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***गंगाधर ढोबले****

 भारत के सुदूर पूर्व में होने से उसे पूर्वोत्तर कहा जाता है।  इनमें से हर राज्य के किसी एकाध कबीले के आध्यात्मिक चिंतन पर भी गौर करें तो पता चलेगा कि पूरा भारत वर्ष किस तरह एक सूत्र में बंधा था।  

      असम, अरुणाचल, नगालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा एवं मेघालय को सप्त बहनें कहा जाता है। कभी इन सब का मिलकर असम का एक ही राज्य था। लेकिन स्थानीय अस्मिताओं के कारण वह सात राज्यों में विभाजित हुआ है। भारत के सुदूर पूर्व में होने से उसे पूर्वांचल कहा जाता है। अधिकांश इलाका घनघोर वनों, पहाड़ों, घाटियों से आच्छादित है। इसलिए वनवासी ही यहां के असली बाशिंदे हैं। उनकी असंख्य जनजातियां एवं उपजातियां और उपजातियों की भी उपजातियां हैं। उनके हरेक के अपने कबीले हैं, उनकी अपनी समृद्ध परंपराएं हैं। उनकी अपनी आस्थाएं हैं, नियम हैं, अध्यात्म है, चिंतन है। फिर भी वे इस देश की हिंदू संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। पूर्वांचल की बात करते समय अक्सर इस तथ्य की ओर कम ध्यान दिया जाता है। हर राज्य के किसी एकाध कबीले के आध्यात्मिक चिंतन पर भी गौर करें तो पता चलेगा कि पूरा भारत वर्ष इस धागे से किस तरह एक सूत्र में बंधा था।  

 असम

      प्रसिद्ध काजीरंगा अभयारण्य के निकट का पहाड़ी इलाका है। इस इलाके में कलोंग-कपिली नामक नदियों की सुंदर वादियां हैं। इन घाटियों में ही कार्बी वनवासियों की संस्कृति फली-फूली। चौदहवीं सदी में वहां काचार राजा महामाणिक्य का राज था। इसी काल में नौगांग के कंड़ाली क्षेत्र के माधव कंडाली ने रामायण का अनुवाद किया। इसे ‘छाबिन अलन’ अर्थात कार्बी रामायण कहा जाता है। कवि ने रामायण का अनुवाद करते समय राम को कार्बी जमात का जामा पहनाया। राजा जनक को झूम खेती (हर वर्ष नया जंगल काट कर नई-नई जगह खेती करना) करने वाला किसान निरूपित किया। यह जनक चावल की बीयर पीता है, जो कार्बी कबीले में आज भी प्रिय पेय है। यह जनक गड़रियों से ओरांगखोंग पक्षी का अंडा मांग लेता है। ऐसा अंडा पवित्र व दुर्लभ माना जाता है। छाबिन के निम्न छंद में यही बात कही गई है-

 लाकी वोरामखोंग अति

 ओसोमेर ने सोंगथुजी

 ओसोमेर नांगतुन सोरी

 ओकप्रु ओकप्रि असानी

 किम थुईदोंग- थुईदोंगजी

      इस कार्बी जनक के पास कोई शाही व्यवस्था तो थी नहीं। उसने यह अंडा अपने घर के चारों ओर लगी बांस की बाड़ में लटकी एक टोकरी में रख दिया। उसे सीता जैसी सुंदर पुत्री हुई। यह सीता भी आदर्श कार्बी यौवना थी। पिता को झूम खेती में खाना पहुंचाती थी, अपने कपड़े खुद बुनती थी, घर की देखभाल उसी के जिम्मे थी, घर की साफ-सफाई वही करती थी और अतिथियों का चावल की बीयर से सम्मान करती थी। इसी का वर्णन करता यह छंद-

