वैश्विक कृषि प्रगति में यूपीएल की अहम भूमिका हो – रज्जूभाई श्रॉफ

यूनाइटेड फॉस्फोरस लिमिटेड देश की जानी मानी कृषि सम्बंधी रसायन बनाने वाली कम्पनी है। आज देश में खेती पर गंभीर प्रश्न खडे हो रहे है। किसानों की आत्महत्या, उद्योगों पर अधिक जोर तथा मोदी सरकार की कृषि नीति आदि जैसे विभिन्न मुद्दों पर यूनाइटेड फॉस्फोरस के चेयरमेन रज्जूभाई श्रॉफ से बातचीत हुई। प्रस्तुत हैं उसके कुछ प्रमुख अंश-

एक्सेल से यूपीएल तक की व्यापारीक यात्रा का वर्णन करें।

मुझे मुख्यत: ऐसे रसायन बनाने में रुचि थी जिनके लिए लोग दावा करते थे कि ये तो भारत में बन ही नहीं सकते। मैं अपने कॉलेज के दिनों से ही प्रयोग करने के लिये उत्साहित रहता था। एक्सेल हमारी पारिवारिक कंपनी थी। मैंने वहां अत्याधिक ज्वलनशील रसायनों पर प्रयोग किया। जिससे कंपनी में विस्फोट हुआ और आग लग गई। तब घर के लोगों ने कहा की अब एसे प्रयोग नहीं किये जाएंगे। परंतु मुझे अपने प्रयोगों पर विश्वास था। मैंने गुजरात में भूमि खरीदी और परिवार के लोगों से अनुमति लेकर यूपीएल शुरु की। उन्होंने भी मुझे यह कहकर अनुमति दे दी कि अगर प्रयोग करना है तो निश्चित करो और विफल हुए तो भी वापस आ जाना।

यूपीएल को शुरुआती दिनों में किन समस्याओं का सामना करना पडा?

उत्तर- उस समय महाराष्ट्र में कुछ समस्याएं थी। पानी की समस्या थी यूनियन की कई समस्याएं थीं। गुजरात में कुछ शांति थी। व्यापार के लिये अनुकूल वातावरण था। अत: मैंने वापी में फॅक्टरी शुरु की। हालांकि वह भी नया-नया इंडस्ट्रियल स्टेट होने के कारण आधारभूत सुविधाओं की समस्या थी। परंतु फिर भी हमने मेहनत की और सफलता पाई।

सन 1969 में स्वीडिश मैच कंपनी जो कि माचिस बनाती थी के लिये फॉस्फरस बनाया। परंतु चुंकि उन लोगों को शक था कि इन माचिसो में प्रयोग किया गया रसायन भारत में बन ही नहीं सकता अत: स्वीडिश मैच कंपनी ने आरोप लगा दिया कि यूपीएल बोगस कंपनी है। वह रसायन बनाती ही नहीं है। उनकी शिकायत के कारण दिल्ली से कई जांच एजेंसिया आई परंतु जब हमने हमारी रसायन निर्माण की प्रक्रिया दिखाई तो उन्हें विश्वास हुआ। इतना ही नहीं हमें स्माल स्केल इंडस्ट्री का प्रेसिडेंट गोल्ड अवार्ड भी मिला।

आपने ज्वलनशील पदार्थ बनाने से शुरुआत की थी फिर कृषि रसायनों की ओर कैसे रुख किया?

हमारा मुख्य रसायन फॉस्फरस है जो कि कीटकनाशक बनाने में भी उपयोगी है। एलिमीनियम फॉस्फाइड अनाजों के लिए और जिंक फॉस्फाइड चूहे मारने के काम आता है। इन रसायनों को बनाने की तकनीक भी कठिन थी कोई बनाता नहीं था। जर्मन कंपनी का दावा था ये जिस फैक्टरी में यह रसायन बनेगा वहां के सब लोग मर जायेंगे। परंतु अब एलिमीनियम फॉस्फाइड बनाने में हम दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कंपनियों में से एक हैं। जर्मन भी हम से ही रसायन लेते हैं। भारत में भी अनाजों के भंडारण में इसका अत्याधिक उपयोग होता है। इस रसायन को अगर बाहर रखेंगे तो इससे ज्वलनशील गैस निकलती है। उसे भी सुरक्षित रखने के लिये हमने प्रयोग किये। हमारे उत्पाद बाजार में प्रचलित होने के बाद भी प्रयोगशाला में उसे और बेहतर बनाने पर प्रयोग रहते हैं।

विदेशों में आपके व्यापार की शुरुआत कैसे हुई?

