‘मनोहर’ही थे… उनके जैसा कोई नहीं हो सकता — सुभाष वेलिंगेकर

प्राचार्य सुभाष वेलिंगेकर जी को मनोहर पर्रिकर अपना राजनीतिक गुरू मानते थे। कुछ राजनीतिक मतभेदों के कारण दोनों में दुरिया आ गयी थी, जिसका मलाल दोनों को था। पर्रिकर जी की मृत्यू के पश्चात कोंकणी भाषा में लिए गए साक्षात्कार का हिंदी अनुवाद पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं ।

सर्वप्रथम मनोहर पर्रिकर जी के बारे में आप अपनी भावनाएं व्यक्त करें।

सच कहूं तो मैंने मेरे अत्यंत करीबी मित्र को खोया है। अगर मेरे नसीब में 2012 से लेकर 2019 का कालखंड न आता तो मेरे ऊपर ईश्वर के बडे उपकार होते। मेरे सबसे करीबी मित्र जिनसे केवल मेरी ही नहीं बल्कि गोवावासियों की अपेक्षाएं जुडीं थीं, मुझे उनके मित्रत्व का त्याग करना पड़ा। राजनैतिक तत्वों के कारण ये मतभेद हो गये थे। हालांकि हम मन से नहीं टूटे थे, सिर्फ राजनैतिक स्तर पर अलग-अलग कारणों से मतभिन्नता आ गयी थी। पुरानी यादों को कोई मिटा नहीं सकता और न ही उनको भुलाया जा सकता है। मनोहर और मेरी उम्र में सात साल का अंतर था, पर मुझे और मेरी पत्नी को वो हमारे बेटे जैसे ही लगते थे। उनकी पत्नी मेधा भाभी तो जैसे हमारे घर की ही सदस्य थी। संघ कार्य के दौरान उनका घर मेरे संपर्क का पक्का घर था। उनके माता-पिता के साथ मेरा अभिन्न रिश्ता था। घंटो बैठकर बातें हुआ करती थीं। उनकी मां हमारे घर आकर रहा करती थीं। मेरी पत्नी, उनकी मां, मेधा भाभी साथ-साथ प्रचार के लिए घूमते थे। हमारा घर मानो उनका पणजी का दूसरा घर था, उसमें बिलकुल भिन्नता नहीं थी। परंतु उस कालखंड ने एक असहनीय खाई हमारे बीच खडी कर दी। वह अत्यंत दर्दनाक स्थिति थी।

आपको उनका राजनैतिक गुरू माना जाता है। क्या आप हमें बता सकते हैं कि आप उनको राजनीति में कैसे लाए?

यहां पर राजनैतिक गुरू या शिष्य यह संबोधन जरूरी नहीं है और योग्य भी नहीं है। कोई किसी का गुरू या शिष्य नहीं होता। हर एक की स्वयं की प्रतिभा होती है। मनोहर का मुझे गुरू मानना उनका बडप्पन था। वास्तविक रूप से उनका राजनीति में आना ही एक आश्चर्य की बात थी। उस वक्त गोवा में भाजपा का काम शुरू करना था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बैठक में हम लोगों ने तय किया कि महाराष्ट्रवादी गोमांतक पक्ष के साथ मिलकर उनसे दो सीटें मांगी जाए। एक श्रीपाद नाईक के लिए कुंभारजुवा और दूसरा आशाताई सालकर के लिए मुरगांव। हम लोगों ने तत्कालीन अध्यक्ष के पास मिन्नतें की पर वो माने नहीं। उनको यह भी बताया कि हम निष्ठावान कार्यकर्ता हैं, जी जान से प्रयास करके सीट जीतायेंगे। फिर भी वो नहीं माने। फिर एक बैठक में तय किया कि म.गो.पक्ष पर दबाव तंत्र अपनाया जाय। फिर सोचा की म्हापसा के म.गो.पक्ष के नेता श्री. सुरेंद्र सिरसाट के खिलाफ फॉर्म भरा जाए। शायद राजनैतिक दबाव में आकर सीट ही मिल जाए।