 काईपेन सोंसेंसी बीरी

 कदांग रापबोंग पाक पेन पी

 फुयेत कदेंग पाक पेन पी

 पसुनकोई बीरी बदांग थेपी

      राम से विवाह के बाद सीता अयोध्या चली गई। माधव कंडाली सीता के ससुराल का वर्णन करते समय कहता है, दशरथ का राजमहल भी बांस से बना था, बिल्कुल कार्बी छांगघर (बड़ा घर) जैसा! वधु का चावल व चावल से बनी बीयर से स्वागत किया गया। शायद कवि मैदानों के राजमहलों की कल्पना नहीं कर सका। उसने किसी कार्बी देहात में बांस से बने बड़े मकान की कल्पना की और सीता को ससुराल पहुंचा दिया। सीता वनवास गई तब भी वह अपने साथ करघा ले गई। (करघा कार्बी कबीले का अनिवार्य हिस्सा था।) शूर्पणखा अपने भाई रावण को सीता का वर्णन सुनाते समय उसकी सुंदरता का बयान तो करती ही है और साथ में उसके पास करघा होने की बात भी करती है। छाबिन का यह छंद इसी का वर्णन करता है-

 रामखान अरुण अछोंगरी

 वांगदोंग देंग चिरपी

 अरुण देंग लोंगतर थेपी

 बांगके प्रिथक कपार नी

 छोरजन थई चलांग मेपी

 अमंग पारदोन छोंछुरी

 पारदोन चिरनो वोतेक प्ली प्ली

      छाबिन के छंद स्थानीय बोली में हैं। उनकी अपनी कोई लिपि नहीं है। आजकल रोमन में उसे लिखा जाता है। रोमन से ही मैंने उसे देवनागरी में लिखा था। हो सकता है, कुछ उच्चारण भेद हो, लेकिन उससे मूल बात पर कोई असर नहीं होता। मूल बात यह है कि कवि ने रामायण के पात्रों को स्थानीय कार्बी जीवनशैली से जोड़ दिया। लेकिन कहानी लगभग वैसी ही रही।

 अरुणाचल

      अरुणाचल के उत्तर-पूर्व में चीनी सीमा से लगा सियांग जिला है। वहां आदि जनजाति की बहुलता है। उनकी समृद्ध संस्कृति है। उनके ‘आबांग’ एक तरह से मुखोद्गत किए गए श्लोक हैं। मराठी वारकरी संतों के अभंगों (छंद) से मिलते-जुलते हैं। यह खोज का विषय है कि आदियों के ‘आबांग’ व मराठी के ‘अभंग’ शब्द का इतना साम्य क्यों है। लेकिन इतना अवश्य है कि आदि सभ्यता पर हिंदू दर्शन का बहुत अधिक प्रभाव है।

      आदि तत्त्वज्ञान के अनुसार, एक समय था जब ब्रह्मांड में पानी व अंधेरे के सिवा कुछ नहीं था। इसे केयुंग युग कहा गया है। आबांग के निम्न छंद में यही कहा गया है-

 केयुम देमी केमो देमीगिदी तेतेंग,

 केरो देमी कामा गिदी तेतेंग।

      अर्थात, ब्रह्मांड एक शून्य था। अंधेरे से भरा शून्य। कहीं कुछ नहीं था। आदि कबीले की मान्यता है कि ‘आबांग’ की रचना इसी युग से आरंभ हुई। सब से पहले सीदी (पुरुष) व मीलो (स्त्री/प्रकृति) की रचना हुई। बोमोंग (सूर्य) तथा बोह (चंद्र) एक दूसरे से अलग हुए और सृष्टि की रचना आरंभ हुई। सीदी-मीलो से कुछ देवता पैदा हुए जैसे सीदी सेगार ओर्णे, सीदी दिकुप कुपने, मीलो बालात लान्नी आदि। सीदी सेगर ओर्णे ने अपने हाथों से ब्रह्मांड के दो भाग किए। एक भाग था आकाश (सीदी दिकुप कुपने) और दूसरा था धरती (मीलो बालात लान्नी)। दोनों गोल थे। आबांग में धरती के हिलने-डुलने अर्था भूकम्प का जिक्र है।