भारत में हमने किसानों के लिये उत्तम किटकनाशक बनाये और बेचे, परंतु विदेशों के लिए सरकार की ओर से कई बंधन थे। उस समय लायसेन्स राज था। अधिक उत्पादन के लिये भी लायसेन्स लेना पडता था। सन 1991 में वर्ल्ड बैंक ने भारत में मुक्त अर्थव्यवस्था पर जोर दिया और जब वह हुआ तो विदेशों के दरवाजे खुल गए। फिर हमने देखा इंग्लैड में कीटकनाशक बनाने वाली एक कंपनी है, जो बंद पडी है। वहां तकनीक तो है परंतु रखरखाव के लिये पैसे नहीं है। हमने वह कंपनी खरीदी और उसे सफलतापूर्वक चलाया। इससे हमें विश्वास हुआ कि हम वैश्विक प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। अब हॉलैंड, फ्रान्स, इटली, स्पेन, युएसए, ब्राजील, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, चायना, साउथ आफ्रिका, कोलंबिया आदि जगहों पर हमारी फैक्ट्रिया हैं। खास बात यह है कि इनमें भारतीय तकनीकों से ही निरंतर सुधार किया गया है।

 भारतीय सरकारी नीतियों और विदेशी सरकारी नीतियों के उद्योग के प्रति दृष्टिकोण में क्या अंतर है?

हर देश की उद्योगों से सम्बंधित अलग-अलग नीतियां हैं। भारतीय सरकारी कामकाज में बाधाएं बहुत है। विदेशों की में कामकाज की गति अच्छी है। मैक्सिकन सरकार का नियम है अगर आप खेती मेें किसानों को मदद करते है तो सरकार आपके उद्योग के लिये हर संभव कोशिश करती है। हमारे यहां भ्रष्टाचार बहुत है। अब हमने सरकार से मांग की है कि एक जांच समिति बिठाई जाए जो भ्रष्टाचारियों पर कार्यवाही कर सके।

हालांकी मोदी सरकार के आने के बाद से इसके प्रमाण में बहुत कमी आई है परंतु अभी भी सुधार की आवश्यकता है।

भारतीय कृषि को उन्नत करने के लिए किन तकनीकों की आवश्यकता है?

हमारा किसान बहुत परिश्रमी है। हम जब किसानों के लिये प्रशिक्षण अभियान चलाते हैं ़़़़तो वे वहां सीखते हैं; और अपने अपने खतों में उसका प्रयोग करते हैं। जिन किसानों की फसल पहले 25 टन होती थी आज वह 80 टन हो गई है। यह अभियान देश के कुछ भागों में ही हुआ है। इसे सभी राज्यों में करने की आवश्यकता है।

हमारे किसान शिक्षित भले ही न हो परंतु वे परीश्रमी और बुद्धिमान हैं। उनकों थोडी सी मदद की जाये तो उनका उत्पादन बढ जाता है। हमने गुजरात के आदिवासी भाग डांग में किसानों को अच्छी किस्म के बीज और ऊर्वरक दिए। उन्हें कुछ निर्देश दिए और उनके जीवन में खुशहाली आ गई।

भारतीय किसानों तथा विदेशी किसानों की कार्यशैली में क्या अतंर है?

