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****अविनाश कोल्हे*****

 इस समझौते का देश के अन्य अलगाववादी अंदोलनों पर भी प्रभाव पडेगा। वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में सत्ता में काबिज सरकार कें बडे दल ‘‘पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी’’ ने इस समझौते को महत्वपूर्ण कहा है। यह समझौता सफल हो गया तो देश के अन्य अलगाववादी गुटों को ऐसा समझौता करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। इसके लिए यह समझौता एक नमूना हो सकता है।

      मोदी सरकार का एक वर्ष का कार्यकाल पूरा        हो गया। इस बीच इसकी अनेक स्तरों पर चर्चा भी हुई। इस सरकार ने क्या खोया और क्या पाया, इस पर सकारात्मक-नकारात्मक चर्चा अभी भी चल रही है। मोदी सरकार ने आगे बढ कर नगालैंड के विद्रोहियों के साथ ३ अगस्त २०१५ को जो समझौता किया है, उसका महत्व सभी ने स्वीकार किया है। भारत के पूर्वोत्तर के सात राज्यों को हमेशा राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग माना जाता है। यह भाग भारत के साथ सिलीगुडी कॉरिडोर के संकरे भू भाग से जुड़ा हुआ है। चीन, म्यांमार व बांग्लादेश की सीमा से भी यह भाग घिरा हुआ है। परिणाम स्वरुप यहां अलगाववादी ताकतें देश स्वंतत्र होने के समय से ही सक्रिय है। यह अलगाववाद पिछले ६० वर्षो में कभी कम कभी अधिक द्खिाई देता है। इसमें भी नगा आंदोलन बहुत पुराना है। अनेक नगा यह मानते ही नहीं थे कि वे भारत के हैं। इसका सीधा मतलब था कि भारत का संविधान उन्हें मान्य नहीं है और भारत के संविधान के दायरे में कोई समझौता हो नहीं सकता। अब इस समझौते के द्वारा उन्होंने यह बात मान ली यह महत्वपूर्ण है।   

      पूर्वोत्तर के लगभग सभी राज्यों में अलगाववादी सक्रिय है। इसकी शुरूआत झुपू फीजो के द्वारा चलाए गए स्वतंत्र नगालैंड अंादोलन से हुई। देश की स्वतंत्रता के साथ ही इस आंदोलन की शुरूआत हुई। तब से देश के प्रत्येक केंद्र सरकार ने नगा समाज की समस्या को हल करने का ईमानदार प्रयास किया परन्तु किसी न किसी बहाने यह प्रयास सफल नहीं हो पाया। अब नरेन्द्र मोदी सरकार नगा विद्रोहियो से शांति समझौता किया है।     

      ३ अगस्त २०१५ को दिल्ली में नगालैंड के प्रमुख विद्रोही संगठन ऐतिहसिक नेशनल कौंसिल आफ नगालैंड के साथ केन्द्र सरकार ने यह समझौता किया है। इससे अब नगा समाज की समस्या हल करने में सुविधा होगी। पिछले ६० साल से नगा इसके लिए संघर्ष कर रहे थे। अब नगालैंड में शांति स्थापित होने में तथा नगालैंड के विकास में यह समझौता मददगार साबित होगा ऐसा लगता है।   

      ऐसा कहने का कारण है कि इस समझौते में विद्रोहियों का केवल एक बड़ा गुट सम्मिलित है। वह गुट है आयझाक और मुईवाह का। दूसरे विद्रोही गुट सम्मिलित नहीं हैं। उदाहरण के लिए कहें तो खापलांग का गुट इस में सम्मिलित नहीं है। इस समझौते में जो गुट शमिल नहीं हैं, वे इस समझौते को किस दृष्टिकोण से देखते हैं यह कहना कठिन है। हालांकि यह शीघ्र ही स्पष्ट हो जाएगा। नगा आंदोलन के अनेक नेताओं की तरह खापलांग भी भारत का निवासी नहीं है। वह थाइलैण्ड से अपना संगठन संचलित करता है। इसके बावजूद उसके गुट की नगालैंड के छह जिलों पर भी उसकी पकड़ है। उसी प्रकार मणिपुर के छह नगा बहुल जिलों पर भी उसकी पकड है। शायद इसिलिए मणिपुर के मुख्यमंत्री टी आर जेलिंग ने घोषणा की कि एक १६ सदस्यीय शिष्ट मण्डल शीघ्र ही खापलांग से बात करने के लिए म्यांमार जानेवाला है।   

      नगालैंड में सक्रिय विभिन्न गुटों के बीच भी प्रतियोगिता होती है। इसे समझने के लिए समस्या के आधुनिक इतिहास को सामने रखना पड़ेगा।   

