अटल जी के साथ कुछ अविस्मरणीय पल

‘अटल जी के साथ बीते हुए क्षण अविस्मरणीय थे। उनका एक सामान्य से व्यक्ति से आत्मीयता से मिलना, हास-परिहास उनके असाधारण व्यक्तित्व का एहसास दिला जाता है। अनंत अटल को शत-सहस्र प्रणाम!”

16अगस्त 2018 की दोपहर, विविध भारती पर एक बहुत ही पुराना मोहम्मद रफी का प्रसिद्ध गाना आ रहा था- चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देस हुआ बेगाना और उसी समय टेलीविजन के समाचार चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज के साथ हृदय विदारक समाचार आया कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री, भारतरत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी अब नहीं रहे और लंबी बीमारी के पश्चात उनका अवसान हो गया। काल के कपाल पर लिखने और मिटाने वाले, वाणी और वाग्मिल के वैभव से सब को लुभाने वाले, भारत की राजनीति को विगत पचास वर्षों से अपने मोहक व्यक्तित्व से प्रभावित करने वाले विराट व्यक्तित्व के धनी अटल बिहारी इस नश्वर संसार को छोड़ कर अनंत में विलीन हो चुके थे। संपूर्ण देश ने भारी मन से इस सत्य को स्वीकार किया था। लेकिन मुझे अटल जी की उन पंक्तियों का स्मरण हो आया, जिसमे लौट के आने का आश्वासन था- मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौट कर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं। यद्यपि अटल जी अपने भौतिक स्वरूप में संसार मे नहीं हैं, किंन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि वे चेतना के रूप में, प्रेरणा के रूप में, वे सदैव अमर रहेंगे।

अटल जी का जाना एक युग का बीत जाना है। उन्होंने भारतीय राजनीति को ही नहीं बल्कि भारतीय समाज जीवन को भी अपने व्यक्तित्व और कार्यप्रणाली से प्रभावित किया था। ऐसे युग पुरुष के साथ कुछ पल बिताने और उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त करना, यह जीवन का सबसे बड़ा प्रसाद माना जा सकता है।

वैसे अटल जी का सानिध्य हमें दिल्ली में प्राप्त हुआ था जब वे नई दिल्ली लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे। नई दिल्ली में उनके चुनाव प्रभारी वरिष्ठ नेता श्री रामभज जी थे। उनके साथ कई बार मिलने का अवसर आया था किंन्तु उनसे प्रत्यक्ष बातचीत का अवसर नही मिला था। तथापि, अटल जी के साथ कुछ देर बातचीत का अवसर मुंबई में मिला था जिसका श्रेय उत्तर प्रदेश के वर्तमान राज्यपाल श्रीराम भाऊ को जाता है।

वर्ष 1994 में जब श्री रामभाऊ ने कैंसर के असाध्य रोग से मुक्त होकर सार्वजनिक जीवन में पूरी जीजीविषा से पुन: प्रवेश करने का निर्णय किया, तब उसका सार्वजनिक कार्यक्रम मुंबई में रखा गया था। कार्यक्रम का शीर्षक था- पुन:श्च हरिओम और इस कार्यक्रम में माननीय श्री अटल जी और आडवाणी जी दोनों ने आकर रामभाऊ का अभिनंदन करके उनके सार्वजनिक जीवन में वापस लौटने की शुभकामना की थी। उक्त कार्यक्रम के संचालन का दायित्व श्री रामभाऊ ने मुझे सौंपा था। यह कार्यक्रम मात्र राजनीतिक नहीं था, बल्कि उसके साथ गहन संवेदना और भावनात्मक आत्मीयता भी जुड़ी हुई थी और ऐसे कार्यक्रम में श्री अटल जी, आडवाणी जी आदि राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की उपस्थिति ने मेरे दिल की धड़कनों को बढ़ा दिया था। तथापि, वह ऐतिहासिक कार्यक्रम 24 सितम्बर 1994 को बोरीवली के कोरा ग्राउंड में बड़ी भव्यता के साथ संपन्न हुआ था। कार्यक्रम के बाद श्री रामभाऊ ने हम सबका परिचय कराया था, जिनमें उनकी चिकित्सा करने वाले डॉक्टर भी थे। अटल जी सबसे बड़ी आत्मीयता के साथ मिले। बाद में हमारा परिचय हुआ, अटल जी ने मेरे संचालन की सराहना करते हुए मुझे पूछा कि लिखते भी हैं क्या? मैंने संकोचवश कहा नहीं, उन्होंने सुझाव दिया, लिखना शुरु करिए, वह बचेगा, बोला गया केवल सुना जाता है, लिखेंगे और अच्छा लिखेगे तो वह संजोया जाएगा। मैंने उनकी इस बात को गांठ में बांध तो लिया, लेकिन बहुत कुछ नहीं लिख पाया था।