उसी दौरान मनोहर किसी सभा की तैयारी में लगे हुए थे। कुर्सियां लगाने का काम चल रहा था। मैं वहां गया मेरी मोटरसाइकल के पास खडे रहकर ही हमने बात की। मैंने उनको पूरा प्लान समझाया। उनका संघ पर प्रगाढ विश्वास था। वे सोचते थे कि अगर संघ बताता है, तो वह बात गलत नहीं हो सकती। उन्होंने तुरंत घर जाकर अपने माता-पिता और पत्नी को समझाने का प्रयास किया।

उनके पिताजी भडके, गुस्सा हुए। उन्होंने पूछा, ‘वो वेलींगकर खुद क्यों नहीं इलेक्शन में खडा रहता? वो बडा होशियार है, आगे क्या होगा वो जानता है। उसने जान-बूझकर तुझे आगे किया है।” वो बडी अधिकार वाणी से गुस्सा कर रहे थे।

दूसरी ओर मेधा भाभी ने शस्त्र उठाया था कि “अगर तुम इलेक्शन लडोगे तो मैं मेरे मायके लोनावला चली जाऊंगी।” मनोहर भी जिद्दी थे, उन्होंने कहा “यह संघ का निर्णय है, मैं उसे ठुकरा नहीं सकता। तुम जाना चाहती हो तो जा सकती हो। मैं इलेक्शन लडूंगा ही।” उसने किसी को भी नहीं बताया था कि यह केवल एक नाटक है, केवल दबाव तंत्र है। आखिरकार अर्जी पीछे ले ली गयी, उसका परिणाम कुछ भी नहीं निकला। उस समय राजनीति में हम लोग अपरिपक्व ही थे।

इस घटना के बाद एक बात पता चली कि अगर मनोहर कोई बात ठान लेते हैं तो पूरी करके ही रहते हैं। उनकी जिद हमें पता चली। शुरू में हमने तीन-नेता भाजपा को दिए, जिसमें श्रीपद नाईक जो सरपंच थे। दूसरे लक्ष्मीकांत पार्सेकर थे, जिनके चाचा सरपंच थे और घर में राजनीति का माहौल था। तीसरे राजेन्द्र आर्लेकर थे। फिर 250 कार्यकर्ता भाजपा को दे दिए।

मनोहर बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। किसी भी तय की गई बात को पूर्ण करने के लिए आवश्यक हर प्रकार का नेतृत्व गुण उनके अंदर था। हम सभी को लगा, यही योग्य व्यक्ति हैं, जिनको हम प्रमुख पद दे सकते हैं। मजाक में मैंने मनोहर को कहा था “ये आफत अब आपके गले में पड गयी है। आप ही संभालें।” उन्होंने स्वीकार भी किया। उन्होंने अत्यंत विश्वास के साथ अपने परिवार जनों को समझाया। हमने सारे कार्यकर्ताओं से मनोहर का परिचय करवाया। तब श्रीपाद नाईक जनरल सेक्रेटरी थे। अध्यक्ष पद के लिए श्रीपाद और मनोहर दोनों अत्यंत युवा थे। हम लोगों ने गोवा के परिपक्व, अन्य पार्टी में अनुभवपूर्ण कार्य करने वाले नेताओं को टटोलना शुरू किया, क्योंकि हमारे मन में यह भावना थी कि इतने युवा व्यक्ति को अध्यक्ष के रूप में गंभीरता से नहीं लिया जायेगा।

फिर भाई मोये, सुभाष शिरोडकर आदि को समझाया गया। मैंने कहा आप अध्यक्ष बनियें, श्रीपाद और मनोहर जनरल सेक्रेटरी होंगे। यह काल 1990 का था। सुभाष शिरोडकर जी ने कहा “मैं आपके विचारों को मानता हूं पर मुझे राजनीति में रहना है। मैं आपके साथ नहीं आ सकता।’ मैंने बातों-बातों में उन्हें कह दिया था, ‘आप देखिए आगमी 10 सालों में भाजपा का मुख्यमंत्री होगा।’