विदेशों का छोटा किसान भी हो तो उसके पास कई एकड का खेत होता है। उसके खेत में ट्रैक्टर और अन्य मशीने आती हैं। वह साल में एक ही फसल देता है। छुट्टी मनाने जाता है। यहां हमारे किसान 365 दिन रात काम करते हैं। यहां छोटे किसान के पास भी खेत के साथ एक गाय, भैंस, बकरी होगी। हमारे यहां का किसान अनाज के साथ सब्जी भी उगाता है। मेरा मानना है कि यह सरकार किसानों की मदद करेगी। जहां तक किसानों की आत्महत्या का प्रश्न है मुझे लगता है वे लोन ले लेते हैं और उन पैसों का खेती में उपयोग न करके यहां वहां खर्च कर देते हैं। और जब गिरवी रखी प्रापर्टी लेने बैंक आता है तो आत्महत्या कर देते हैं।

अभी बाजार में जैविक ऊर्वरक और रासायनिक ऊर्वरकों पर मतभेद हैं। आपकी क्या राय है?

जैविक खाद मेरे हिसाब से बोगस चीज है। उसमें नायट्रोजन ही नहीं होता। नायट्रोजन, फॉस्फरस, पोटाश होना जरुरी है। भारत की टोटल कृषि भूमि 191 मिलि. हैक्टे. है और चीन की 160 मिलि. हैक्टे है भारत की ऊर्वरकों की मांग 28 मिलियन टन है और चीन की 56 मिलियन टन है। फिर भी चीन का प्रोडक्शन भारत की तुलना में तीन गुना अधिक है। हमारे यहां कीटकनाशकों के अधिक होने की बात कही जाती है। यह भी गलत है। हमें इतने कीटकनाशक प्रयोग करते ही नहीं है।
खउठप्रयोग शाला में जब फसलों के एक लाख सैंपल टेस्ट किए गए तो उनमें कीटकनाशकों का अनुपात आया 2.06%। विदेशों में तो यह 5% से अधिक है। अत: इस पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए।

मोदी सरकार के आने के बाद आपके क्षेत्र में क्या बदलाव हुए तथा भविष्य में आपकी क्या अपेक्षाएं हैं?

गुजरात में प्रधान मंत्री मोदी ने जो कृषि क्षेत्र में किया वैसा काम यदि पूरे देश में हो तो निश्चित ही हमारी कृषि में विकास होगा। गुजरात में कृषि उपज में जहां 10-12% वृद्धि थी वहां अन्य देश में 2% थी। वे कलेक्टर कोखेतों का दौरा करने के लिये प्रोत्साहित करते थे। स्वयं जिलों के किसानों का सम्मेलन लेकर 5 सर्वोत्तम किसानों को पुरस्कार देते थे।

हमारी मुख्य अपेक्षा यह है कि इस क्षेत्र से भ्रष्टाचार खत्म हो जाए यहां भ्रष्टाचार के कारण मल्टीनेशन कंपनियों का काम बंद है। हमें उनसे प्रतियोगिता करनी पडता है और कई बार हमें उत्तम होकर भी बाहर हो जाते है। यह बंद हो जाना है।

नरेंद्र मोदी की मेक इन इंडिया पॉलसी के संबध में आपके क्या विचार है?

उत्तर- मेरे हिसाब से तो ये पॉलसी बहुत अच्छी है। अभी सारे देश में यह लागू नहीं हुई है। परंतु जब हो जाएगी तो हम दुनिया में नंबर एक स्थान पर होंगे। हमारे वैज्ञानिक बहुत बुद्धिमान हैं। किसान और मजदूर भी अच्छे है। परंतु उनमें आलस अधिक है। ये आलस अगर निकाल दिया जाए तो वे भी चीन के मजदूरों की तरह ये दौड के काम करना शुरु करे तो हमें कोई नहीं हरा सकता। यहां का इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधारने की आवश्यकता अत्यधिक है।

आपकी कंपनी शेयर मार्केट में लिस्टेड है। शेयर मार्केट में फिलहाल अधिक उतार चढाव नहीं हैं क्या यह अच्छी स्थिति है?

