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*****हरमन चौहान*****

 ‘‘मेरी तो आपसे इस दीपावली के मौके पर यही गुजारिश है कि आप ‘लक्ष्मी नंबर दो’ और ‘गृहलक्ष्मी नंबर दो’ का विचार ही मन में न लाएं और ‘विरहाकुल लक्ष्मी नंबर एक’ को नमन करें, पूजा करें।’’

      मुझे मेरे गांव की उस ‘गृहलक्ष्मी नंबर एक’ की     याद आ रही है, जिसका भरापूरा परिवार था, जिसके सास-ससुर, देवर-देवरानियां, ननदें आदि भोर से लेकर देर रात तक उसकी व्यस्तता में हाथ बंटाते, स्नेह उड़ेलते रहते। उसके अपने बच्चों के साथ घर के सारे बच्चे दिन भर आंगन से लेकर खेत-खलिहान तक किलकारियां भरते। उसका पति जो जहां तक उसका वश चलता, प्यार दर्शाने के लिए उसकी आंखों से ओझल ही नहीं होने देता था। रात का खाना खाने के बाद देर रात तक ढोलक-मंजीरों के साथ नाच-गाने चलते या फिर बुजुर्गों द्वारा लोक-कथाएं सुनाई जातीं। ऐसे सुखी परिवार पर एक दिन अचानक बिजली गिरी, घर में उसके पति की शह पर ‘गृहलक्ष्मी नंबर दो’ आ धमकी। कुछ ही दिनों में नंबर दो हावी हो गई और नंबर एक को पति ने भुला सा दिया। पत्नी सौतन से दुखी, विरह में व्याकुल रहने लगी। घर के सारे लोग तनावपूर्ण स्थिति में रहने लगे। नतीजा यह हुआ कि घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गई, शांति भंग हो गई।

 दीपावली पर अगर इसी कथा को आज मैं देश के संदर्भ में लूं तो शायद गलत नहीं है। काले धन वाली ‘लक्ष्मी नंबर दो’ अब ‘लक्ष्मी नंबर एक’ पर हावी है और हम काले धन के बोझ से लदे जा रहे हैं। दिन-दिन आर्थिक स्थिति से देश की हालत खराब होती जा रही है। सफेद ‘लक्ष्मी नंबर एक’ इस विरह से व्याकुल है। पहले ‘नंबर एक’ या ‘नंबर दो’ लक्ष्मी होती ही नहीं थी? लक्ष्मी बस लक्ष्मी ही होती थी, जिसे हर भारतीय नमन करता था, करता आया है और करता रहेगा।

 मेरा गांव सारा, जिस तरह उस ‘गृहलक्ष्मी नंबर दो’ से जूझ रहा था, आज उसी तरह मेरा पूरा देश ‘लक्ष्मी नंबर दो’ से जूझ रहा है। इसे कौन जूझा रहा है और कौन जूझ रहा है? काला-धनवाले हमें जूझाने के लिए जोर शोर से चिढ़ा रहे हैं और हम चिढ़ कर क्षुब्ध होकर मन ही मन कुढ़ रहे हैं, बस? क्योंकि हम हर तरह से लाचार हैं। गांव में जिस तरह परिवार का मुखिया लाचार था। आह, आज उसी तरह सरकारों के मुखिया लाचार हो रखे हैं। बात दरअसल यह है कि मेरे गांव का वह मुखिया अपने बेटे से मिला हुआ था, इसी तरह से कहीं हमारे देश के मुखिया लोग काला धन बटोरने वालों से मिले हुए तो नहीं हैं? सुखराम, लालू और ललिता जैसे मुखिया जेल जाकर लौट आएंगे और वह भी सीना तानकर कहेंगे कि ‘हम जेल जाकर आएं हैं।’ कहते हैं कि कानून के हाथ लंबे होते हैं। मुझे तो लगता है कि ‘लक्ष्मी नंबर दो’ ने कानून के हाथ काटकर रख दिए हैं।