      इसके बाद सीदी-मीलो ने लुहार को जन्म दिया। उसने धरती को तराशा और उसे मनुष्य के रहने लायक बनाया। इस लुहार को ॠषि ॠमन कहा गया है। इसके बाद सीदी बोते और मीलो नान्ने ने शेष सृष्टि की रचना की।

      सृष्टि की जब रचना हुई तब लोगों को खाने के लाले पड़ गए। सीदी-मीलो ने पत्थरों को खाने के लिए कहा। निम्न आबांग में यही बात कही गई है-

 लीदो रेजिनी रेग्यों बिदुुंग,

 लीमा रेजिनी रेग्यों बिदुंग

 सीदी बेली पीनम तकामी,

 मीलो बेली यतनाम तकामी

 लीदो दोदकेंगेम दोबोमकाई,

 लीमा दोदकेंगेम दोबोमकाई।

      आबांग कहते हैं कि पत्थर तब नर्म थे। सीदी की सृष्टि ने उन्हें खाना शुरू किया। जैसे-जैसे पत्थर कठोर होते गए, कृषि की रचना की गई। ये छंद स्मृति के आधार पर एक दूसरी पीढ़ी को मिलते गए, जो आज भी कायम है। 

 नगालैण्ड

      नगाओं की एक जनजाति है झेलियांग नगा। इसमें रानी मां गाईंडिन्लू के रूप में एक राष्ट्रीय चरित्र उभरा, जिसने १३ साल की उम्र में ही अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ संघर्ष का बिगूल फूंका। रानी मां ने ‘हरका’ नामक सम्प्रदाय को पुनरुज्जीवित किया। वस्तुतः झेलियांगरोंग कबीले में ‘हरका’ सुधारवादी आंदोलन की शुरुआत जादोनांग ने की। बीच के काल में यह आंदोलन धीमा पड़ गया। रानी मां के प्रयास से ‘झेलियांगरोंग हरका एसोसिएशन ’ बनी और पुरानी धरोहर को पुनः स्थापित करने का प्रयास आरंभ हुआ।

      ‘हरका’ का अर्थ है, मन व तन की शुद्धता और सत्य पर चलना। ‘तिनवांग’ उनका ईश्वर है। ‘हरका’ तत्त्वज्ञान के कुछ प्रमुख सिद्धांत हैं-

  • ‘हरका’ स्वर्ग व ब्रह्मांड के ईश्वर तिनवांग में विश्वास करते हैं। उनकी मान्यता है कि सूर्य, चंद्र, धरती, पशु-पक्षियों का निर्माण तिनवांग ने किया है। वह देवाधिदेव है। अतः बलि अन्य देवताओं को नहीं, इसी को दी जाती है।
  • प्रकृति, ग्राम देवता या भूत-पिशाचों की पूजा ‘हरका’ को मान्य नहीं है। वे सीधे तिनवांग की पूजा में ही विश्वास करते हैं।
  • ‘हरका’ मान्यता है कि स्वर्ग है, जिसमें तिनवांग का निवास है। जो कोई पाप नहीं करता वह स्वर्ग में जाता है। बाकी आत्माएं विभिन्न योनियों में जाती हैं और अंत में मनुष्य जन्म फिर से मिलता है। यह मान्यता हिंदू दर्शन के करीब है।
  • भक्ति ही तिनवांग तक पहुंचने का सरल मार्ग है। पूजा या प्रार्थना सूर्योदय के साथ ही होती है। पूर्णिमा का काफी महत्व है। ‘हरका’ इस दिन भोर में ही गांव के केलुमकी (मंदिर या पूजा स्थल) में इकट्ठे होते हैं और प्रार्थना करते हैं। इस दिन सूर्यास्त तक कई काम निषिद्ध माने गए हैं।

