गद्दारी के गढ़ तोड़े जाएं

देश में जेएनयू और ऐसे ही वामपंथी ज़हर में रचे-पगे दूसरे संस्थानों में भी बदलाव के लिए देशवासियों की इच्छाशक्ति तैयार हो रही है। सामान्य देशवासियों की मांग है कि शिक्षा संस्थानों में फैल रही इस ज़हरीली हवा की रोकथाम की जाए। दूध पीकर विष उगलना अब स्वीकार्य नहीं है। …बोलने की आज़ादी देश से गद्दारी करने का लाइसेंस नहीं है।

जब दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों के एक गुट द्वारा देश विरोधी नारेबाजी को लेकर मीडिया और सोशल मीडिया में प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हुई उसी समय देश के उन पूर्व सैनिकों, जो कभी इस संस्थान के छात्र रहे थे, ने जेएनयू से हासिल की गई अपनी डिग्रियां लौटाने की पेशकश की। उनका कहना था कि जिस संस्थान में निर्दोष नागरिकों के हत्यारे आतंकियों के समर्थन और देश के विरोध में नारे लगाए जा रहे हों उस संस्थान की डिग्री रखने में उन्हें अपराधबोध का अनुभव होता है। ऐसे मामले पर हर भारतीय का आक्रोशित होना स्वाभाविक है लेकिन एक सैनिक का खून किस कदर खौलता है इसका अंदाज़ा किसी सैनिक के पास बैठ कर ही लगाया जा सकता है जिसने अपनी जान की बाज़ी लगाकर गोलियों और बमों के साये में जिंदगी के कई दशक गुजारे हैं, अपने बच्चों का बचपन और घर का सुकून आंखों में बसाए सीमा की चौकसी की है, और अपने साथियों का बलिदान होते देखा है। जिस समय देश सियाचिन में अपनी जान चढ़ाने वाले नौ सैनिकों का शोक मना रहा था और हनुमंतथप्पा (अब स्वर्गीय) की जीवन रक्षा के लिए हवन और प्रार्थनाएं कर रहा था, ठीक उसी समय जेएनयू में वामपंथी छात्र संगठन के नेता कुछ सियासती लोगों के एजेंडे को ध्यान में रख कर देश-विरोधी कृत्यों को हवा देने और सनसनी फैलाने की तैयारी कर रहे थे।

टीवी चैनलों पर लोग देख सुन रहे थे जब देश के एक जानेमाने शैक्षिक संस्थान में नारा लग रहा था कि हम क्या चाहें आजादी, हक हमारा आजादी। कह कर लेंगे आजादी, कश्मीर मांगे आजादी। केरल मांगे आजादी।

भारत मुर्दाबाद्। पाकिस्तान जिंदाबाद्। …. अफजल गुरु तुम जिंदा हो, हर एक लहू के कतरे में। और अफज़ल! तुमने हमारा सपना साकार किया। अफज़ल ने ऐसी कौनसी बहादुरी की थी? क्या था ये सपना? सपना था भारत की संसद पर हमला। इस हमले में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल जी और अन्य केंद्रीय नेतृत्व की ह्त्या की कोशिश। देशवासी अवाक हैं कि जिस संस्थान के प्रत्येक छात्र पर देशवासियों की गाढ़ी मेहनत की कमाई का लाखों रुपया खर्च हो रहा है (जबकि करोड़ों बच्चों को प्राथमिक शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है) उस संस्थान के अंदर देश के गद्दार पल रहे हैं और उनका दुस्साहस इतना, कि देश की संप्रभुता को खुलेआम चुनौती दे रहे हैं। अपने बच्चों के जैसे-तैसे पढ़ा लिखा कर उनका भविष्य संवारने में जुटा सामान्य नागरिक सोच रहा है कि चमक-दमक और संसाधनों से परिपूर्ण देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों को पढ़ाई के अतिरिक्त देशघाती कार्य करने की प्रेरणा और समय कहां से मिलता है?