 कानून अंधा होता है, लेकिन अदालत के परिसर में न्याय दिलाने वाले फिर काले कपड़े क्यों पहनते हैं? इसलिए कि काले कारनामें करने वालों को जितवा कर या छुड़ाकर वे बेदाग बने रहें? काले पर काला रंग कहां रंग लाएगा? हां, सफेद दाग लग भी गया तो समाज उसे बुरा नहीं मानता। है ना विडम्बना वाली बात? यह काले कपड़े और काले कानून ‘गोरों’ की देन है, क्योंकि हमें काला माना जाता है! विडम्बना है ना?

 इस देश में जितनी भी समस्याएं हैं, वे सभी विडम्बनाओं से भरी हैं। क्या यह विडम्बना नहीं है कि हम जो कुछ खा रहे हैं, वे सभी असली है? हर चीज में मिलावट, हर चीज नकली! कोई कानून की गिरफ्त में आ भी गया तो ‘लक्ष्मी नंबर दो’ आगे करके छूट जाएंगे। यहां फांसी लगाने का रिवाज ही नहीं है तो कोई क्यों डरे? दो-चार-महीने की सजा काटकर वही दो नंबर का धंधा शुरू? बड़े-बड़े फाइव स्टार आलिशान होटलों में क्या मुझ जैसा जा सकता है? वहां केवल विदेशी सैलानी ही नहीं जाते, बल्कि ज्यादातर लोग अपने ही ‘लक्ष्मी नंबर दो’ वाले जाते हैं। वहां वे लक्ष्मियों के साथ पॉप संगीत के साथ नाचते हैं, थिरकते हैं। आप आश्चर्य न करें, वहां पर उनके साथ उनकी ‘महालक्ष्मी नंबर दो’ ही होगी। अब ‘गृहलक्ष्मी नंबर दो’ रखने का इज्जतदार रिवाज हो गया है। असली गृहलक्ष्मी तो बेचारी आधी रात को विरह में रोकर सो रही होगी? एक पत्नी रखने के कानून की आज धज्जियां उड़ायी जा रही हैं। सरकार जानती है कि उसके अफसर ने दो पत्नियां रखी हैं, लेकिन ऐसों को ‘गृहलक्ष्मी नंबर दो’ के कारण पदोन्नतियां मिल ही जाती है या फिर भ्रष्टाचार से कमाया हुआ धन आगे करके।

 हमारी भारतीय संस्कृति में दीपावली पर केवल एक ही लक्ष्मी को पूजा नहीं जाता है, बल्कि अलग-अलग लक्ष्मियों को अलग-अलग प्रकार से पूजा जाता रहा है। उसमें धनलक्ष्मी, वैभवलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, अधिलक्ष्मी, विजयालक्ष्मी, ऐश्वर्यलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी और महालक्ष्मी आदि प्रमुख हैं। इनकी अपनी कथाएं हैं, जिनका आदर से हमारे परिवार की गृहलक्ष्मियां पाठ-श्रवण करती रही हैं। कई आज भी करती हैं, और आगे भी करती रहेंगी, इस परंपरा को कोई तोड़ नहीं सकता। ऊपर जो नाम मैंने गिनाए हैं, उन लक्ष्मियों की छवि देखिए। देखते ही आप श्रद्धा से मोहित हो जाएंगे। धनलक्ष्मी कमल पुष्प पर सरोवर के बीच विराजमान हैं और दो हाथों में घड़े से धन उड़ेल रही हैं। अन्य लक्ष्मियां विराजमान तो कमल पुष्प पर ही हैं, लेकिन अपने-अपने रूप- कोई शंख, सुदर्शन चक्र, तलवार, ढाल, गदा और धान की बालियां लिए हुए हैं। ये हमारी संस्कृति की प्रतीक हैं, यही हमारा आदर्श रहा है। ये लक्ष्मियां चिह्नों के साथ सभी वस्त्रों से सजी-धजी, माथे पर बिंदी लगाए गहनों से लदी-सजी हैं। पूरा रूप देखकर ऐसा लगता है, जैसे ये हमारे घर की ही आदर्श गृहलक्ष्मी हों। इसीलिए हमारे घरों में गृहिणी को ‘लक्ष्मी’ कहते हैं और उसी भांति पूजते हैं – यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते देवता तत्र!

