प्रदूषण के कारण नष्ट हो रहीं जैविक प्रजातियां

प्रदूषण आज  की एक गंभीर समस्या है| इसकी चपेट में मानव-  समुदाय ही नहीं, समस्त जीव-समुदाय आ गया है| इसके दुष्प्रभाव चारों ओर दिखाई दे रहे हैं|

परंतु प्रदूषण का अर्थ क्या है? प्रदूषण का शाब्दिक अर्थ है अच्छे को बिगाड़ना याने के गंदगी फैलाना| प्रदूषण को आम तौर पर तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है- वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण| ये तीनों ही प्रकार के प्रदूषण मानव निर्मित हैं और इस पूरी पृथ्वी के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहे हैं| अपना शरीर एवं पूरा विश्व ही पंचमहाभूतों से बना हुआ है| इन पंचमहाभूतों में वायु और जल का स्थान तो सब से महत्वपूर्ण है| जीवों की उत्पत्ति और जीवन को बनाए रखने में इन वस्तुओं का बहुत बड़ा हाथ है| वायु में जहां सभी जीवधारी सांस लेते हैं वहीं जल को पीने के काम में लाते हैं| लेकिन मानव ने स्वयं के विकास के लिए इन पंचतत्वों को ही बिगाड़ना शुरू किया है|

वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण इसमें अनेक प्रकार की अशुद्ध वायु का निर्माण होना तथा जरूरत से कई गुना ज्यादा उपयोग करना है| वायु में मानवीय गतिविधियों के कारण कार्बन डायऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड जैसे प्रदूषित तत्व भारी मात्रा में निरंतर रूप से मिलते जा रहे हैं| जल में नगरों का कूड़ा-कचरा, रासायनिक पदार्थों से युक्त गंदा पानी प्रवाहित किया जाता रहा है| इससे जल के भंडार जैसे-तालाब, नदियां, झीलें और समुद्र का जल निरंतर प्रदूषित हो रहा है| साथ ही सब की गंदगी को अपने अंदर समेटने वाला समंदर भी अब प्रदूषित हो चुका है| मानव ने ऐसी ऐसी चीजें बनाई हैं जिनका समंदर के पास भी कोई जवाब नहीं है|

इन सभी प्रदूषणों का मुख्य कारण है बढ़ती आबादी| प्रदूषण की समस्या के पीछे जनवृद्धि का संकट भी काम कर रहा है| इस जनवृद्धि के कारण ग्रामों, नगरों तथा महानगरों को विस्तार देने की आवश्यकता का अनुभव हो रहा है| परिणामस्वरूप जंगल काट कर वहां बस्तियां बसाई जा रही हैं| वृक्षों और वनस्पतियों की कमी के कारण प्रकृति की स्वाभाविक क्रिया में असंतुलन पैदा हो गया है| विज्ञान की प्रगति के कारण औद्योगिक विकास में मनुष्य की रुचि इतनी बढ़ गई है कि वह प्रकृति के साथ अपना सामंजस्य खोकर बैठा है|

इस बढ़ते प्रदूषण के कारण इस दुनिया से कई प्रजातियां पहले ही नष्ट हो चुकी हैं| कई सारी प्रजातियां पूरी तरह से विलुप्त होने की कगार पर हैं| प्रदूषण के कारण पिछले सिर्फ ४० साल में हम ने करीब २८० प्रजातियां खो दी हैं|

कोस्टारिका में पाया जाने वाला सुवर्ण मेंढ़क (गोल्डन टोड ) इसका सब से बड़ा उदहारण है| १९८९ में इस सुवर्ण मेंढ़क प्रजाति का अंत हुआ| इस प्रदूषण के कारण दुनिया के बढ़ते हुए तापमान ने इस सुवर्ण मेंढ़क की प्रजाति पूरी तरह से नष्ट कर दी है| कोस्टारिका मध्य-अमेरिका स्थित एक शांत प्रदेश है| निसर्ग ने उसे भरपूर दिया है| इस प्रदेश का एक चौथाई हिस्सा जंगलों से भरा है| फिर भी दुनियाभर के प्रदूषण से इस देश की कई प्रजातियां नष्ट हुई हैं या होने की कगार पर हैं|

हम सब ने झांजीबार देश का नाम तो सुना ही होगा| निसर्ग संपत्ति से भरे हुए इस देश की कई प्रजातियां भी पिछले सिर्फ २० सालों में नष्ट हो रही हैं| झांजीबार लेपर्ड से प्रसिद्ध एक बाघ की प्रजाति प्रदूषण से ही नष्ट हो चुकी है| हालांकि वहां के निवासी इस बात को मानते नहीं हैं| उनका कहना है कि कुछ गलत इस्तेमाल के लिए इन लेपर्ड को बहुत बड़े पैमाने पर मारा गया और वे नष्ट हो गए| परंतु वैज्ञानिकों का दावा है कि सुवर्ण मेंढ़क की तरह इस लेपर्ड की प्रजाति को सिर्फ प्रदूषण ने ही नष्ट कर दिया है|