 मिजोरम

      मिजो की लगभग सभी जनजातियां अपनी उत्पत्ति छिनलुङ गुफा से मानती है। इसलिए वे अपने को ‘छिनलुङ छुआक’ मानते हैं। उनकी ह्मार बोली में इस आशय का एक लोकगीत है-

 खो सीनलुङ (छीनलुङ) अः कोत

 सिएल अंग क जुओंग आ,

 मी ले नेल ली तम ए हेमी हाईअः।

      अर्थात, जिस प्रकार सांड छलांग लगा कर घर से बाहर निकल आता है, उसी तरह हम भी छिनलुङ गुफा के बाहर आ गए, जहां अनगिनत मनुष्य रहते हैं।

  

    मिजो चिंतन के अनुसार आदि ईश्वर युवाना ही है। उसने अपनी इच्छाशक्ति से खुआनू को प्रकट किया। खुआनू ने खुआवाङ को अवतीर्ण किया। उसी से देवांगणाएं आईं। इनके संयोग से आदि मानव ‘ह्माखोसाङआ’ पैदा हुआ और आगे मनुष्य समाज बना।

      वे पंच महाभूतों को मानते हैं। भूत-प्रेत पर उनका विश्वास है। उनका मानना है कि जंगली झाड के आसपास दुष्ट आत्माएं रहती हैं। पीपल, बरगद आदि वृक्षों की आत्माएं दयालु होती हैं। दुष्ट आत्माओं से निजात पाने के लिए पीपल के वृक्ष के नीचे तंत्र-मंत्र का प्रावधान है। वहां वोलपु (ओझा) पशु-पक्षियों की बलि देते हैं। चे ‘पथिआन’ नामक ईश्वर को मानते हैं। इसकी पूजा करने वाले को ‘सदोत’ कहा जाता है।

 हिंदू मान्यताओं की तरह वे भी ‘स्वर्ग’ और ‘नर्क’ को मानते हैं। बुरे काम करने वाले नर्क में अर्थात मितथीखुआ में जाते हैं, जबकि अच्छे काम करने वाले स्वर्ग अर्थात पियालराल में जाते हैं। जुगनू पितरों तक सारी खबरें पहुंचाते हैं। पियालराल मोक्ष का स्थान है।

 मेघालय

      मेघालय में तीन जनजातियों का बोलबाला है। खासी, गारो एवं जयंतिया। उनका चिंतन लगभग एक जैसा है। खासी ‘ब्लेई’ नामक ईश्वर को मानते हैं। शिलांग के आसपास का यह इलाका है। खासी मान्यता के अनुसार ईश्वर का कोई रूप नहीं होता, वह निर्विकार है। अतः वह पुरुष भी है और स्त्री भी है। एक भी है, अनेक भी है। ब्लेई के नाम के पहले वे ‘उ’, ‘का’ या ‘की’ प्रत्यय लगाते हैं। ‘उ’ पुरुष के संदर्भ में, ‘का’ स्त्री के संदर्भ में और ‘की’ समूह के संदर्भ में आता है जैसे कि ‘उब्लेई’, ‘काब्लेई’ या ‘कीब्लेई।’

      खासी धर्म के तीन प्रमुख सिद्धांत माने गए हैं- १. बन कमाई आया का होक, २. का तिप ब्रिव का तिप ब्लेई और ३. का तिप कुर-का तिप खा।