ऐसा जेएनयू में हमेशा होता रहा है। 2010 में छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के 76 जवानों की कायराना ढंग से नृशंस ह्त्या की थी, तब जेएनयू में वामपंथी छात्र संगठनों- एआईएसए और डीएसयू ने इसका जश्न मनाया था, और माओवादियों के समर्थन में हिंदुस्तान मुर्दाबाद-माओवाद ज़िंदाबाद के नारे लगाए थे। अप्रैल 2000 में यहां एक मुशायरे का आयोजन हुआ, जिसमें पाकिस्तानी शायरों को आमंत्रित किया गया था। कार्यक्रम के दौरान भारत के सम्बंध में कुछ आपत्तिजनक बातें कही गईं। जब कार्यक्रम में उपस्थित दो सैन्य अधिकारियों ने इस पर विरोध जताया तो कम्युनिस्ट छात्रों ने उन पर हमला कर दिया। सुरक्षित बाहर निकलने के लिए उनमें से एक को हवाई फायर करना पड़ा। यहां के वामपंथी गिरोह की मिलीभगत से बीफ पार्टी होती है। हिन्दू देवी-देवताओं की खिल्ली उड़ाई जाती है। खुलेआम भारत विरोधी बातें होती हैं और सब कुछ ढर्रे पर चलता रहता है। लेकिन इस बार देश में गुस्से की लहर है। युवाओं की मुट्ठियां भिंची हुई हैं। प्रतिक्रिया कितनी तीव्र है इसका प्रमाण देते दो नारे। पहला , तुम कितने अफज़ल मारोगे, हर घर से अफज़ल निकलेगा , दूसरा जवाबी नारा -घर-घर में घुस कर मारेंगे, जिस घर से अफज़ल निकलेगा। पहला नारा एक दिन जेएनयू के एक आयोजन में गूंजा। दूसरा नारा उस दिन के बाद से सारे देश में गूंज रहा है।

जे.एन.यू. की वेबसाइट के अनुसार, संस्थान की स्थापना भारतीय संसद द्वारा जेएनयू अधिनियम 1966 (1966 का 53) के अंतर्गत, 22 दिसंबर 1966 को की गई थी, संस्था का उद्देश्य इस प्रकार बतलाया गया है –

अध्ययन, अनुसंधान और अपने संगठित जीवन के उदाहरण और प्रभाव द्वारा ज्ञान का प्रसार तथा अभिवृद्धि करना। उन सिद्धांतों के विकास के लिए प्रयास करना, जिनके लिए जवाहरलाल नेहरू ने जीवन-पर्यंत काम किया- जैसे राष्ट्रीय एकता, सामाजिक न्याय, धर्म निरपेक्षता, जीवन की लोकतांत्रिक पद्धति, अंतरराष्ट्रीय समझ और सामाजिक समस्याओं के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण। कांग्रेस और कम्युनिस्टों के बीच हुए अलिखित समझौते के चलते प्रारंभ से ही जेएनयू वामपंथी मांद में परिवर्तित होता चला गया। दिल्ली के सत्ताधीशों को नेहरूवाद के नाम पर वामपंथियों की वैचारिक सेवाएं प्राप्त होती रहीं और बदले में इन बुद्धिजीवियों पर सरकारी कृपा की वर्षा होती रही।

जेएनयू में पैर जमाकर वामपंथियों को कई रणनीतिक लाभ मिले। बौद्धिक जगत में वामपंथियों की भारी घुसपैठ प्रारंभ हो गई। छद्म सेकुलरवाद, अल्पसंख्यकवाद, भाषावाद, प्रांतवाद और वामपंथ को प्रगतिशीलता- आधुनिकता बना कर स्थापित किया गया। विभिन्न अकादमियों, देश के बड़े शैक्षिक संस्थानों , साहित्य जगत, मीडिया और सरकारी तंत्र में वामपंथियों को बिठाया गया। वामपंथी साहित्य, तोड़ा-मरोड़ा गया विकृत इतिहास, वामपंथी दृष्टिकोण की तथाकथित कला अभिव्यक्तियां अधिकृत और प्रामाणिक मनवाई गईं। और इन क्षेत्रों में वामपंथी और सत्ता में बैठी कांग्रेस के चाटुकारों के अतिरिक्त हर किसी को अमान्य और अयोग्य घोषित किया जाता रहा। वामपंथियों को इस गिरोहबंदी का एक बड़ा फायदा यह भी हुआ कि वामपंथ का राष्ट्रविरोधी चरित्र देश की जनता से प्रायः छिपा ही रहा गया। यदि, जोसेफ स्तालिन के निर्देशों पर भारत में अपनी गतिविधियों का संचालन करना, भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का विरोध, महात्मा गांधी को साम्राज्यवाद का एजेंट कहना, नेताजी सुभाष और आज़ाद हिन्द फ़ौज के लिए तोज्यो का कुत्ता, गद्दार बोस, काला गिरोह, दुश्मन के जरखरीद एजेंट, तोज्यो और हिटलर के अगुआ दस्ते, राजनैतिक कीड़े, काट कर फेंकने योग्य सड़ा हुआ अंग आदि कहना, पाकिस्तान निर्माण की मांग का समर्थन करते हुए भारत के 17 विभाजनों की मांग करना, 1962 के भारत-चीन युद्ध में चीनी सेना के समर्थन में रैलियां निकालना और चीन के खिलाफ लड़ रही भारतीय सेना की पीठ में छुरा घोंपते हुए वामपंथी कर्मचारी संगठनों द्वारा हड़ताल करके रक्षा उत्पादन को ठप करने का प्रयास करना, चीन के परमाणु परीक्षण का स्वागत करना, भारत के परमाणु परीक्षण का विरोध करना, पाकिस्तान में जा कर और विश्व मंचों पर भारत को कारगिल युद्ध का जनक कहना, हिंदू और हिंदुस्तान से जन्मजात दुश्मनी, आदि बातों पर विचार करेंगे तो जे.एन.यू में घटी घटनाओं पर न तो आश्चर्य होगा, न ही संशय। कश्मीर और देश के अन्य भागों में पाकिस्तान पोषित जिहादी आतंकवाद हो या देश के अनेक राज्यों में खून की होली खेल रहे नक्सलवादी हों, वामपंथी सदा ही उनका समर्थन और पोषण करते आए हैं।

