बढ़ती उम्र – बढ़ती बीमारी

कुछ शारीरिक कष्ट ऐसे हैं जिन्हें रोका जा सकता है और कुछ ऐसे हैं जो हो जाएं तो उनसे मुकाबला किया जा सकता है। ….धैर्य से हर परिस्थिति का सामना हो सकता है, चाहिए सिर्फ थोड़ी-सी जानकारी, जागरूकता, हिम्मत और साथ!

ये तुम्हें क्या होता जा रहा है? अपना ध्यान क्यों नहीं रखतीं?
यह प्रश्न हो या प्रश्नसूचक निगाह हर महिला के प्रति अक्सर होती है।
युवावस्था मैं अल्हड़, मस्त, बेफिक्र रहने वाली लड़की विवाह के बाद स्त्री, फिर बच्चों के बाद, घर गृहस्थी में डूबी हुई महिला बन जाती है। शारीरिक बदलाव ऐसी आंधी की तरह आता है जो उसके मन को भी अपनी चपेट में ले लेता है। विवाह, पति, बच्चे, परिवार, समाज के दबाव में स्त्री बीमारियों को कैसे न्योता दे देती है पता ही नहीं चलता।

35 की उम्र आते-आते तकरीबन हर स्त्री के जीवन में पहली दस्तक किसी न किसी तकलीफ के रूप में होती है। चाहे वह मासिक धर्म की गड़बड़ी के कारण हो या फिर छाले हों या गांठ इत्यादि।

35-45 तक का सफर इन्हीं के कारण कष्टप्रद हो जाता है। फिर आता है 45-50 का दौर जो सुनामी होता है। यह समय है मासिक के जाने का। आइये थोड़ा विस्तार से जानते हैं कि ये तकलीफें किस प्रकार की हो सकती हैं-

1. मासिक धर्म की तकलीफ- हारमोन की उथल-पुथल 35 की उम्र से अक्सर देखी गई है। यह शरीर में बदलाव लाती है। तीन-चार तरह के हारमोन के कम ज्यादा होने से यह बदलाव आता है। अधिक स्त्राव जाने से, खून की कमी होना आम बात है। हमारा आहार इस कमी की पूर्ति नहीं कर पाता। थकान, चिड़चिड़ापन, घबराहट इत्यादि के छोटे-छोटे लक्षण होते हैं जिससे चौकन्ना रह कर, समय रहते इसे पकड़ा जा सकता है।

2. थाइरॉइड होना- आजकल बहुत सी महिलाओं में थाइरॉइड हारमोन की अधिकता पाई जाती है। इसे हम बोलचाल की भाषा में ’ थाइरॉइड हो गया है’ ऐसा कहते हैं। थाइरॉइड ग्रंथी तो शरीर में पहले से ही विद्यमान थी, अब हारमोन बढ़ गया है। इस हारमोन के बढ़ने से सिर से लेकर पांव तक बदलाव आते हैं जिनमें सबसे ज्यादा पाए जाने वाले लक्षण हैं- मासिक का बिगड़ना, खून की कमी, धड़कन का तेज चलना और सबसे ज्यादा चिंताजनक होता है मोटापा! शरीर के इस बदलाव का सबसे ज्यादा असर महिला के मन, मानसिकता पर होता है। उसका बढ़ता वजन उसके बस में नहीं होता, वहीं वजन उतारना भी कठिन होता है! ऐसे समय में, उस महिला को बहुत स्नेह, ढाढ़स और सांत्वना की आवश्यकता होती है।

3. गांठ होना- बच्चेदानी में गांठ पाना बस इसी उम्र के आसपास होता है या तो मासिक की गड़बड़ी के कारण पकड़ में आता है। यह वंशानुगत हो सकता है। इसके अलावा कोई ठोस कारण ज्ञात हो कि यह क्यों, कैसे और इन्हीं को क्यों हुई! स्तन में गांठ होना भी इसी उम्र के आसपास पाया जाता है। यह भी वंशानुगत हो सकता है। मोटे तौर पर, यदि स्तन की गांठ में दर्द हो तो वह कैंसर नहीं होती। कैंसर की गांठ प्राय: ीळश्रशपीं ज्ञळश्रश्रशीी होती है। इन दोनों तरह की गांठों की जांच डॉक्टरी परिक्षण द्वारा, जांचों के द्वारा पूरी होती है।

4. श्वेत प्रदर- श्वेत प्रदर या आम बोलचाल की भाषा में सफ़ेद पानी की शिकायत अक्सर महिलाओं में पाई जाती है! इसके आसपास अनेक भ्रांतियां जुड़ी हैं, जो कि सब गलत हैं। डॉक्टर को दिखाकर इलाज़ करवाना सबसे कारगार उपाय है।
पेट में दर्द, कमर दर्द के आसपास, जीवन मानो घूमने लगता है। हमेशा थकान से भरा शरीर, इन तकलीफों को झेलता शरीर धीरे-धीरे लडख़ड़ाते 45 तक पहुंचता है और फिर आता है सुनामी… मासिक का बंद होना।

शरीर में से स्त्रीत्व का गायब होना, यह हारमोन के सिकुड़ने से होता है। यह दौर बहुत कष्टप्रद शारीरिक बदलाव लाता है जो मानसिक रूप से तोड़ देने वाले होते हैं। ऐसे समय में बहुत धैर्य के साथ इस परिस्थति का सामना करना होता है। परिवार और खासकर पति का साथ और समझ, स्नेह ही सबसे बड़ा सम्बल होता है।

कुछ कष्ट ऐसे हैं जिन्हें रोका जा सकता है और कुछ ऐसे हैं जो हो जाएं तो उनसे मुकाबला किया जा सकता है।
जीवन में मनोबल बनाए रखें।

धैर्य से हर परिस्थिति का सामना हो सकता है, चाहिए सिर्फ थोड़ी-सी जानकारी, जागरूकता, हिम्मत और साथ!
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