      ‘बन कमाई आया का होक’ का माने है सच्चाई से धन अर्जित करें, सत्य पर चलें, सत्य बोलें और सत्य से जीवनयापन करें। विचारों से शुद्ध रहें, ईमानदार बने। ‘का तिप ब्रिव का तिप ब्लेई’ का मतलब है, मनुष्य को जानना ही ईश्वर को जानना है। मनुष्य का कल्याण और साथी संगियों से स्नेह इस सिद्धांत की मूल अवधारणा है। सिद्धांत कहता है कि जो दूसरों से स्नेह नहीं रखता, वह उब्लेई तक नहीं पहुंच सकता। चूंकि उनकी अवधारणा उनके ‘कुर’ से आरंभ होती है, अतः विभिन्न कुरों को मिलाकर सामूहिक धर्मस्थल बनाने की उन्हें कोई जरूरत नहीं पड़ी। उनके कहीं कोई मंदिर या पूजास्थल नहीं हैं। उनके कोई पुरोहित या संत भी नहीं होता। उनका तीसरा सिद्धांत है, ‘का तिप कुर-का तिप खा’। इसमें उनकी सामाजिक व्यवस्था की व्याख्या है। चूंकि मातृसत्ताक व्यवस्था है, अतः माता का नाम ही चलता है, पिता का नाम गौण या शून्य हो जाता है। मातृकूल ‘कुर’ व पितृकुल ‘खा’ कहलाता है। मातृकुल में आपस में विवाह निषिद्ध है, लेकिन पितृकुल में हो सकते हैं बशर्तें कि मां अलग-अलग हो।

      खासी अपने धर्म को ‘नियाम’ कहते हैं। ‘निया’ का अर्थ है ‘कारण’ और ‘इम’ का अर्थ है ‘जीवन’। अर्थात जीवन के कारण या नियम। वे ‘का जुबान लक काबा तक’ यानि वचन के पक्के आदमी को बहुत बड़ा मानते हैं। खासी धर्म दूसरों के साथ बेहिचक स्नेह को महत्व देता है और मानता है कि सद्भाव एवं स्नेह से ही ईश्वर प्राप्त होता है। खासी कवि की रचना इस संबंध में उल्लेखनीय है-

 कश (ॠेव) िीरूशींह लशीीं ुहे र्श्रेींशींह लशीीं,

 अश्रश्र ींहळपसी लेींह सीशरीं। ीारश्रश्र;

 ऋेी ींहश वशरी ॠेव ुहे लीशरींशींह र्ीी,

 कश ारज्ञशींह रपव र्श्रेींशींह रश्रश्र.

      खासियों में बहुविवाह प्रचलित है। सम्पति पर माता का अधिकार होता है। वह इसे ‘खातू दूह’ अर्थात सब से छोटी बेटी को देती है। खातू दूह का ‘कुर’ के मकान पर अधिकार होता है। बाकी बहनें अन्यत्र बसती हैं। बूढापे में माता-पिता की देखभाल यही छोटी बेटी करती है। उनमें विवाह-विच्छेद भी बहुत आसान है।

 त्रिपुरा

      उदयपुर (राजस्थान का नहीं) से ६ किमी दूर प्रसिद्ध चतुर्दश मंदिर है। शिव, दुर्गा, हरि, लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय, गणेश, बह्मा, पृथ्वी, समुद्र, गंगा, अग्नि, कामदेव आदि देवी-देवताओं के मंदिर यहां हैं। आषाढ़ शुक्ल अष्टमी को यहां मेला लगता है और पूर्णिमा तक विशेष पूजा होती है। इसे ‘खर्ची पूजा’ कहते हैं। खर्ची पूजा के साथ ‘केर पूजा’ का भी महत्व है। इन पूजाओं के पीछे त्रिपुरी कबीलों में चला परंपरागत विश्वास है। वे भी भूत-प्रेत, पिशाच को मानते हैं। उन्हें वे बुरसा, थामनाईरोग, बोरीरोग, ब्रिनिरोग आदि कहते हैं। नदी पिशाच व वन पिशाच भी उनके विश्वास में मौजूद है। उनसे निजात पाने के लिए शाही संरक्षण में इन पूजाओं का आयोजन होता था, जो आज भी कमोबेश में जारी है।