      ब्रिटिशों ने इ.स. १८२६ में असम को तथा १८८१ में नगालैंड को ब्रिटिश भारत में मिला लिया। इस सम्मिलन को नगा समाज स्वीकार करने को तैयार नहीं था। इसके विरोध के लिए २० नगा एक साथ आए तथा नगा क्लब की स्थापना की इन लोगों ने पहले महायुध्द में भाग लिया था। १९१८ में नगा क्लब ने खुलकर विरोध करना प्रांरम्भ कर दिया। जरूरत पडी तो हिंसा का भी सहारा लिया। १९२९ में भारत आए साइमन कमीशन के सामने भी नगा समाज के नेताओं ने मांग रखी कि ‘हमें हमारे तरीके से जीने दो’। स्वंतत्र नगा प्रदेश की मांग तब से चली आ रही है। साइमन कमिशन ने इस मांग को नहीं माना। पर १९३५ में अग्रेजों ने नगा हिल्स को वर्जित क्षेत्र (एक्सक्लूडेड एरिया) घोषित कर दिया। यही से अलगाववाद के बीज पड गए।

      इस समस्या की अगली सीढी यांनी १९४६ में प्रसिध्द नगा नेता फिजो द्वारा नगा नेशनल काउंसिल की स्थापना। इस संगठन ने १४ अगस्त १९४७ कों नगालैंड की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। उस समय असम राज्य बहुत बड़ा था। तत्कालीन केन्द्र सरकार ने नगा समाज के दो नेताओं तथा असम के राज्यपाल के बीच एक समझौता करवाया। असम के तत्कालीन राज्यपाल ने २ जून १९४६ को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के अनुसार नगा समाज को स्वयं की संस्कृति सुरक्षित रखने का अधिकार दिया गया। इस समझौते की धारा ९ के अनुसार केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि की हैसियत से राज्यपाल को इस समझौते को लागू करने के लिये दस वर्ष के लिये विशेष अधिकार दिए गए। यह अनुबंध नगा समाज को स्वीकार्य नहीं था। फिजो ने इस समझौते को अस्वीकार कर दिया और घोषणा की कि सभी नगाओं का विचार जानकर यह निष्कर्ष निकाला गया था कि ९९% नगा विकास तथा स्वतंत्रता चाहते है। इतना ही नहीं तो उसने स्वयं के नाम से भूमिगत सरकार की स्थापना की तथा सेना भी बनाई। यही से नगाओं का सशस्त्र युध्द चालू हुआ।        

      फिजो की सेना व भारतीय सेना के बीच मुठभेड भी होने लगी। भारत सरकार ने १९५२ में बड़ी सैन्य कार्यवाही कर इस भाग पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। उसके बाद १९५६ में फिजो लंदन भाग गया। उसने विदेश में फैडरल गवर्नमेंट ऑफ नगालैंड की स्धापना की। सेना को विशेष अधिकार देने वाला विवादित नियम यानी ‘आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर (अस्पा) १९५८ से नगा क्षेत्र में लागू किया गया। परन्तु इस समस्या का हल सेना के द्वारा किया जाना संम्भव नहीं था। इसलिए जयप्रकाश नारायण आदि के नेतृत्व में १९६३ में असम राज्य के नगा बहुल पर्वतीय जिलों को स्वंतत्र प्रदेश का दर्जा दिया गया। परिणाम स्वरूप १९६३ में नगालैंड १६ वें राज्य के रूप में भारत नक्शे में शामिल हुआ। साथ-साथ नगा नेताओं के साथ बातचीत भी जारी थी। यह बातचीत १९६७ में असफल हो गई। इसका दूसरा नतीजा यह हुआ कि नगा समाज में फूट पड़ गई।   

      नगा नेताओं के साथ फिर बातचीत प्रारम्भ हुई। जिसके परिणाम स्वरूप १९७५ में ‘शिलांग समझौता’ हुआ। इस समझौते के पीछे तत्कालीन गृहसचिव एल.पी.सिंह का महत्वपूर्ण योगदान था। फिजो के निधन के बाद आंदोलन का नेतृत्व मुईवाह, आइझेक, खापलांग तथा खोले कोन्याक के पास आया। शिलांग समझौता मुईवाह गुट को स्वीकार्य नहीं था। समझौते के समय मुईवाह चीन में थे। उन्होंने ३० जनवरी १९८० को ‘नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल आफ नगालैंड’ नामक संगठन की स्थापना की। उस समय सी.एस. आइझेक तथा मणिपुर में जिस गुट ने सेना पर हमला किया था वे खापलांग के साथ ही थे। खापलांग ने १९८८ में बाहर आकर अलग संगठन बनाया। उसके बाद ही हिंसक कार्यवाहियां बढ गईं।

      १९९० के दशक में भारत के करीब-करीब सभी प्रधान मंत्रियों ने इस समस्या के निराकरण का प्रयास किया। मुईवाह ने १९९५ में तत्कालीन प्रधान मंत्री नरसिंह राव से पेरिस में मुलाकात भी की। उसी प्रकार १९९७ में देवगौड़ा ने भुरिंच में, वाजपेयी ने १९९८ में पेरिस में तथा मनमोहन सिंह ने २००४ में दिल्ली में बातचीत की। १९९७ में वाजपेयी प्रधानमंत्री रहते केन्द्र सरकार ने मुहीवाह आयझेक के गुट के साथ एक समझौता किया था। देखा जाए तो अभी किया गया समझौता उसी समझौते के समान है।

