रविन्द्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी के बीच किस बात को लेकर था मतभेद?

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म बंगाल में 7 मई 1861 को हुआ था। वह एक महान साहित्यकार, कवि और दार्शनिक भी थे उनकी प्रतिभा का अंदाजा सिर्फ इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उनकी दो रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान है। भारत में राष्ट्रगान “जन गण मन” और बांग्लादेश का राष्ट्रगान “आमार सोनार बांग्ला” गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की ही रचना है। इनके महान कार्यों की वजह से ही इन्हे नोबेल पुरस्कार भी दिया गया था। वह एशिया के पहले नोबेल पुरस्कार पाने वाले व्यक्ति थे। रवींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी दोनों ही एक दूसरे का बहुत आदर करते थे लेकिन इन दोनों के बीच राष्ट्र प्रेम और मानवता को लेकर मतभेद था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी राष्ट्र को प्रथम स्थान देते थे जबकि रवींद्रनाथ टैगोर मानवता को पहला स्थान देते थे और कहा भी था कि “जब तक मैं जिंदा हूं मानवता पर देशभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा”। महात्मा गांधी को महात्मा शब्द से पहली बार रवींद्रनाथ टैगोर ने ही संबोधित किया था।

रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म एक धनी परिवार में हुआ था लेकिन उनके जन्म के कुछ समय पश्चात उनकी माता का देहांत हो गया और उनके पिता देवेंद्रनाथ टैगोर यात्रा पसंद व्यक्ति थे जिससे रवींद्रनाथ का पालन पोषण नौकरों के हाथों ज्यादा हुआ है। एक सम्पन्न परिवार से आने की वजह से रवींद्रनाथ की प्रारंभिक शिक्षा वहां से प्रतिष्ठित स्कूल से शुरू हुई और उनकी बैरिस्टर बनने की चाह ने उन्हें लंदन तक पहुंचा दिया लेकिन उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय की शिक्षा पूरी किये बिना ही स्वदेश लौट आए जिसके बाद सन 1883 में उनका मृणालिनी देवी के साथ विवाह हो गया।

टैगोर परिवार पर नजर डालें तो यह एक संपूर्ण परिवार था जिसमें कई पीढ़ियां साथ में रहती थी और यह लोग पूरी तरह से समाज और धन से सम्पन्न थे। इस परिवार पर भगवान की ऐसी कृपा थी कि यहां हर कोई किसी ना किसी क्षेत्र में विशेष महारत हासिल किया हुआ था। गुरुदेव के सभी भाई और बहन अलग अलग क्षेत्रों में प्रतिभा रखते थे और इसमें कुछ लोगों को अपने क्षेत्र का प्रथम व्यक्ति भी होने का सौभाग्य प्राप्त था। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर भी विशेष थे उन्होने भी जो किया वह आज सैकड़ों साल बाद भी याद किया जाता है। नोबेल पुरस्कार पाने वाले वह एशिया के पहले व्यक्ति थे। उस समय इस पुरस्कार की जानकारी भी बहुत कम लोगों को थी।

करीब 8 वर्ष की आयु में ही रवींद्रनाथ ने पहली कविता लिखी थी और 16 वर्ष की आयु में उनकी पहली लघुकथा भी प्रकाशित हो गयी थी। टैगोर जी ने अपने जीवनकाल में लघुकथाएं, उपन्यास, यात्रावृन्त और नाटक लिखे है लेकिन उनकी पद्य कविताएं सबसे अधिक मशहूर और पढ़ी जाती थी जबकि गद्य में लिखी उनकी छोटी कहानियां अधिक पढ़ी जाती थी। टैगोर जी ने करीब करीब हर क्षेत्र को छुआ था और उसके ऊपर कुछ ना कुछ लेख भी जरूर लिखा था उन्होने करीब 2 हजार से अधिक गीतों की भी रचना की है जिसे उनके साहित्य से अलग नहीं किया जा सकता है। गद्य, पद्य और गीत के बाद गुरुदेव ने जीवन के अंतिम समय में चित्र बनाने का भी काम शुरू कर दिया था जिसमें संशय, मोह, निराशा और मनुष्य व ईश्वर के बीच चिरस्थायी संपर्क उनके चित्रों में झलकने लगा था।

सन 1901 में गुरुदेव ने सियालदह छोड़ दिया और शांतिनिकेतन आ कर बस गये यहां पर उन्होंने विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की और कई साहित्यों को भी लिखा। जानकारी के मुताबिक सन 1863 में रवींद्रनाथ टैगोर के पिता देवेंद्रनाथ टैगोर ने एक आश्रम बनवाया था जिस पर 1901 से रवींद्रनाथ टैगोर ने पांच छात्रों के साथ स्कूल चलाना शुरु किया जिसके बाद यह बढ़ता चला गया और सन 1921 में इसे विश्वविद्यालय का दर्जा मिल गया इस समय इसमें करीब 6 हजार से अधिक छात्र पढ़ते है। देश और मानवता के लिए बहुत कुछ करने वाले रवींद्रनाथ टैगोर ने 7 अगस्त 1941 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

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