जब सन 2000 में मनोहर पर्रिकर मुख्यमंत्री बने तो मुझे सुभाष शिरोडकरजी का फोन आया, उनको शिरोडा अर्बन को. ऑपरेटिव बैंक की शाखा का उद्घाटन कराना था, उन्होंने पूछा “क्या आप मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकरजी को उद्घाटक के रूप में ला सकते हैं?” मैं मनोहर के साथ कार्यक्रम में गया परंतु पीछे बैठा था। तब सुभाष शिरोडकर ने अपने भाषण में कहा कि दस साल पहले वेलींगकर ने मुझे कहा था कि भाजपा गोवा को दस साल में मुख्यमंत्री देगी और वह सच हुआ। आज हम मनोहर पर्रिकर के रूप में वह मुख्यमंत्री देख रहे हैं।

आपको लगता था कि मनोहर पर्रिकर मुख्यमंत्री के रूप में योग्य व्यक्ति थे?

जी हां! मनोहर स्वयंभू थे। वो जन्मजात नेता थे, पार्टी के लिए पैसा इकट्ठा करना, संगटनात्मक कार्य, मन की शक्ति से काम करना आदि गुण केवल उन्हीं में थे। एक अलग व्यक्तित्व, कार्यकर्ताओं में चैतन्य भरनेवाला, जबरदस्त उत्साह के साथ अपनी टिम के साथ सतत कार्यरत रहनेवाला था। ‘कोई भी काम हो! करेंगे’, यह इच्छा और उत्साह वे अपनी टीम में प्रवाहित करते थे। जिससे सारे काम हो जाते थे। ऐसा कभी नहीं हुआ कि उनके पास किसी समस्या का हल नहीं। इसीलिए हम उनको कम्प्यूटर ब्रेन कहते थे। वो बचपन से ही बुद्धिमान थे। प्राथमिक स्कूल में उनकी बुद्धिमत्ता देखकर दो कक्षाओं में डबल प्रमोशन देकर आगे की परीक्षा देने के लिए कहा गया था।

डॉ. सुरेश आमोणकर जी ने एक किस्सा सुनाया था कि मनोहर पर्रिकर जी को विद्यालय में अफ्रिका से आये हुए गणित के शिक्षक पढ़ाते थे। उन्होंने एक दिन एक ही गणित का प्रश्न अलग-अलग तरीके से हल करके दिखाया था। तब उन्हें मनोहर पर्रिकर जी ने पूछा कि “क्या मैं ये गणित और अलग तरीके से करके दिखाऊं और उन्होंने दिखाया भी। क्या वो इसी प्रकार से राजनीति का भी गणित अलग प्रकार से किया करते थे?

मनोहर का नेतृत्व एकल नहीं था। वो टीम के रूप में काम करते थे। भाजपा तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अन्य आयाम थे जिनका कार्य संयत गति से चलता था। नियम ऐसा है कि तेजी से दौडने वाले को अपने साथ उन बाकी लोगों को भी साथ लेकर दौडना था। यह काम मनोहर ने किया। पार्टी को ऊपर उठाने के लिए मनोहर के नेतृत्व गुण का फायदा हुआ।
उस वक्त पार्टी को कोई भी पैसा नहीं देता था, साधन सामग्री तथा अन्य स्रोत भी नहीं थे। ऐसे वक्त में पैदल चलकर काम करनेवाले काशीनाथ बावली परब-जनसंघ के कार्यकर्ता थे, उनका योगदान मिला। श्रीपाद नाईक, राजेद्र आर्लेकर, लक्ष्मीकांत पार्सेकर इन तीनों के पास अलग-अलग गुण थे। इन सबको लेकर कार्य को बढाने का काम मनोहर ने किया। मनोहर एक ‘यूनिक’ नेता थे।

संगटनों, पार्टियों में कुछ कार्यकर्ता संगटनात्मक कार्य करते हैं, कुछ केवल कार्यकर्ता होते हैं, कुछ कैडर बेस होते हैं और कुछमें ‘मास अपील’ होती है। मनोहर जी कौन से प्रकार में आते थे?

उनका मास अपील के प्रकार में आनेवाला नेतृत्व था। उन्होंने परिणाम की चिंता से कोई काम नहीं किया। समुह को लेकर चलते थे।

मतलब भाषणबाजी की?

