कारण बने। सामान्य जनता को समाचार पत्र ही जानकारी प्राप्त करने का प्रभावशाली माध्यम लगने लगे। यहां साक्षरता का अनुपात अधिक होने के कारण अधिकांश लोगों को अंग्रेजी का ज्ञान है। स्थानीय भाषा के साथ १८ अंग्रेजी समाचार पत्र यहां प्रकाशित होते हैं। अल्पशिक्षित तथा ग्रामीण समाज में स्थानीय भाषा के तो उच्च वर्ग में अंग्रेजी समाचार पत्र पढ़े जाते हैं। राजधानी इम्फाल में ‘संगाइ एक्सप्रेस’ व ‘ह्युमेन लाम्पो’ ये सर्वाधिक लोकप्रिय समाचार पत्र माने जाते हैं। समाज के प्रत्येक घटक का प्रतिनिधित्व करने वाला तथा विचार मंथन करने वाला यह माध्यम वहां की जनता का एक अविभाज्य हिस्सा है।

 आकाशवाणी

 जनसम्पर्क, वैचारिक संवाद, जानकारी का प्रसार, मनोरंजन, भाषण तथा मार्गदर्शन के लिए मीडिया एक प्रभावी साधन है। १६०५ में हुई समाचार पत्र क्रांति के बाद १९०१ में मार्कोनी नामक इतालवी भौतिकशास्त्री ने आकाशवाणी माध्यम का आविष्कार किया। १९२७ में भारत में एक निजी कम्पनी ‘इंडियन ब्राड़कास्टिंग कम्पनी’ ने तत्कालीन सरकार के साथ अनुबंध कर सबसे पहले मुंबई तथा कोलकाता में आकाशवाणी के केन्द्रों की शुरुआत की। इसके पूर्व आकाशवाणी का प्रसार इलाहाबाद, पेशावर, डेहरादून, मैसूर, बड़ोदा, त्रिवेन्द्रम, हैदराबाद तथा औरंगाबाद में शौकिया क्लबों द्वारा होता था। ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ इस घोषवाक्य के साथ ‘आकाशवाणी’ यह नामकरण १९३५ में मैसूर राज्य ने किया, जिसे भारत सरकार ने आगे भी चलाया। शहर के साथ साथ गावों तक सम्पर्क का एक नया साधन हर स्तर के लोगों को प्राप्त हुआ।

 मणिपुर राज्य की राजधानी इम्फाल में चार रेडियो स्टेशन हैं, जिसका संचालन आकाशवाणी इम्फाल के नियंत्रण में है। प्रत्येक आयु वर्ग के लोगों की रुचि के अनुसार कार्यक्रमों का निर्धारण व प्रसारण किया जाता है। यद्यपि भौगोलिक विविधता के कारण कई बार प्रसारण में अवरोध उत्पन्न होता है, फिर भी उस समस्या के निदान में स्थानीय सरकार ईमानदारी से प्रयास कर रही है।

 दूरदर्शन

 प्रसार क्रांति का विचार करते समय समाचार पत्र तथा आकाशवाणी के बाद दूरदर्शन का क्रम है। ध्वनि तथा चित्र एक साथ एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजे जा सके इस इच्छाशक्ति के चलते १९२० में सबसे पहले अमेरिका में प्रायोगिक तौर पर टेलीविजन का जन्म हुआ। १९३० के आसपास न्यूयार्क में एन.बी.सी. और लंदन में बी.बी.सी केन्द्रों की शुरुआत हुई। फिलिप्स इंडिया ने १९५९ में शैक्षणिक एवं सामाजिक उद्देश्य को ध्यान में रखकर भारत को एक प्रक्षेपक बनाकर दिया।

 एक अप्रैल १९७६ में भारत सरकार ने ‘सत्यम् शिवम् सुदरम्’ इस घोषवाक्य के साथ टेलीविजन को ‘दूरदर्शन’ नाम दिया। १९९१ में देश में निजी चैनल्स का प्रवेश हुआ। वह सब बताने की आवश्यकता इसीलिए है कि मणिपुर राज्य के गांवों तक पहुंचने में दूरदर्शन को १९७६ तक का समय लगा। आज ग्रामीण अंचल में हर घर में रंगीन टी.वी. है। एयरटेल, टाटा स्काय, कम्पनियों की सेवाएं यहां लोकप्रिय हैं। कुछ आतंकवादी गुटों ने एम.टी.वी., एफ.टी.वी. तथा वी चैनल्स पर प्रतिबंध लगा कर रखा है। स्थानीय भाषा के कार्यक्रमों के साथ साथ हिन्दी सिरियल, तथा हिन्दी सिनेमा भी यहां के लोगों में लोकप्रिय हैं।

 मोबाइ्रल- इन्टरनेट

 सम्पर्क माध्यम में मोबाइल तथा इंटरनेट के कारण क्रांतिकारी परिवर्तन आया। जनसामान्य का जीवन, उसका व्यवहार, विचार तथा विचारों का आदान-प्रदान इतना ही नहीं तो दुनिया को देखने का दृष्टिकोण तथा व्यवहार की शैली भी इससे बदलते जा रही है। मोबाइल का आफलाइन होना, कवरेज के बाहर जाना, बैटरी डाउन होना, व्यक्ति को असहज बना देता है, चिंतित कर देता है।

 रेलवे के लिए दुनिया में नं.२ पर रहने वाले भारतीय रेलवे के नक्शे में मणिपुर राज्य आज भी दिखाई नहीं देता। २००६ में भारत सरकार ने जिरीबाम-इम्फाल-मोरेह रेलवे लाइन २०१६ तक पूरा करने का तय किया था। परंतु वह २०२० तक भी पूरी हो पाएगी इसमें शंका है। इस काम के लिए तो किसी ई.श्रीधर जैसे व्यक्ति की आवश्यकता है।

 सुरक्षा सम्बन्धी जानकारी के आदान प्रदान के लिए १९६९ में अमेरिकी सुरक्षा विभाग के रिसर्च विंग ने अठझएछएढ नेटवर्किंग की शुरूआत की। यही पहला यहां का इंटरनेट है। १९९५ के बाद दुनिया भर में इंटरनेट सेवा में देने वाली कम्पनियों के इंटरनेट भी प्राप्त होने लगे। मणिपुर राज्य के इम्फाल, थाड़वल क्षेत्र में इंटरनेट का सर्वाधिक उपयोग दिखाई देता है। इस का उपयोग करने का उनके पास ज्ञान भी है। लोग स्मार्टफोन तथा अन्य मोबाइल फोन में भी इंटरनेट का उपयोग करते दिखाई देते हैं। एयरटेल का वहां एकाधिकार है।

 मोरेह भारत की सीमा का अंतिम गांव है। इस गांव से म्यांमार की सीमा लगी हुई है। भौगोलिक रूप से मण्डाले (म्यांमार) और मोरेह (मणिपुर) का बड़ा अंतरंग सम्बंध है। पांच वर्ष पूर्व तक मोरेह में किसी भी मोबाइल की रेंज नहीं थी। बी.एस.एन.एल. ने यहां नेट जाल बिछाया। तो अब यहां फुल रेंज उपलब्ध है। नए नए आए इस ‘कनेक्ट’ बदलाव ने यहां का जीवन अधिक सुगम कर दिया है।

 ऐसा लगता है अब तक ‘आउट आफ रीच’ रहने वाली यह दुनिया फुल रेंज में आ गई है। कम से कम अभी तो ऐसे ‘सिग्नल’ इस पहाड़ी क्षेत्र की हवा में निश्चित ही महसूस किए जा सकते हैं।

       संकलित

 

 

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