प्रकृति की रक्षा हमारी सुरक्षा

यदि हम प्रकृति (पर्यावरण) की रक्षा करेंगे तो प्रकृति भी हमारी रक्षा करेगी। धर्मों रक्षति रक्षित: अर्थात पर्यावरण प्रकृति की रक्षा ही हमारा धर्म है।

भारत ऋषि मुनियों की तपोभूमि है। कहा जाता है कि देवताओं ने तपस्या करने के लिए इस तपोभूमि का निर्माण किया था। इसलिए भारतभूमि को भोग भूमि नहीं अपितु तपोभूमि का नाम दिया गया है। हमारे ऋषि मुनि अपनी तपस्या, साधना और ईश्वरीय खोज के लिए जंगलों में रहा करते थे। वे दूरदर्शिता के धनि थे इसलिए वह प्रकृति की पूजा करते थे। वर्तमान समय में भी आपको जंगलों में ज्येष्ठ – श्रेष्ठ ऋषि मुनि, साधु, संत, महात्मा, संन्यासी, परमज्ञानी तपस्यारत दिखाई देंगे। हमारे पूर्वजों ने हजारों – हजारों साल से प्रकृति के साथ तादात्म्य बनाए रखा। इसलिए प्रकृति ने भी उन्हें अपार सुख, साधन, और वैभव प्रदान किया। पूर्व में मानव और पर्यावरण में कोई टकराव या संघर्ष नहीं था। भारतीय मनीषियों ने हजारों वर्षों पूर्व ही प्रकृति के साथ कैसे रहना है इसका मार्ग बताया था। इसके साथ ही उन्होंने यह संकेत भी दिया था कि प्रकृति यानि पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ सम्पूर्ण जीवमंडल के लिए खतरा बन सकती है। इसलिए भारत सदा से ही पर्यावरण प्रेमी रहा है। जब – जब भारत में प्रकृति को हानी पहुंचाने की कोशिश हुई तब – तब भारतीयों ने अपने प्राणों की बाजी लगा कर और बलिदान देकर भी पर्यावरण की रक्षा में सर्वस्व न्योछावर कर दिया। आइये जानते हैं पर्यावरण की रक्षा के लिए हुए आन्दोलन, जनांदोलनो और बलिदान के बारे में।

चिपको एवं बिश्नोई आंदोलन और उनका बलिदान

वृक्षों को काटने से बचाने के लिए भारतीयों ने वृक्षों के साथ लिपट कर विरोध जताया और वृक्षों की रक्षा की। इसे ही कुछ समय बाद चिपको आंदोलन का नाम दिया गया। और हर जगह चिपको आंदोलन एक जनांदोलन के रूप में विख्यात होता गया।

सन 1730 में राजस्थान में जोधपुर के राजा अजय सिंह को अपना विशाल महल बनवाना था। उन्होंने खेजडली गांव के हरे भरे वनों के वृक्षों को काटने का आदेश दिया। राज कर्मचारी कुल्हाड़ी लेकर वृक्षों को काटने हेतु गए। उस समय सभी पुरुष खेतों में गए हुए थे। जब राज कर्मचारी वृक्ष काटने जा रहे थे तभी श्रीमती अमृता देवी एवं उनकी तीन पुत्रियां – आसू बाई, रतनी बाई व भागू बाई ने उनसे गुहार लगाई कि वे हरे भरे वृक्ष न काटे क्योंकि हरे भातरे वृक्ष काटना पाप है और वह हमारे धर्म के विरुद्ध है। अमृता देवी ने कहा कि –

वाम लिया दाग लगे, टुकड़ों देवो न दान।

सर साठे रुख रहे तो भी सस्तो जान॥

अर्थात यदि सर कट जाए और वृक्ष बचा जाए तो भी यह सस्ता सौदा है। बावजूद इसके कर्मचारी नहीं माने और वृक्ष काटने के लिए सिद्ध हुए तो अमृता देवी सर्वप्रथम वृक्षों की रक्षा के लिए वृक्षों से लिपट (चिपक) गई। कुल्हाड़ी के प्रहार से उनका क्षत विक्षत शरीर जमीन पर गिर पड़ा। उनके बाद उनकी तीन मासूम पुत्रियां भी वृक्षों से लिपट गईं और उनके शीश भी धड़ से अलग कर दिए गए। इसका समाचार जंगल में लगी आग की तरह चारों ओर ़फैल गया। सूचना मिलते ही बिश्नोई समाज के लोग घटना स्थल पर जमा होने लगे। उन्होंने भी वृक्षों को बचने के लिए पेड़ो से चिपकना शुरू किया। और देखते ही देखते कुल 363 लोग वृक्षों की रक्षा में बलिदान हो गए। सभी बलिदानी बिश्नोई समाज के थे। इसकी खबर सुनते ही राजा स्वयं उस गांव में आया और अपना आदेश वापस लिया। उसने जनता से माफ़ी मांगी और ऐलान किया कि अब भविष्य में कभी भी हराभरा वृक्ष नहीं काटा जाएगा। बताया जाता है कि बिश्नोई समाज के इस महान बलिदान के पीछे प्रवर्तक संत जाम्भोजी की प्रेरणा थी।