नहीं नहीं, वैसा ‘मास अपील’ नहीं। उन्होंने परिश्रम बहुत किये। संगटनात्मक प्रवास भी बहुत किया है। गांव-गांव में संपर्क किया है। किसी के दबाव से नहीं, स्वयंस्फूर्ति से। अपनी कार्यक्रम सूची बनाकर संपूर्ण गोवा में संपर्क किया है। हर घर में जहां वो गये उनकी यादें होंगी।

सुना है, एक संघ स्वयंसेवक को पैसों की जरूरत थी, तो पर्रिकरजी ने उसकी शिक्षा का पूरा जिम्मा उठाया था। उनके दातृत्व गुण के बारे में आप हमें कुछ बता सकते हैं?

मनोहर बचपन से संघ के स्वयंसेवक थे। पहले कॉलेज, फिर मुंबई में इंजीनियरिंग की पढ़ाई इन सालों में वे गोवा के बाहर ही रहे। पर जब से कमाने लगे, तब से उन्होंने खुद ही तय किया था कि उनकी कमाई का कुछ हिस्सा समाज के लिए ही दिया जाए। जो उन्होंने अंत तक निभाया।

वैसे ही कुछ-कुछ बातें जो उन्होंने पहले से ही तय की थीं, वो उनके जीवन का अविभाज्य घटक थीं। हमारे अनेक कार्यकर्ता सामान्य परिवार में से थे, पर कोई कभी मदद मांगने नहीं आता था। कोई कर्जे में डूबा होता तो किसी का घर अधूरा रहता था पैसों बिना। उनकी स्थिति को मनोहर बखूबी पहचानते थे और उनको मदद किया करते थे।

एक आदमी का धंधा मंदी में था। मनोहर ने उसे बहुत से मार्ग दिखाये पर उसकी स्थिति बदलती ही नहीं थी। आखिर मनोहर ने उसे अपनी कंपनी का स्लिपिंग पार्टनर बनाया और कहा “मेरी कंपनी को कच्चा माल तुम पहुंचाओ।” हर साल मनोहर उसके अकाउंट में पैसे जमा करते रहते। जब उस आदमी की हालत और खराब हो गई, तब मनोहर ने उससे कहा ‘आपके अकाउंट आपके हिस्से के पैसे हैं, वो ले लीजिए।’ फिर मनोहर ने वे पैसे कभी वापिस नहीं मांगे।

मेरे भी जीवन में आर्थिक समस्याएं बहुत थीं। मैं पेशे से शिक्षक था। केवल 15,000/-प्रति माह कमाता था। उसी में से परिवार चलाना, प्रवास, कार्यकर्ताओं का खान-पान ऐसे अनेक खर्चे थे। वो मेरी यह स्थिति भली-भांति जानते थे। वो तो मेरे घर के बेटे जैसे थे। कभी भी रसोई घर में आकर तवे पर से पकती मछली खुद निकालकर बैठकर खाते थे। वो जानते थे कि मेरा परिवार कभी भी कहीं घूमने नहीं गया। वो इंतजाम करना चाहते थे, पर मैं नहीं माना। दातृत्व में उनका सानी कोई नहीं था।

गुरू, पिता या वरिष्ठ के रूप में क्या आपने उनके कभी कान खींचे थे?

वो मेरी आंखों में आंख डालकर कभी नहीं देखते थे। यह मेरे प्रति उनका आदर था। ऐसे बहुत बार हुआ था कि मैंने उन्हें लोगों के सामने कहा ‘आप चुप रहो, अब बाकी लोगों को बोलने दो।’ क्योंकि उनकी एक आदत थी, थोडी सी चर्चा के बाद वे हमेशा कहने लगते ‘तुम्हें वह बात नहीं समझेगी, अब मैं बताता हूं।’ तब मैं उन्हें डांटता था कि “क्या केवल आपको ही सब कुछ समझता है?’ ऐसी अनेक बातें अत्यंत सहज रूप से, मित्रत्व की भावना से होती थी। हम दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम और भक्ति थी। मनोहर मेरे परिवार और मेरे मन के अविभाज्य भाग थे। मेरे भावनात्मक विश्व का एक अहम हिस्सा थे। आज मेरे परिवार का एक घटक नहीं रहा। यह अत्यंत हृदयविदारक है। “सिद्धांत बहुत कडे होते हैं, उनको पालने के लिए अपने जीवन में अनेक करीबी लोगों को दूर करना पडता है, वरना आदर्श जाज्वलय नहीं रहते। आदर्शों के बीज नहीं बोए जाते, न ही सिद्धांतों का कोई प्रतीक आप खडे कर पाते हैं। सिद्धांतों कीही खातिर मुझे मनोहर से दूर जाना पडा।