      इसके बावजूद समस्या का समाधान इतना आसान नहीं है। नगा समाज की मूल मांग ‘स्वतंत्र नगालैंड’ है। इस मांग को स्वीकार करने का अर्थ होगा देश के विभाजन को स्वीकार करना। इसका दूसरा हिस्सा तो और उलझा हुआ है। नगा जमात के नेताओं को असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, इन राज्यों के तथा म्यांमार के नगा बहुल क्षेत्रों को मिलाकर विशाल नगालैंड (नागालिम) बनाना है। इस मांग को स्वीकार करना कदापि सम्भव नहीं है। एक तो इसमें म्यांमार का भाग अपेक्षित है और दूसरा मणिपुर, असम आदि के भूभागों को नगालैंड में शामिल करने के लिए इन राज्यों की सीमाएं बदलनी होंगी। यह भी लगभग असंभव है।

      इस समझौते पर कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी ने कड़ी टिप्पणी की है। उनके अनुसार ऐसा कोई समझौता करना हो तो मणिपुर, असम तथा अरुणाचल प्रदेश के मुख्य मंत्रियों को भी शामिल करना चाहिए। इसके विपरीत इन मुख्य मंत्रियों को पूरी तरह अंधेरे में रखा गया। इन तीनों राज्यों में कांग्रेस की सरकार है। यह तो दलगत राजनीति का हिस्सा हो गया।

      इसमें सबसे विवादित मांग ‘‘विशाल नगालैंड’’ की है। आज नगा समाज की जनसंख्या लगभग ३० लाख है। जिसमें से बीस लाख नगालैंड में रहते हैं। बाकी के दस लाख अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, असम तथा म्यांमार में रहते हैं। इन दस लाख में से साड़े छह लाख मणिपुर के पर्वतीय क्षेत्र में रहते हैं। यही कारण है कि यह समस्या बहुत उलझी हुई है। मणिपुर अपनी भूमि का एक इंच भी देने को तैयार नहीं है। अभी तक इस समझौते की शर्तों  क़ी घोषणा हुई नहीं। परन्तु इस समझौते को लागू करने में बहुत ही कठिनाइयां आनेवाली है, इसमें दो मत नहीं है। इस हालत में सरकार ने नगा नेताओं को कौन से आश्वासन दिए हैं यह शीघ्र ही सामने आना चाहिए। असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ऐसी घोषणा कर चुके हैं कि ‘‘यदि यह समझौता असम के हितों के विरुध्द होगा तो हम इसे लागू नहीं करने देंगे।’’ महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि नगालैंड के नगाओं की इस समझौते के लिए सहमति होना जरूरी है। संक्षेप में कहें तो इस समझौते का स्वागत करते समय समझौते को लागू करने के रास्ते में आनेवाली कठिनाइयों का आंकलन करना ठीक होगा।

      इस समझौते को लागू करने के संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण बिन्दु है, वह है नागाओं के कब्जे के शस्त्रों का। समझौते के अनुसार नगा विद्रोही सभी शस्त्र सरकार के कब्जे में दे देंगे। ये शस्त्र कितने हैं तथा कौन कब्जे में लेगा यह पूरी कार्यवाही बहुत जटिल रहेगी।

      जिस गुट के साथ समझौता हुआ है, उसके अलावा अन्य संगठनों का इस समझौते के विषय में क्या दृष्टिकोण होगा यह भी ध्यान  देना होगा। आर.एस.रेझींग नगा समाज की सरकार के गृह मंत्री हैं। वे इस समझौते के बाद खुलकर कहते हैं कि हम इस समझौते को स्वीकार करेंगे। हमें भारतीय सविधान मान्य नहीं है। इसका मतलब कि उन्हें संविधान की धारा ३६१ में रुचि नहीं हैं। यह धारा नगालैंड को खास दर्जा देती है। तथा राज्य की मौलिकता को सुरक्षित रखते हुए इसमें दिशा निर्देश भी है।

      इस समझौते का देश के अन्य अलगाववादी अंदोलनों पर भी प्रभाव पडेगा। वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में सत्ता में काबिज सरकार कें बडे दल ‘‘पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी’’ ने इस समझौते को महत्वपूर्ण कहा है। यह समझौता सफल हो गया तो देश के अन्य अलगाववादी गुटों को ऐसा समझौता करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। इसके लिए यह समझौता एक नमूना हो सकता है। इस संदर्भ में भूतपूर्व प्रधान मंत्री नरसिंह राव ने जो कहा  वह ध्यान में रखना पड़ेगा। वे कहते है ‘‘भारतीय संविधान के दायरे में जो मांगना हो मांगो। उस पर विचार करेंगे और चर्चा भी करेंगे। पर देश को तोड़ने वाली किसी मांग का विचार नहीं करेंगे।’’ इस कथन में मार्गदर्शक तत्व स्पष्ट है।                                                          

 मो.ः ९८९२१०३८८०

 

 

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