 यह तो हुई ‘लक्ष्मीजी और गृहलक्ष्मी नंबर दो’ की बात। आज समय बदल गया है और समय के साथ यह जो – ‘लक्ष्मी नंबर दो’ इस देश की एक प्रमुख समस्या उभर कर आई है, ठीक उसी तरह ‘गृहलक्ष्मी नंबर दो’ की भी समस्या गंभीर है। इसकी छवि भी निराली है, इसके रूप आठ-दस नहीं, अनेक हैं। उन अनेक रूपों को आप देखते ही आए हैं, तो मैं उन्हें कहां तक गिनाऊं? हां, ये ‘बिंदी’ नहीं लगाती हैं, ‘टीकी’ माथे पर चिपकाती हैं। इस देश में जैसे हिंदी की फजीहत हो रही है, वैसे ही बिंदी की फजीहत ये ‘लक्ष्मियां’ कर रही हैं। घरों में, होटलों में, क्लबों या दफ्तरों में, रेलों या बसों में! जड़े आईनों पर, बैडरूम के पलंगों पर, सीटों पर, बाथरूम में, कहने का मतलब है कि इनकी ये ‘टिकियां’ हर जगह चिपकी या फिर नीचे जमीन पर गिरी मिल जाएंगी। कपड़े तो ये लक्ष्मियां, इनका बस चलता तो पहनती ही नहीं! यह इनकी मजबूरी है कि शरीर के ‘दो-तीन अंग’ छिपाने के लिए कुछ पहनना पड़ता है, जिसे ये फैशन मानती हैं। बेचारे आदिवासी सुधर रहे हैं, लेकिन ये उधर की ओर न जाकर, विदेशी संस्कृति की ओर जा रही हैं। दो नंबर का धन कमाने के लिए ये फाइव स्टार होटलों से लेकर विश्व सुंदरी के खिताब लेने दौड़ रही हैं। फैशन परेड में, टीवी चैनलों पर, फिल्मों में खुली छाती, कूल्हे मटकाती मर्दों को रीझा रही हैं। मैं देख-देख कर आपकी ही तरह से खीझ रहा हूं और गा रहा हूं – क्या जमाना आ गया दोस्तो? दो नंबर का धन जुटाने वाली ऐसी लक्ष्मियों को देखकर आप में जरा भी राष्ट्रबोध और भारतीय संस्कृति की उस ‘लक्ष्मीजी’ की छवि स्मरण है तो क्षुब्ध हो लेंगे, लेकिन कर क्या सकते हैं? मेरी तो आपसे इस दीपावली के मौके पर यही गुजारिश है कि आप ‘लक्ष्मी नंबर दो’ और ‘गृहलक्ष्मी नंबर दो’ का विचार ही मन में न लाएं और ‘विरहाकुल लक्ष्मी नंबर एक’ को नमन करें, पूजा करें। मेरी यही प्रार्थना है कि आपके जीवन में धवल समृद्धि, नवल सिद्धि और हृदय में अनुराग आए। समाज में सौहार्द, राष्ट्र में गरिमा और विश्व में शांति एवं सहिष्णुता लाए। क्या आप मेरी तरह अब भी लाचार हैं? लेकिन एक बात कह दूं, मैं लाचार हो सकता हूं, पर मेरी कलम तो लाचार नहीं हैं! आपके सामने प्रमाण है – हाथ कंगन को आरसी क्या?

 मो ०९५०९१५९५१४

 

 

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