महिलाओं का चिपको आंदोलन

उत्तराखंड के रैनी गांव में 26 मार्च 1974 के दिन पुरुषों की अनुपस्थिति में महिलाओं ने मोर्चा संभाला और वृक्षों को काटने से बचाने के लिए असाधारण साहस का परिचय दिया। श्रीमती गौरा देवी के नेतृत्व में चिपको आंदोलन कर महिलाओं ने रैनी गांव में वनों को कटने से बचाने में महत्वपूर्ण  भूमिका अदा की थी।

उस समय सरकार ने बड़ी संख्या में वनों को काटने की योजना बनाई थी। एक सुनियोजित योजना के तहत सरकार ने मुआवजा देने के बहाने चमोली में बुलाया। सभी पुरुष वहां गए हुए थे। हालांकि महिलाओं को पूर्वाभास हो गया था कि पुरुषों की अनुपस्थिति में वे पेड़ काटने आ सकते हैं। इसलिए महिलाएं पहले से ही सतर्क थीं। सूचना मिलते ही गौरा देवी 27 महिलाओं की टोली बनाकर वनों में पहुंच गईे और उन्होंने कहा कि – जंगलों को मत काटिए, ये हमारा मायका है और पेड़ हमारे देवता हैं। यदि जंगल कटेगा तो हमारे खेत, खलिहान, मकान के साथ मैदान भी नहीं बचेंगे। जंगल बचेगा तो हम बचेंगे। जंगल हमारा परिवार है और जंगल ही हमारा रोजगार है। बावजूद इसके कर्मचारियों पर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ। एक कर्मचारी ने गोली चलाने की धमकी दी तब गौरा देवी ने कहा कि चलाओ गोली, पेड़ काटने से पहले तुम्हें मुझे गोली मारनी होगी। उसी समय गोरा देवी सहित सभी महिलाएं पेड़ों से चिपक गईं और बलिदान के लिए आतुर हो गईं। इससे ठेकेदार के कर्मचारी भयभीत हो गए और अपने कदम पीछे खीच लिए। इस तरह साहस के बल पर महिलाओं ने वनों को कटने से बचा लिया।

अप्पिको आंदोलन

चिपको आंदोलन की तर्ज पर कर्णाटक में वनों की रक्षा हेतु अप्पिको आंदोलन अगस्त 1983 में पर्यावरण प्रेमी पांडुरंग हेगड़े के नेतृत्व में किया गया। कन्नड़ भाषा में चिपको का अर्थ अप्पिको होता है। इस आंदोलन में भी लोगों ने वृक्षों से चिपक कर पेड़ो की रक्षा की। सही मायनों में इस आंदोलन ने जनांदोलन का रूप ले लिया। वन विभाग के ठेकेदार जब वन काटने आते थे तब लोग पेड़ों से चिपक जाते थे। इस आंदोलन को सफल बनाने और जागरूकता ़फैलाने के लिए जंगलों में पैदल मार्च, नुक्कड़ नाटक, लोकनृत्य आदि अभियान चलाए गए।

रक्षक ही भक्षक

वर्तमान समय में मानव स्वार्थ के वशीभूत होकर आर्थिक लाभ कमाने के लिए प्रकृति की अनमोल धरोहरों को ही नष्ट करने पर तुला हुआ है। यदि बाग का माली ही बगीचे का दुश्मन हो तो उस बाग को कैसे बचाए? सच्चाई यह है कि वन विभाग के अधिकारी कर्मचारी धीरे-धीरे जंगलों को नष्ट कर रहे हैं। वन माफियाओं के साथ उनके आर्थिक संवाद हैं, तस्करी जोरों पर हो रही है। जानवरों की खाल के लिए जानवरों की निर्माम हत्या की जाती है। इस तरह की अनेकानेक अवैध गतिविधियां सामने देखी जा सकती हैं। यदि रक्षक ही भक्षक बन जाए तो पर्यावरण की रक्षा कैसे होगी?

जैसी करनी वैसी भरनी

अगर अति खनन किया जाएगा तो धरती का संतुलन तो बिगड़ेगा ही और भूकंप व अन्य प्राकृतिक आपदाएं भी आएंगी। यदि वनों को जलाया जाएगा तो हमारे भविष्य का नाश होना भी तय है। यदि जल को प्रदूषित किया जाएगा और जल संरक्षक नहीं होगा तो जल संकट का सामना भी हमें ही करना पड़ेगा। हवा में जहर घोला जाएगा तो वायु प्रदूषण के रूप में भयानक स्थिति हमें ही झेलनी है। विकास के नाम पर विनाश के इस चक्र को समय रहते यदि नहीं रोका गया तो ग्लोबल वार्मिग के चलते देखते ही देखते सब कुछ तबाह हो जाएगा।

प्रकृति की रक्षा, हमारी सुरक्षा

यमय की मांग है कि जल, जंगल, जमीन, आकाश, प्राणी आदि प्रकृति के सभी घटकों का सम्मान, सुरक्षा और संरक्षण किया जाए। और इन्हें बचाने हेतु  व्यापक स्तर पर आंदोलन चलाए जाए। हमने देखा है कि जब भी आंदोलकों ने आंदोेलन का रूप लिया है, तब-तब सफलता मिली है। यह अटल सत्य है कि यदि हम प्रकृति (पर्यावरण) की रक्षा करेंगे तो प्रकृति भी हमारी रक्षा करेगी। धर्मों रक्षति रक्षित: अर्थात पर्यावरण प्रकृति की रक्षा ही हमारा धर्म है।

 

 

 

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