हवाई द्वीपों पर भी प्रकृति के बहुत सारे नज़ारे देखने मिलते हैं| इन नजरों में एक पंछी था जिसका नाम था पाओली| तितली से थोड़ा सा बड़ा ये पंछी आज पूरी तरह नष्ट हो चुका है| बढ़ता तापमान, जंगलों का नष्ट होना और खाने की कमी के कारण आज यह प्रजाति नष्ट हो चुकी है| काले मुंह वाले इस पंछी का आखरी दर्शन १९७० में हुआ था और २००४ में इसे पूरी तरह विलुप्त हुई प्रजाति घोषित किया गया|

पुर्तुगाल के लॉरीसिल्वा जंगल में कई प्रकार की तितलियां हैं| इन तितलियों में से भी कई प्रकार की तितलियां आज पूरी तरह नष्ट हो चुकी हैं| इनमें से प्रमुख प्रजाति है मैडरिन लार्ज व्हाइट| हमें तो तितलियों के कई रंग देखने की आदत है परंतु इस प्रजाति का रंग पूरी तरह से सफ़ेद होने के कारण इसे यह नाम मिला है| करीब ५ सेमी आकार की इन तितलियों का नष्ट होना बढ़ते प्रदूषण का ही कारण बन जाता है| खेती के लिए इस्तेमाल होने वाले रसायनों से यह प्रजाति थोड़े ही समय में पूरी तरह नष्ट हो गई| २००७ में इसे नष्ट प्रजाति घोषित कर दिया गया| कहा जाता है की सिर्फ १० साल पहले इनकी संख्या काफी अच्छी थी किंतु सिर्फ १० सालों में खेती में लाए गए रासायनिक परिवर्तनों के कारण यह प्रजाति नष्ट हो गई|

स्पेन की एक मेंढ़क प्रजाति भी प्रदूषण का शिकार मानी जाती है| पयनेरियन आईबेक्स नामक इस मेंढ़क की यह प्रजाति सन २००० में पूरी तरह से नष्ट हो गई| वास्तविक रूप से इन मेंढ़कों के नष्ट होने का कारण प्रदूषण ही है| इनका खाना पहले कम हुआ| घास काट दिए गए और घने जंगलों में रहने की इनकी क्षमता नहीं थी| सिर्फ मनुष्य जाति की बढ़ती आकांक्षाओं से इस प्रजाति का अंत हुआ|

इंडोनेशिया के जावा द्वीप समूह में एक अलग किस्म का बाघ पाया जाता था| जावा बाघ नाम से विश्वप्रसिद्ध शेर की यह प्रजाति आज पूरी तरह से नष्ट हो चुकी है| लगभग १०० साल पहले इस प्रजाति को उस द्वीप का सब से अधिक आबादी वाला जीव माना जाता था| इस बाघ की संख्या इतनी अधिक थी कि वहां के निवासी इसे कुत्ते, कौवे जैसा घरेलू जानवर ही समझते थे| ऐसे जानवर का सिर्फ १०० साल के अंदर पूरी तरह नष्ट होना संपूर्ण मानव जाति के लिए खतरे का निशान है| जावा बाघ के नष्ट होने का प्रमुख कारण है प्रदूषण| जंगलों का नष्ट होना एवं प्रदूषण से यह बाघ इस दुनिया में नहीं है|

अमेरिका के कैलिफोर्निया प्रांत के टेकोपा गांव के नदी में टेकोपा पपफिश नाम की मछली हुआ कराती थी| दो झरनों से बनी इस नदी में यह मछली बड़े पैमाने पर पाई जाती थी| उत्तर टेकोपा और दक्षिण टेकोपा से आने वाले दो गर्म झरनों से ये टेकोपा नदी बनती थी| १९५० से गर्म पानी के झरनों में नहाने का बड़ा शौक उभर आया था| लोगों का झरनों में नहाने का शौक पूरा करने के लिए इन झरनों को बड़ा बना दिया गया| उधर बड़े पैमाने पर लोग नहाने आने लगे| इसी वजह से झरनों का पानी काफी गंदा भी हुआ और पानी का प्रवाह भी अनियंत्रित हो गया| इसी वजह से पपफिश की प्रजाति पूरी तरह नष्ट हो गई| इस मछली की बड़े पैमाने पर खोज की गई पर कुछ भी हाथ न आया| आखिर मानवी आराम के लिए और एक प्रजाति कुर्बान हो गई|