मैं शेयर मार्केट का विशेषज्ञ नहीं हूं परंतु हमारी कंपनी के शेयर में एक महीने में 30% की बढोत्तरी हुई है।

आज कृषि की हालत देखकर कुछ लोगों का कहना है कि अब कृषि से उद्योगों की ओर रख करना चाहिए। आपकी क्या राय है?
उत्तर- उद्योग बढने से शहर में विकास तो होगा। गाडियां, बंगले बढेंगे परंतु ग्राम विकास के लिए कृषि उत्पादन होना अधिक जरुरी है। कृषि का गांव में कोई विकल्प नहीं हैं। गांव में उद्योगों के लिए, इंडस्ट्री के लिए आधारभूत ढांचा नहीं है। स्क्रू ड्रायवर लाने के लिये भी शहर आना पडता है। अत: गावों में अगर उन्नति करनी है, खुशहाली लानी है तो कृषि को ही बढाना होगा। उसे अधिक फायदेमंद बनाना होगा। अभी जहां फलों की खेती होती है उस क्षेत्र में कृषि में उन्नती हो रही है। विपरीत परिस्थितियों के बाद भी अंगूर का निर्यात दुगना हो गया है।

 व्यापार के साथ आपका रुझान सामाजिक कार्यों की ओर भी रहा है। उनकी जानकारी प्रदान करें।

समाज कार्यों में हमारा सबसे अधिक कार्य विद्यालय, महाविद्यालय बनाने, उन्हें सुचारू रूप से चलाने तथा शिक्षा के अन्य क्षेत्रों में है। एक कॉलेज में तो अब एम.बी.ए. कोर्स भी शुरु हो रहा है।

शिक्षा के साथ ही सबसे अधिक जरुरी है स्वास्थ। हमने पहले एक डिंस्पेसरी से शुरुआत की थी और अब एक अस्पताल भी अच्छी तरह चला रहे हैं। इन सबके साथ-साथ किसानों को मुफ्त प्रशिक्षण दिया जाता है। 25 एकड के एक बडे खेत में उन्हें प्रशिक्षण दिया जाता है। हम उन्हें एक निश्चित भूखंड एक साल के लिए देते हैं उन्हें कहा जाता है एक साल में वे कडी मेहनत से और प्रशिक्षण लेकर जो चाहे वह उगाएं। यहां से प्रशिक्षण लेने के बाद उन्हें बाइक दी जाती है और फिर वे अपने आस पास के गावों में प्रशिक्षक के रूप में जाते हैं। ये श्रृंखला ,जैसे-जैसे बढेगी वैसे-वैसे किसान अधिक प्रशिक्षित होगें। यही विचार मन में रखकर हम प्रशिक्षण का यह उपक्रम चला रहे हैं। किसान ही अन्य किसानों को अच्छी तरह से प्रशिक्षित कर सकता है।
कंपनी के रुप में हमे हमारी आय का 2% सीएसआर के रूप में देना होता है। 2 सीएसआर से अधिक देनेवालों की सूची में हम देश में तीसरे क्रमांक पर हैं।

आपके स्वभाव का एक ऐसा गुण बताए जिसने आपको इतनी सफलता दिलाई।

मैंने अपनी जिंदगी में अत्यधिक बुद्धिमान लोगों को जोडा उन्हें प्रोत्साहित किया, हर संभव तरीके से उन्हें अपनी टीम का हिस्सा बनाए रखा। आज मेरी तथा कंपनी की प्रगति में इन लोगों का बहुत बडा योगदान है।

आनेवाले दस सालों में यूपीएल की क्या योजनाएं होंगी?

मैंने जब इंडस्ट्री शुरु की तब बहुत मेहनत की परंतु अब सच कहे तो स्थिति यह है कि हमारी पूरी टीम मेहनत करती है और श्रेय मुझे मिलता है। आज अर्जेटिना, ब्राझील जैसे देशों में लोग हमारे उत्पादकों ही पसंद करते है। मैंने शुन्य से शुरुआत की थी और आज 13 हजार करोड के पायदान पर यूपीएल पहुंच चुकी है। आर्थिक रूप से आगे बडतो बढना ही है, साथ ही वैश्विक कृषि विकास में यूपीएल किस तरह मदद कर सकता इस पर ध्यान केंद्रित करना है।

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