      इन पूजाओं में सब से पहले लाम्प्रा-ओथोप की पूजा का विधान है। लाम्प्रा शब्द चौराहे के अर्थ में है और ओथोप बांस से बनी देवता के संदर्भ में। बांस से बनी देवता को स्थापित करते समय ओछाई (ओझा) मंत्र पढ़ता है-

 श्रीयाखाता, श्रीबुरुखाता, त्विबुक कलाखी राजा, मां संगरोंग देवी।

      इस आरंभिक मंत्र का अर्थ है मनुष्य, जन्म, मृत्यु, नदी एवं समुद्र देवतागण हमारी प्रार्थना स्वीकार करें। हिंदुओं में किसी भी पूजा के पूर्व जिस तरह गणेश पूजा का विधान, कुछ इस तरह यह विघ्नहर्ता देवता है।

 ‘खर्ची पूजा’ के बाद आने वाले पहले शनिवार या मंगलवार को ‘केर पूजा’ होती है। इसका उद्देश्य बुरी आत्माओं से राज्य की रक्षा करना है। ‘केर’ का मतलब है बांधना। इस तरह मांत्रिक घर, गांव या क्षेत्र को अभिमंत्रित कर बांध देता है ताकि उसके अंदर कोई बुरी आत्मा, भूत-प्रेत, पिशाच प्रवेश न कर सके। यह पूजा दो रात व एक दिन चलती है। ‘केर’ के दौरान गांव में बांधे जाने वाले इलाके में किसी का जन्म होता है या मृत्यु होती है तो पूजा रोक दी जाती है। इसके बाद आने वाले शनिवार या मंगलवार को फिर नए सिरे से पूजा होती है। पूजा के दिन कोई उस इलाके से बाहर नहीं जा सकता, जोर से बोल नहीं सकता। बोलना ही है तो अत्यंत धीमी आवाज में बोलना होता है।

 मणिपुर

      मणिपुरी संस्कृति पर स्वाभाविक रूप से हिंदू संस्कृति की छाप है। मणिपुरी आरंभ में अग्नि पूजक थे। पुराने घरों में फुंगा (अग्निकुंड) अनिवार्य था। उसमें अग्नि निरंतर प्रज्वलित रहती थी। अब वैसा नहीं है, लेकिन अब फुंगा ५ दिन के लिए होता है। विशेष रूप से वास्तु शांति के लिए यह किया जाता है। फुंगा के पश्चिम में जमीन में एक गड्ढा किया जाता है। इसे फुंगा लाइरू कहते हैं। पहले लोग इस फुंगा लाइरू को प्रणाम करने के बाद ही घर से बाहर निकलते थे। उसमें मूल्यवान वस्तुएं रखी जाती थीं। फुंगा लाइरू का इतना आतंक था कि चोर भी इन वस्तुओं को नहीं छेड़ते थे। फुंगा से उत्तर-पूर्व कोने में सनामाही काचिन (देवघर) हुआ करता था। वहां मिट्टी का एक घड़ा स्थापित किया जाता था। उत्तर दीवार की ओर लैमारेन नामक देवी की स्थापना की जाती थी। आज भी किसी शुभ प्रसंग पर ऐसा किया जाता है।

      मणिपुरी संस्कृति मेईथेई (अधिक शुद्ध मैते) कहलाती है। मैतेई समाज पुरुष सत्ताक है, फिर भी स्त्रियों का उनमें दबदबा है।

 धार्मिक कृत्य मंत्रोच्चारण के साथ पूरे होते हैं। कर्मकाण्ड कराने वाले पंडित, स्त्री या पुरुष दोनों हो सकते हैं। मंदिर में पूजा करने वाली महिला पुजारी को ‘मैबास’ कहा जाता है। जो प्रवचन करते हैं उन्हें ‘लाइपाओ’ कहा जाता है।