पार्टी को एकसंघ बनाने में मनोहर पर्रीकर का क्या योगदान था?

पार्टी को एकसंघ बनाने के लिए मानो मनोहर के पैरों में चके बांधे हुए थे। कार्यकर्ताओं को सतत संपर्क करना, उनके घर जाना, उनके साथ मित्रत्त्व का भाव रखना ये सब वे नियमित करते थे। बैठकें लेते थे, पर कार्य उतना ही मर्यादित नहीं- था।
वे जब राष्ट्रीय नेता बने तब हम उन्हें कहते थे अब तो लोगों के साथ हंसिए, उनका हाथ हिलाकर अभिवादन कीजिए, काम के अलावा भी मिलिए-जुलिए।’ कुछ दिनों बाद वे खुद आकर बताने लगे ‘अब मैं हंसने लगा हूं, हाथ भी हिलााता हूं और बच्चों के साथ खेलता भी हूँ।’ वो ऊपर से कठोर दिखते थे, पर हृदय से अत्यंत भावुक थे।

मनोहर पर्रिकर जी की भावुकता से जुड़ी कुछ यादें साझा कीजिए।

मनोहर सचमुच अत्यंत भावुक थे। जब मेधा भाभी का निधन हुआ तो मैं मेरी पत्नी के साथ वहां गया था। वो मेरी पत्नी का हाथ पकडकर बहुत रोए थे। हम वो बात कभी नहीं भूल सकते। कभी-कभी राजनैतिक या व्यक्तिगत परेशानियों के कारण वे इतने व्यथित हो जाते थे कि कहते थे ‘अब मैं थक गया, अब नहीं होगा मुझसे और कुछ।’ मैं उन्हें समझाता था कि जीवन हमेशा फूलों का बगीचा नहीं होता। कभी कभी कांटों भरे रास्ते भी मिलते हैं। हालांकि भावुक होने पर वे जल्दी संभल भी जाते थे।

क्या आपको उनके स्वभाव में कुछ कमिया दिखाई देती थीं?

प्रारंभिक काल में जब पक्ष विकसित हो रहा था, सत्ता मिल गयी थी। सहकर्मी भी उनके स्वभाव की कुछ कमियां संभाल लेते थे। मनोहर के स्वभाव में भी कुछ कमियां थीं, जो उनके सहकारियों ने संभाल ली थीं। उदाहरण के तौर पर बताऊं तो वे कभी-कभी अपने साथियों को विश्वास में लिए बिना, उन्हें कुछ बताए बिना काम कर चुके होते थे। थोडा सा एकधिकार भी था उनमें। दूसरों को बोलने नहीं देते थे। परिस्थिति ने उन्हें वैसा बना दिया था, जो कि पूर्णत: गलत भी नहीं था।
पहले भी जब वे बैट-बॉल लेकर मैदान में जाते थे, तो बैटिंग हमेशा उन्हें ही करनी होती थी। आउट भी हो जाए तो, आउट कैसे नहीं हुए यही समझाते रहते थे। और जब अन्य खिलाड़ी नहीं मानते तो सारा सामान उठाकर वे घर चले जाते थे।
वैसे ही बैठक में भी कुछ अगर उनके मन का नहीं हुआ वे बैठक से ही निकल जाते थे।

मनोहर मनोहर ही थे। उनके जैसा विश्लेषक कहीं नहीं मिलेगा। हर व्यक्ति के बारे में उनका अपना नजरिया होता था। उनके जैसा कोई और नहीं हो सकता है।

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