आज निर्लज्जता से कश्मीर पर पाकिस्तान की बोली बोलते हुए ये लाल सलाम वाले सत्ता के लिए ललचा रहे विपक्ष की आंख का तारा बन गए हैं। राहुल गांधी, सीताराम येचुरी, अरविंद केजरीवाल, मायावती आदि ने अपने बयानों में ‘भारत की बरबादी तक- जंग रहेगी, जंग रहेगी’ का नारा लगाने वालों को मासूम छात्र करार दिया है। ‘मोदी सरकार’ को छात्रों से न उलझने की सलाह दी है। ये सब यूं ही नहीं हो रहा है। इन सबके दिमागों में असम, बंगाल और उत्तर प्रदेश में निकट भविष्य में होने जा रहे विधान सभा चुनावों के अनुमान चल रहे हैं जहां इन्हें बड़ी संख्या में गट्ठा ‘अल्पसंख्यक वोट’ कबाड़ने की संभावना दिख रही है। ऐसे ही मौकों पर ओसामा बिन लादेन ’ओसामाजी’ और हाफिज सईद ’हाफिज सईद साहब’ हो जाता है। और केजरीवाल बाटला हाउस एनकाउन्टर पर मुस्लिम भाइयों के नाम एक पत्र लिखते हैं। आश्चर्य की बात नहीं है कि इशरत जहां पर डेविड हेडली के खुलासे पर भारत के तथाकथित सेक्युलर, वामपंथी, अल्पसंख्यक नेता और पाकिस्तान एक ही भाषा बोल रहे हैं। यह भी आश्चर्य की बात नहीं है कि आतंकी अफज़ल गुरु कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला का अफज़ल गुरूजी बन गया है। सत्ता की लालच में देशहित को कुर्बान करने का ये पहला तो नहीं लेकिन नया कीर्तिमान है।

जेएनयू का लाल गिरोह निशाने पर आया है तो उनसे सहानुभूति रखने वाले भी अपने सारे शस्त्र-शास्त्र और भाव-प्रभाव के साथ मैदान में उतर आए हैं। किसी का कहना है कि कुछ दर्जन या कुछ सौ छात्रों के प्रदर्शन से क्या हो जाएगा, कुछ छात्रों के चलते सारा जेएनयू थोड़े ही ऐसा हो गया है, तो कोई कहता है कि सरकार गलत लड़ाई का चुनाव कर रही है। अरे ! छोकरे हैं, जाने दो। क्यों बात को बढ़ा रहे हो आदि।

इन लोगों से एक सवाल- जब उत्तर प्रदेश के एक गांव में घटी एक घटना से, जिसमें एक दर्जन स्थानीय लोग शामिल थे, सौ सवा सौ करोड़ लोगों का देश असहिष्णु हो गया था, तो देश के खिलाफ ज़हर उगलते तथाकथित छात्र नेताओं की हरकतों के कारण अब जेएनयू की साफ़-सफाई, दिशा-दशा आदि का चिंता क्यों न किया जाए? कहीं सरकार की कार्रवाई के कारण आप तथाकथित बुद्धिजीवियों में यह भय तो पैदा नहीं हो गया है कि देश में जेएनयू और ऐसे ही वामपंथी ज़हर में रचे-पगे दूसरे संस्थानों में बदलाव के लिए देशवासियों की इच्छाशक्ति तैयार हो रही है? सबको यह समझ लेना चाहिए कि सामान्य देशवासी की यह मांग है कि शिक्षा संस्थानों में फैल रही इस ज़हरीली हवा की रोकथाम की जाए और जहरीले दांतों को उखाड़ दिया जाए। दूध पीकर विष उगलना अब स्वीकार्य नहीं है।

इस बीच गिरफ्तारियां हो रही हैं। कुछ जंगजू फरार हैं। उनके साथी जो हर घर से अफज़ल निकाल रहे थे, फिलहाल खुद ही घर से बाहर नहीं निकल रहे हैं। देश की सोच स्पष्ट है कि बोलने की आज़ादी देश से गद्दारी करने का लाइसेंस नहीं है।
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