      मैतेई घर हिंदुओं के घर जैसा ही होता है। घर के बाहर तुलसी का बिरवा और अंदर बालकृष्ण की पूजा मैतेई घर का अभिन्न अंग है।  महाराष्ट्र के मंगलागौरी की तरह ही यहां ‘लिक्काली’ नामक त्योहार है। इस अवसर पर महिलाओं के गीत, नृत्य, खेल आदि होते हैं। कृष्ण-रुक्मिणी प्रणय के गीत इस उत्सव की विशेषता है। मैतेई समाज में प्रेम विवाह मान्य है। इसे ‘चेनबा’ कहा जाता है। ‘चेनबा’ में सोमवार या बुधवार को लड़की घर के बाहर चली जाती है। लड़के से उसकी मुलाकात होती है। इसे लड़की की मां लड़के के घर बताती है। बाद में विवाह तय किए जाते हैं।

 सिक्किम

      हालांकि, सिक्किम को अभी अभी पूर्वोत्तर में शामिल किया गया है। वह भारत के उत्तर में हिमालय की वादियों में बसा राज्य है। पूर्वोत्तर के सात राज्यों और सिक्किम की वनवासी संस्कृति लगभग समान है। वहां लेपचा व भूतिया जनजातियां बहुतायत में हैं।

      लेपचा कंचनजंघा (शिखर) को अपना ईश्वर मानते हैं। उनकी मान्यता है कि कंचनजंघा में कहीं ‘मयेल ख्योंग’ (स्वर्ग का रास्ता) है, जहां से वे आए और मरने के बाद वहीं जाएंगे।

      लेपचा मान्यता है कि उनके ईश्वर ‘ईतबू डेयबू रूप’ ने पहले फोडोंगथिंग नामक पुरुष बनाया और उसमें नौ ‘नुनयोंग’ (जीवन तत्व) डाले। बाद में फोडोंगथिंग से एक जीवन तत्व निकाल लिया और नूजोंग-निवे नामक महिला की रचना की। दोनों चूंकि एक ही तत्व से बने थे, अतः उन्हें बहन-भाई के रूप में रहने के लिए कहा। परंतु, वे ईश्वर की आज्ञा भूल गए और पति-पत्नी की तरह रहने लगे। अपना पाप छिपाने के लिए उन्होंने अपने सात बच्चों को अलग-अलग गुफाओं में छिपा दिया। लेकिन, नू-जोंग-निवे का मातृत्व जाग गया और आठवें बच्चे को उसने अपने पास रख लिया। उनके अब और चार बच्चे हो गए थे। जब ईश्वर ईतबू रूप धरती पर उतरा तो दो बच्चे दिखे और उन्हें आशीर्वाद दे दिया। शेष दो बच्चे स्वर्ग के द्वार पर छिपे थे, अतः उन्हें स्वर्ग में ले लिया, परंतु वर दे दिया कि उनकी पूजा होगी। इन दो बच्चों में एक कन्या-नुगनलेनयू और दूसरा लड़का कोथोंगाफी था। अतः घर में जब कोई बच्चा होता है तो उनकी पूजा होती है। लड़का हो तो स्त्री देवता न्ाुगनलेनयू की और लड़की हो तो पुरुष देवता कोथोंगाफी की पूजा होती है। स्त्री देवता का प्रसाद स्त्री के लिए निषिद्ध है। उसे नदी नालों में बहा दिया जाता है। पुरुष देवता का प्रसाद वह अवश्य लेती है।

      इन आस्थाओं को महज अंधश्रद्धा नहीं माना जा सकता। शहरों से दूर जंगलों में रह कर उन्होंने अपने लिए ईश्वर और अध्यात्म को खोज लिया था और अपनी दुनिया बसा ली थी। उनकी श्रद्धाएं और आस्थाएं मजाका विषय नहीं, गंभीर चिंतन और खोज का विषय है।

  मो. ः ९९३०८००४५३

 

 

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