मादागास्कर का एक बड़ा पेड़ आज केवल प्रदूषण के कारण बढ़े हुए तापमान से नष्ट हो चुका है| बाओबाब नाम के इस पेड़ का उपयोग मानव जाति ने अनेक वर्षों तक किया था| साल के सिर्फ ३ महीने इस पेड़ को पत्ते आते थे परंतु सूखे प्रदेश में पानी न मिलने पर इस पेड़ की जड़ों को काट कर पानी पिया जाता था| मुसाफिरों के लिए तो यह पेड़ परमेश्वर समान ही था| आज बढ़ते हुए तापमान ने इस अजूबे पेड़ को पूरी तरह नष्ट कर दिया है|

आज इस प्रदूषण रूपी शैतान का सबसे बड़ा और ताकदवर साथी है प्लास्टिक| प्लास्टिक एक ऐसी चीज है जिसको बनाने में बड़े पैमाने पर पानी प्रदूषित होता है, अनेक तरह के विष और विषारी वायु उत्पन्न हो सकते हैं और इस भस्मासुर को नष्ट होने में हजारों साल लगते हैं| प्लास्टिक से बीमारी भी फैलती है| प्लास्टिक तो प्रकृति की हानि का सबसे विदारक उदहारण है समुद्री पंछियों की मौत|

प्लास्टिक की सभी चीजें बहुत बड़े पैमाने पर समुद्र में पाई जा रही हैं| इन प्लास्टिक चीजों में काफी मात्रा में प्लास्टिक बोतल के ढक्कन पाए जाते हैं| अनेक आकार तथा आकर्षक रंगों के कारण इन ढक्कनों को ये समुद्री पंछी मछली मानते हैं और उन्हें निगल लेते हैं| इन पंछियों को दॉंत तो होते ही नहीं| इसीलिए ये सिर्फ इन्हें निगल लेते हैं| इनके पेट में ये प्लास्टिक जमा हो जाता है और इनकी मात्रा बढ़ने पर इन बेचारे पंछियों की तड़प तड़प कर मौत हो जाती है| काफी पंछियों की चोंच में इस प्लास्टिक के फंस जाने पर भी इनकी मौत हो जाती है|

मधुमक्खी का इस विश्व की जीवस्थिति में बहुत बड़ा स्थान है| पूरे  अनाज और पौधों की निर्मिति का मधुमक्खी एक अहम् हिस्सा है| प्रदुषण के कारण मधुमक्खी की आबादी तेज रफ़्तार से घट रही है| पिछले ४० वर्षों में ३० प्रतिशत मधुमक्खियां कम हुई हैं| सी सी डी याने कॉलोनी कोलैप्स डिजीज नाम के साथ इन मधुमक्खियों पर हुए संशोधन से पता चला है कि वायु प्रदूषण, खेती में रसायनों का अधिकाधिक प्रयोग तथा जल प्रदूषण के कारण इन मधुमक्खियों का नष्ट होना शुरू हो चुका है| अगर इनके नष्ट होने की रफ़्तार यही रही तो आने वाले ८० वर्षों के अंदर पृथ्वी पर से ५० प्रतिशत पौधे नष्ट हो जाएंगे और इसके साथ ही शुरू में ६० प्रतिशत छोटे जीव भी नष्ट हो जाएंगे|

हमें पता है कि इन दिनों प्रदूषण के कारण बहुत सारे प्रदूषित वायु जैसे कि हायड्रोजन सल्फाइड पर्जन्य को भी प्रदूषित करते हैं और हमें एसिड रेन आम्ल बारिश सहन करनी पड़ती है| इस एसिड रेन से प्रकृति का बहुत बड़ा नुकसान होता है| प्रकृति का तो नुकसान है ही पर अंत में सब से बड़ा नुकसान हमारा ही है|

जब तक मनुष्य प्रकृति के साथ तालमेल स्थापित नहीं करता तब तक उसकी औद्योगिक प्रगति व्यर्थ है| इस प्रगति को नियंत्रण में रखने की जरूरत है| हम ऐसे औद्योगिक विकास से विमुख रहें, जो हमारे सहज जीवन में बाधा डाले| हम वनों, पर्वतों, जलाशयों और नदियों के लाभ से वंचित न हों| नगरों के साथ -साथ ग्राम भी सम्पन्न बने रहे; क्योंकि बहुत-सी बातों में नगर ग्रामों पर निर्भर करते हैं| नगरीय संस्कृति के साथ -साथ ग्रामीण संस्कृति का भी विकास होता रहे|

 

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