अटल जी का दूसरी बार साहचर्य कुछ वर्षों के बाद मालाड (पश्चिम) के एक बहुत ही साहित्यिक सांस्कृतिक मंच पर प्राप्त हुआ। अवसर था वीनस कल्चरल एसोसिएशन के तत्वावधान में उस समय के युवा नेता श्री जयप्रकाश ठाकुर द्वारा फिल्म जगत के शीर्षस्थ गीतकार एवं कवि श्री प्रदीप जी का सार्वजनिक सम्मान एवं अभिनंदन! उस समय श्री प्रदीप जी बहुत बीमार चल रहे थे, लेकिन जब उन्हें यह पता चला कि उनके सम्मान के लिए अटल जी ने अपनी सहर्ष स्वीकृती प्रदान की है, तो वह प्रसन्न भी हुए थे और उन्होंने सम्मान प्राप्त करने के लिए अपनी सहमति दे दी।

निश्चित समय पर कार्यक्रम का आयोजन मालाड (प) के राजे शहाजी मैदान में, जो अब रामलीला ग्राउंड के नाम से जाना जाता है, आयोजित था। इस कार्यक्रम के मंच संचालन का भार श्री जयप्रकाश ठाकुर जी ने मुझे सौंपा था। यह एक ऐसा कार्यक्रम था, जिसमें वाग्निता के शलाका पुरुष अटल जी के हाथों कविवर्य गीतकार प्रदीप जी जैसे महान रचनाकार का अभिनंदन होना था। ऐसे कार्यक्रम का संचालन एक ओर मेरे लिए गौरव की बात थी तो दूसरी ओर इस बात का संशय था कि संचालन में थोड़ी सी भी न्यूनता और निम्नता से पूरे आयोजन की भव्यता में शिथिलता आ सकती है। भगवान श्री हनुमान जी को स्मरण करके मैंने कार्यक्रम का संचालन का दायित्व संभाला।

इस रात्रि को राजे शहाजी मैदान में तिल रखने की जगह नहीं थी। अपार भीड़ थी। श्री जयप्रकाश जी ने मंच की भव्य सज्जा की थी। उस मंच पर जब श्री राम नाईक जी, श्री प्रमोद महाजन एवं अन्य नेताओं के साथ अटल जी पधारे तब तुमुल हर्षध्वनि से जनता ने उनका स्वागत किया था। ‘देश का नेता कैसा हो, अटल बिहारी जैसा हो’ के नारों से आकाश गूंज उठा किंतु उस समय अटल जी ने कहा कि इस समय यह नारा नहीं लगना चाहिए बल्कि यह कामना करनी चाहिए कि प्रदीप जी पूर्ण स्वस्थ हो और हमारे बीच आकर अपने गीतों से हमें भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लायक बनाए।

सभा शांत हुई, अटल जी ने प्रदीप जी का भावपूर्ण सम्मान किया और कहा कि प्रदीप जी का सम्मान का यह कार्यक्रम उनके प्रति श्रद्धा निवेदन का पर्व है। प्रदीप जी का अभिनंदन करके हम सब स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं; क्योंकि उनके गीतों से नौजवानों में राष्ट्र भक्ति की भावना जगती है, देश के लिए कुछ कर गुजरने की हिम्मत मिलती है। ‘ए मेरे वतन के लोगों- जरा आंख में भर लो पानी’ यह कालजयी गीत है। जब तक सूरज चांद रहेगा- यह गीत हर भारतीय के मन को भारत भक्ति से ओतप्रोत करता रहेगा। श्री राम नाईक के प्रारंभिक प्रास्ताविक तथा श्री जयप्रकाश ठाकुर ने धन्यवाद ज्ञापन के बाद प्रदीप जी के गीतों का वहां सस्वर गायन हुआ था। अटल जी ने वे सभी गीत सुने और उनके गायक कलाकारों की सराहना की। कार्यक्रम के बाद श्री राम भाऊ ने मेरा परिचय कराया। बड़े ही सहजता से उन्होंने कहा मैं आप के संचालन को बड़े ध्यान से सुन रहा था, मैं गद्गद् हो गया और वह प्रदीप जी के अभिवादन की संध्या मेरे मन में अटल दीप का प्राकट्य करके चिरस्थायी हो गई।

वर्ष 1998 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी, अटल जी प्रधानमंत्री थे, देश में नई आशा का संचार हुआ था। मुंबई में स्वदेशी जागरण मंच द्वारा विशाल स्वदेशी उद्योग मेले का आयोजन किया गया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मुंबई के कार्यवाह श्री विमल श्री केडिया के देखरेख में स्वदेशी उद्योग मेले का भव्य आयोजन सोमैया ग्राउंड में था। उसका समापन प्रधानमंत्री श्री अटल जी के द्वारा होना था। उस समय के समापन सत्र के संचालन हेतु श्री विमल जी ने मुझे
निर्देश दिए। प्रधानमंत्री के कार्यक्रम का संचालन मेरे लिए गौरव की बात थी। प्रधानमंत्री कार्यालय से संदेश आया था कि प्रधानमंत्री केवल 40 मिनट मेले में रहेंगे, 10 मिनट वे मेले को देखना पसंद करेंगे और 30 मिनट में समापन सत्र समाप्त होना चाहिए। मंच पर प्रधानमंत्री के साथ केवल तीन व्यक्ति रहेंगे। निर्धारित समय पर समापन सत्र प्रारंभ हुआ। प्रधानमंत्री की सुरक्षा बहुत अधिक थी, ऐसे सुरक्षा कवच के बीच में भी मेरे अभिवादन को स्वीकार किया था और संचालन की प्रशंसा की थी।

अटल जी से अंतिम बार निकटता से मिलने का अवसर वर्ष 2000 में न्यूयॉर्क के संयुक्त राष्ट्र संघ के सभागार में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन के समापन के बाद स्टेटस आयरलैंड में भारतवंशी द्वारा आयोजित संत सम्मेलन में मिला। सम्मेलन में भारत के लगभग 200 संत महात्मा तथा धर्माचार्यों ने भाग लिया था। जिसमें पूज्य श्री रामभद्राचार्य जी, आचार्य श्री धर्मेंद्र, श्री श्री रविशंकर आदि ने भाग लिया था। ऐसे सभी संतो धर्माचार्यों से मिलने के लिए स्वयं प्रधानमंत्री के रूप में श्री अटल बिहारी ने आकर उन्हें संबोधित किया था और भारत की संस्कृति का अमेरिका की धरती पर यशोगान किया था। उस समय सुरक्षा व्यवस्था बहुत कड़ी होने पर भी उनका 2 मिनट का समय मिला था। कुशल क्षेम पूछ कर विदा ली थी। अटल जी के साथ बीते हुए क्षण अविस्मरणीय थे। उनका एक सामान्य से व्यक्ति से आत्मीयता से मिलना, हास-परिहास उनके असाधारण व्यक्तित्व का एहसास दिला जाता है और उन्हीं की लिखी पंक्तियों को सार्थक करता है –

आदमी की पहचान,

उसके धन या आसन से नहीं होती,

उसके मन से होती है,

मन की फकीरी पर,

कुबेर की संपदा रोती है …

ऐसे अनंत अटल को शत-सहस्र प्रणाम!

 

 

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